ए.आर. रहमान विवाद: भारत का सभ्यतागत पुनर्जागरण और बॉलीवुड की बेचैनी

ए.आर. रहमान प्रकरण के बहाने सामने आता है वह वैचारिक तंत्र, जो रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर एकतरफ़ा सांस्कृतिक राजनीति को आगे बढ़ाता रहा है, लेकिन भारत के बदलते सांस्कृतिक मिज़ाज के सामने अब अपना संतुलन खोता दिख रहा है।
  • ए.आर. रहमान का बीबीसी इंटरव्यू किसी व्यक्तिगत असंतोष से अधिक, उस बेचैनी को उजागर करता है जो बॉलीवुड के एक प्रभावशाली वर्ग को भारत के बढ़ते सभ्यतागत आत्मबोध और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से हो रही है।
  • लेख तर्क देता है कि मुख्यधारा का बॉलीवुड दशकों से चयनात्मक इतिहास, पाकिस्तान-समर्थक विमर्श और सूक्ष्म हिंदू-विरोधी नैरेटिव को सामान्य बनाता आया है, जिसे अब बदला हुआ दर्शक वर्ग चुनौती दे रहा है।
  • छावा, धुरंधर, द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों की सफलता दिखाती है कि भारतीय दर्शक अब अपने इतिहास और पहचान को नए सिरे से देखना चाहते हैं, जिससे पुराना वैचारिक वर्चस्व टूट रहा है।
  • आलोचक लॉबी और कुछ कलाकारों की प्रतिक्रिया में बार-बारविभाजन” और “सांप्रदायिक पीड़ित” जैसे पुराने कार्ड सामने आते हैं, जो बदलते सांस्कृतिक संतुलन के प्रति असहजता को दर्शाते हैं।
  • कुल मिलाकर, यह लेख दिखाता है कि भारत का सभ्यतागत पुनर्जागरण अब सिर्फ़ सामाजिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक सत्ता-संरचनाओं को भी चुनौती दे रहा है, और ए.आर. रहमान विवाद उसी टकराव का एक प्रतीक है।

रोज़ा, बॉम्बे, ताल और लगान जैसी जानी पहचानी धुनों से लेकर साथिया, स्वदेस, रंग दे बसंती और गुरु की विविधतापूर्ण रचनाओं तक—संगीतकार ए.आर. रहमान ने अपने करियर में एक महतवपूर्ण यात्रा तय की है। अपनी अनूठी संगीत शैली और रचनात्मक प्रभाव के ज़रिये उन्होंने एक पूरे राष्ट्र को मंत्रमुग्ध किया। भारतीय दर्शकों ने उनके संगीत को अभूतपूर्व प्रेम और सम्मान दिया। यह सच है कि जिन फ़िल्मों के लिए उन्होंने संगीत रचा, उनमें से कुछ के राजनीतिक संदर्भ विवादास्पद रहे हैं। इसके बावजूद, रहमान के संगीत को भारतीय समाज से लगातार, लगभग बिना किसी शर्त के, सराहना मिलती रही। यह उपलब्धि हर कलाकार के हिस्से नहीं आती। लेकिन रहमान ने अपने हालिया बयानों से उसी विरासत पर स्वयं सवाल खड़े कर दिए। इसे चाहे प्रोपेगैंडा का एक दांव कहा जाए, या फिर अतिशयोक्तिपूर्ण बयानबाज़ी की एक ऐसी कोशिश जो उलटी पड़ गई। सच यह है कि एक ही क्षण में उन्होंने दशकों में बनी अपनी साख को गहरी चोट पहुँचाई है।

बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए एक हालिया इंटरव्यू में रहमान ने सहजता से यह कह दिया कि संभव है बीते आठ वर्षों में उन्हें बॉलीवुड में “सांप्रदायिक” भेदभाव का सामना करना पड़ा हो। इसका कारण उन्होंने कथित “पावर शिफ्ट” को बताया। उनका कहना था कि “जो लोग रचनात्मक नहीं हैं, वही फैसले लेने की ताक़त रखते हैं,” और यह भी कि “यह सांप्रदायिक मामला हो सकता है, लेकिन सीधे तौर पर नहीं।” उन्होंने आगे यह दावा भी किया कि उन्हें इस तरह के भेदभाव की बातें “चीनी फुसफुसाहटों” (Chinese whispers) के ज़रिये सुनने को मिलती थीं।

