हजार साल पुराना “प्रशस्ति” शिलालेख: रामायण पर नया प्रकाश

संस्कृत में लिखित और 11वीं सदी की नागरी लिपि में अंकित एक दुर्लभ शिलालेख रामायण के विषय में नई जानकारियाँ प्रदान करता है।
  • रुद्र विक्रम श्रीवास्तव ने 18 दिसंबर 2024 को गढ़वा किले में 11वीं सदी का एक महत्वपूर्ण शिलालेख खोजा।
  • यह संस्कृत शिलालेख 1095 ईस्वी का है और राम-नवमी उत्सव का अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन प्रमाण है।
  • विशेषज्ञों ने इस शिलालेख को पढ़ने और समझने में सहायता प्रदान की तथा पुष्टि की कि इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण की कथा से मेल खाता है, जिसमें भगवान राम की यात्रा का विवरण है।
  • इस शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि भगवान राम की यात्रा से संबंधित पवित्र स्थलों को सदियों तक हिंदू जनमानस में स्मृति रूप में सुरक्षित रखा गया।
  • यह शिलालेख उन दावों को चुनौती देता है कि राम की पूजा और भक्ति आंदोलन आधुनिक काल की घटनाएं हैं। यह सिद्ध करता है कि भगवान राम को विष्णु के अवतार के रूप में प्राचीन काल से ही पूजित किया जाता रहा है।

[संपादक की टिप्पणी: यह लेख सबसे पहले India Currents में प्रकाशित हुआ था; देखें https://indiacurrents.com/a-thousand-year-old-prashasti-inscription-sheds-light-on-the-ramayana/]

खोज

जब रुद्र विक्रम श्रीवास्तव ने 18 दिसंबर 2024 को प्रयागराज (उत्तर प्रदेश, भारत) स्थित गढ़वा किले में 11वीं सदी का एक महत्वपूर्ण शिलालेख खोजा, उन्हें तुरंत आभास हुआ कि यह एक ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण खोज है। उनकी यह खोज भारतीय इतिहास को समझने में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई[1]

श्रीवास्तव एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं, जिनकी विशेष रुचि मध्यकालीन किलों के अध्ययन में है। 2022 से वे बुंदेलखंड क्षेत्र के विभिन्न किलों के शिलालेखों का अध्ययन कर रहे हैं। वे गढ़वा किले में पहले भी कई बार अन्य शिलालेखों का प्रलेखन कर चुके हैं। उनके शोध कार्य को प्रकाशित करने की प्रक्रिया जारी है।

पुरातत्वविद् राजेश कन्नौजिया, प्रीतम कुमार और विद्वान कुशाग्र अनिकेत ने श्रीवास्तव को शिलालेख को समझने में सहायता प्रदान की। कन्नौजिया भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से जुड़े हैं, जबकि कुमार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में शोधकर्ता हैं। अनिकेत, जो कॉर्नेल और कोलंबिया विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं, एक अर्थशास्त्री और संस्कृत विद्वान हैं। वे इंडिका क्लासिकल लाइब्रेरी से जुड़े हुए हैं।[2]

गढ़वा किला, जो प्राचीन मंदिरों के समूह का स्थल है, भारत का एक राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित किया गया है। श्रीवास्तव ने बताया कि यह परिसर वर्तमान में खंडहर अवस्था में है; कई संरचनाएं ध्वस्त हो चुकी हैं और चारों ओर घना जंगल फैल चुका है।

शिलालेख

यह शिलालेख चंदेला राजा कीर्तिवर्मन (1060-1100 ईस्वी) के शासनकाल का है। इस आदेश को उनके मंत्री वत्सराज द्वारा जारी किया गया था। चंदेला राजवंश ने 9वीं से 13वीं सदी तक बुंदेलखंड क्षेत्र पर शासन किया। राजा कीर्तिवर्मन को कलचुरी राजा लक्ष्मीकर्ण को पराजित करने का श्रेय दिया जाता है।

शिलालेख एक प्रशस्ति (स्तुति) है, जो भगवान राम को समर्पित है। यह भारत में पाया गया अब तक का सबसे प्राचीन ज्ञात प्रशस्ति शिलालेख है। इसमें 16 पंक्तियाँ हैं, जो एक बड़े पत्थर की शिला पर खुदी हुई हैं। कुछ अक्षरों को छोड़कर अधिकांश शिलालेख उत्कृष्ट रूप से सुरक्षित है। यह शिलालेख अपनी अक्षरों की स्पष्टता, समान आकार और सटीक अक्षरांकन के कारण विशेष है।