बीबीसी एशियन नेटवर्क के पत्रकार हारून राशिद को दिए इसी इंटरव्यू में रहमान ने छावा जैसी फ़िल्म को “विभाजनकारी” बताया—जबकि उस फ़िल्म का संगीत उन्होंने स्वयं तैयार किया है। बदलते बॉलीवुड विमर्श के दूसरे छोर पर उभर रही फ़िल्मों को लेकर उनके व्यंग्यात्मक तंज़ भी लोगों की नज़र से नहीं चूके। इसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं और विवादों का सिलसिला शुरू हो गया।

इस तरह रहमान ने एक पाकिस्तानी मूल के बीबीसी पत्रकार के सामने वही जाना-पहचाना ‘अल्पसंख्यक पीड़ित’ वाला कार्ड खेला। इसकी विडंबना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। लेकिन उनके इन बयानों को महज़ एक व्यक्तिगत चूक मानकर टाल देना भी उचित नहीं होगा। ये बयान दरअसल बॉलीवुड के उस प्रभावशाली वैचारिक तंत्र की गहरी असहजता को उजागर करते हैं, जो लंबे समय से इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े विमर्श को अपने ढंग से गढ़ता आया है। समय के साथ वाम-उदारवादी बुद्धिजीवियों और इस्लामिस्ट नेटवर्कों के बीच बनी साँठ-गाँठ ने इसी बॉलीवुडिया सोच को आकार दिया है। यही सोच आज भारत में हो रहे सांस्कृतिक और सभ्यतागत बदलावों के सामने खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है।

बदलते सांस्कृतिक माहौल से बॉलीवुड की बेचैनी

उसी बीबीसी इंटरव्यू में रहमान बेहद सूक्ष्म ढंग से एक खास नैरेटिव को आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। ऐसा लगता है मानो इंटरव्यू लेने वाला और देने वाला, दोनों ही किसी मौन समझ के तहत एक ही दिशा में बातचीत को आगे ले जा रहे हों। डेढ़ घंटे की इस बातचीत में भले ही विवादित अंश समय की दृष्टि से सीमित हों, लेकिन भारतीय फ़िल्म दर्शकों की बदलती संवेदनाओं पर किए गए परोक्ष कटाक्ष इन्हें अलग महत्व देते हैं।

इंटरव्यू के उस हिस्से में, जहाँ साक्षात्कारकर्ता बार-बार मौजूदा सांस्कृतिक माहौल को “तेज़ी से विभाजनकारी” बताने की कोशिश करता है, वहाँ रहमान बिना किसी विशेष प्रतिरोध के इन बातों से सहमति जताते नज़र आते हैं। वे न तो इस धारणा को वैचारिक स्तर पर चुनौती देते हैं और न ही कोई वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने रखते हैं। साक्षात्कारकर्ता भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री की एक अत्यंत सरलीकृत और नाटकीय तस्वीर पेश करता है। वह यह दावा करता है कि 10–15 वर्ष पहले रचनात्मक स्वतंत्रता अपने शिखर पर थी, जब बॉलीवुड कथित तौर पर “प्रोपेगैंडा” से मुक्त था। इसके उलट, हाल के वर्षों को वह एक ऐसे दौर के रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ सिनेमा तेज़ी से विभाजनकारी होता जा रहा है और उसका राजनीतिकरण लगातार बढ़ रहा है।

रहमान इस सोच का समर्थन करते हुए कहते हैं, “कुछ फ़िल्में गलत इरादे से बनाई जाती हैं। मैं ऐसी फ़िल्मों से दूरी बनाए रखता हूँ।” इसके बाद साक्षात्कारकर्ता बातचीत को और आगे बढ़ाते हुए उनसे सीधे पूछता है कि क्या वे छावा को भी विभाजनकारी फ़िल्म मानते हैं। इस पर रहमान सहमति जताते हैं, हालाँकि उनके शब्दों में झिझक और आंतरिक असमंजस साफ़ झलकता है। वे कहते हैं, “यह विभाजनकारी है। मुझे लगता है कि इसने विभाजन को कैश किया है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य बहादुरी दिखाना है[1]।”