अनिकेत ने बताया, “इस खोज की दुर्लभता को कम करके नहीं आंका जा सकता।” यह शिलालेख संस्कृत में लिखा गया है और इसे 11वीं सदी की नागरी लिपि में उकेरा गया है।

अनिकेत ने इस शिलालेख का गहन अध्ययन और पुनर्निर्माण डॉ. शंकर राजाराम के साथ किया। डॉ. राजाराम एक प्रमुख संस्कृत विद्वान हैं और उन्हें महार्षि बादरायण व्यास सम्मान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

इस शिलालेख की स्थापना 1095 ईस्वी में, विक्रम संवत 1152 की चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन, राघव यात्रा (धार्मिक जुलूस) के उपरांत की गई थी।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह शिलालेख राम-नवमी के अवसर पर आयोजित होने वाले जुलूसों का प्रमाण प्रस्तुत करता है, जो 11वीं सदी में आयोजित किए जाते थे। यह शिलालेख राम-नवमी उत्सव का अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन पुरातात्विक प्रमाण है। शिलालेख यह भी संकेत करता है कि भगवान श्री राम की स्तुति में भक्तिपूर्ण कविताओं (स्तुतियों) की रचना 11वीं सदी में हो रही थी। यह घटना उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के पारंपरिक आरंभ से पूर्व की है।

 सभ्यता की सांस्कृतिक स्मृति और पावन स्थल

भारत हिंदुओं के लिए एक पवित्र भूमि है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में धर्म अध्ययन की प्रोफेसर डायना एक (Diana Eck)[3] अपनी पुस्तक “इंडिया: ए सेक्रेड जियोग्राफी”(India: A Sacred Geography) में लिखती हैं कि भारत के हर क्षेत्र में एक “जीवित भू-दृश्य” विद्यमान है, जो देवताओं और नायकों के पदचिह्नों को संजोए हुए है। प्रत्येक स्थान की अपनी एक विशेष कहानी है और प्रत्येक पौराणिक कथा अथवा किंवदंती का कोई न कोई स्थल अवश्य है।

शिलालेख में भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के वनगमन तथा उस स्थल पर एक आश्रम के निर्माण का उल्लेख है, जहां बाद में एक मठ (मंदिर) स्थापित किया गया। अनिकेत का कहना है कि यह स्थान भगवान राम की वन यात्रा के मार्ग का हिस्सा है, जिसे सदियों तक हिंदू स्मृतियों में संरक्षित रखा गया।

शोधकर्ताओं ने इस मठ को वाल्मीकि रामायण में वर्णित घटनाओं से जोड़ा है। भगवान राम अयोध्या से निकलने के बाद श्रृंगवेरपुर में एक रात रुके। इसके बाद उन्होंने गंगा नदी पार कर भरद्वाज ऋषि के आश्रम में विश्राम किया। फिर यमुना नदी पार कर चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया। गढ़वा किले के खंडहर मंदिर को यमुना के किनारे स्थित उसी स्थल के रूप में पहचाना गया है, जहां राम, लक्ष्मण और सीता ने वन यात्रा के दौरान एक रात बिताई थी। अनिकेत ने इस संदर्भ में वाल्मीकि रामायण के निम्न श्लोक का उल्लेख किया है:

विहृत्य ते बर्हिणपूगनादिते शुभे वने वानरवारणायुते।
समं नदीवप्रमुपेत्य सम्मतं निवासमाजग्मुरदीनदर्शनाः॥ (वाल्मीकि रामायण, 2.55.34)

“सुंदर वन में, जो मोर की आवाजों से गूंज रहा था और जहां बंदर और हाथियों की उपस्थिति थी, राम, लक्ष्मण और सीता ने नदी के समतल तट पर एक उपयुक्त निवास स्थान पाया और वहां रात बिताई।” (अनिकेत के अनुवादानुसार)

बाद में इस स्थान पर एक आश्रम का निर्माण हुआ। सदियों बाद भी यह स्थान भगवान राम से जुड़ा होने के कारण लोकप्रिय तीर्थ स्थल बना रहा। 11वीं सदी में, कीर्तिवर्मन चंदेला के शासनकाल में, चैत्र शुक्ल एकादशी के अवसर पर एक धार्मिक जुलूस के बाद, इसी स्थल पर एक मठ का उद्घाटन किया गया।

शोधकर्ताओं ने इस शिलालेख को “राघव-यात्रा शिलालेख” नाम दिया है। इस नाम का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि यह शिलालेख राम-नवमी के उत्सवों का प्राचीन और ठोस प्रमाण प्रस्तुत करता है। इस शिलालेख से यह प्रमाणित होता है कि भगवान राम के जन्मोत्सव से संबंधित त्योहारों का आयोजन 11वीं सदी में भी किया जाता था।

इस खोज का महत्व

राघव-यात्रा शिलालेख कई मौजूदा ऐतिहासिक धारणाओं को चुनौती देता है। यह उन मार्क्सवादी इतिहासकारों के दावों[4] का खंडन करता है, जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर[5] के निर्माण का विरोध किया था और यह तर्क दिया था कि राम की पूजा आधुनिक काल की घटना है।

हालांकि इस में कोई संदेह नहीं हैं कि वाल्मीकि रामायण के रचनाकाल से ही श्री राम का भारतीय साहित्य और कलाओं में निरंतर सम्मान होता रहा है, राघव-यात्रा शिलालेख यह पुष्टि करता है कि 11वीं सदी में भी कवियों ने भगवान राम की स्तुति में भक्तिपूर्ण कविताओं (स्तुतियों) की रचना की थी। यह शिलालेख उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के पारंपरिक आरंभ से पहले का है।

यह शिलालेख यह भी सिद्ध करता है कि श्री राम को विष्णु के अवतार के रूप में पहचाना जाता था। यह उन दावों का खंडन करता है कि अवतार सिद्धांत को बाद के समय में धार्मिक सम्प्रदायों को वैधता प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित या गढ़ा गया था।

अनिकेत का कहना है कि, “हालांकि मार्क्सवादी इतिहासकारों ने विष्णु-हरि शिलालेख[6] को लेकर विवाद खड़ा किया था, भगवान राम से संबंधित शिलालेख का अयोध्या में मिलना, जो उनका जन्मस्थान है, कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।”

अनिकेत कहते हैं, “जो बात उल्लेखनीय है, वह यह है कि यह शिलालेख भगवान राम की वन यात्रा के मार्ग पर स्थित है।” राघव-यात्रा शिलालेख में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के वनगमन का तथा उस स्थल पर एक आश्रम के होने का उल्लेख है, जहां बाद में एक मठ (मंदिर) का निर्माण हुआ। अनिकेत प्रश्न करते हैं, “क्या यह उल्लेख भरद्वाज ऋषि के आश्रम का हो सकता है?”

यह बात उल्लेखनीय है कि वाल्मीकि रामायण की रचना के हजारों वर्ष बाद भी भगवान राम की यात्रा से जुड़े महत्वपूर्ण स्थल हिंदू जनमानस में स्मृति के रूप में संरक्षित रहे। अनिकेत का कहना है कि राघव-यात्रा शिलालेख कई सवालों के उत्तर देता है, लेकिन कुछ प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। वह कहते हैं, “हमें अभी इस पर और अधिक शोध करने की आवश्यकता है।”

संदर्भ 

[1] Oldest ‘Prashasti’ Devoted To A Ram Temple Discovered In Prayagraj, Evidence Of 11th-Century Ram Navmi Celebrations Under Chandela King | Nishtha Anushree (Swarajya); https://swarajyamag.com/news-brief/oldest-inscription-devoted-to-lord-ram-discovered-in-prayagraj-evidence-of-11th-century-ram-navmi-celebrations-under-chandela-king

[2] ICL contract with Kushagra Aniket for Bhāmaha’s Kāvyālaṅkāra (Indica); https://cbs.indica.in/icl-contract-with-kushagra-aniket-for-bhamahas-kavyala%E1%B9%83kara/

[3] https://www.hds.harvard.edu/people/diana-l-eck

[4] Rama’s exile (The Times of India); https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/beyond-occident/ramas-exile/

[5] Ayodhya’s Ram Mandir: The End Of An Exile | Avatans Kumar (India Currents); https://indiacurrents.com/ayodhyas-ram-mandir-the-end-of-an-exile/

[6] Vishnuhari Inscription and the Left Historian’s Effort to Suppress the Truth | Dr. Meenakshi Jain (YouTube; Sangam Talks); https://www.youtube.com/watch?v=E8Zy44ARn6c

Avatans Kumar
Avatans Kumar
Avatans Kumar is a columnist, public speaker, and activist. A JNU, New Delhi, and the University of Illinois at Urbana-Champaign alumnus, Avatans holds graduate degrees in Linguistics. Avatans is a recipient of the 2021 San Francisco Press Club’s Bay Area Journalism award.
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