छावा विवाद और ऐतिहासिक सच्चाई से असहजता

दिलचस्प तथ्य यह है कि छावा जैसी ऐतिहासिक फ़िल्म के संगीत निर्देशक स्वयं ए.आर. रहमान ही रहे हैं। यह फ़िल्म छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन और विरासत पर केंद्रित है—छत्रपति शिवाजी महाराज के उस वीर पुत्र पर, जिन्होंने मुग़ल साम्राज्य के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। विक्की कौशल अभिनीत यह ब्लॉकबस्टर फ़िल्म वाम–उदारवादी तंत्र के निशाने पर रही है। मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को निर्दयी और क्रूर रूप में दिखाए जाने के कारण इस पर “हिंदू दक्षिणपंथी प्रोपेगैंडा” फैलाने और “इस्लामोफ़ोबिया” भड़काने जैसे जाने-पहचाने आरोप लगाए गए[2]

छावा को “विभाजनकारी” कहकर और भारतीय दर्शकों की संवेदनाओं पर रहस्यमय टिप्पणियाँ करते हुए—यह संकेत देते हुए कि दर्शक “स्मार्ट” हैं और किसी भी नैरेटिव के बहकावे में नहीं आएँगे—रहमान अनजाने में ही हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी तंत्र की भाषा को मज़बूत करते नज़र आते हैं। भारतीय सिनेमा के बदलते विमर्श पर उनकी यह तंज़ भरी और अस्पष्ट टिप्पणियाँ दरअसल उस गहरी बेचैनी को उजागर करती हैं, जो भारत में चल रहे सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को लेकर एक खास वैचारिक समूह के भीतर मौजूद है।

इतिहास के साथ चयनात्मक व्यवहार: बॉलीवुड की पुरानी आदत

बॉलीवुड लंबे समय से ऐसी फ़िल्मों को बढ़ावा देता आया है, जिनमें ऐतिहासिक तथ्यों को सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है और वामपंथी इतिहास-लेखन से गढ़े गए सिनेमाई मिथकों को मज़बूती मिलती है। इंडस्ट्री का रिकॉर्ड साफ़ रहा है—एक ओर मुग़ल आक्रमणकारियों का महिमामंडन, तो दूसरी ओर भारत की स्वदेशी सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत पर रहस्यमय चुप्पी। ताजमहल और मुग़ल-ए-आज़म जैसी क्लासिक फ़िल्मों से लेकर जोधा अकबर और पद्मावत जैसी अपेक्षाकृत नई प्रस्तुतियों तक, बॉलीवुड बार-बार इस्लामी आक्रमणकारियों, विशेष रूप से मुग़लों, को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता रहा है और उन्हें एक रोमांटिक, उदार या महान शासक के रूप में प्रस्तुत करता आया है।

मुख्यधारा का बॉलीवुड सिनेमा पाकिस्तान-समर्थक और भारत-विरोधी विमर्श को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता रहा है। कई फ़िल्मों में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को या तो हल्के में दिखाया गया है, या फिर परोक्ष रूप से मानवीय आवरण में ढक दिया गया है। मैं हूँ ना, मिशन कश्मीर, बजरंगी भाईजान, राज़ी, पीके और पठान जैसी फ़िल्मों ने या तो पाकिस्तानी समाज की आदर्शीकृत छवि प्रस्तुत की है, या फिर भारत को लगातार झेलने पड़े पाकिस्तान-प्रायोजित कट्टरपंथ और आतंकवाद की सच्चाई को जानबूझकर नरम करके दिखाया है। अक्सर इन कथाओं को सीमा-पार प्रेम कहानियों के भावुक आवरण में लपेट दिया जाता है—जहाँ “प्यार राजनीति से ऊपर है” जैसे घिसे-पिटे जुमले, बनावटी मानवीय कोण और भ्रम पैदा करने वाला रोमांटिक तत्त्व मौजूद रहता है, और साथ में अनिवार्य गीत-संगीत भी।

पठान और प्रो-पाकिस्तान नैरेटिव की पड़ताल

स्वराज्य में प्रकाशित एक लेख ने 21वीं सदी में उभरी इस प्रो-पाकिस्तान बॉलीवुड लहर का विस्तार से विश्लेषण किया है। इस लेख का विशेष ध्यान शाहरुख़ ख़ान और दीपिका पादुकोण अभिनीत पठान (2023) पर है—जहाँ ख़ान एक रॉ एजेंट की भूमिका में दिखाई देते हैं, जबकि पादुकोण को आईएसआई की एक ऑपरेटिव के रूप में पेश किया गया है[3]

लेख के अनुसार, फ़िल्म की कथा और प्रस्तुति इस तरह गढ़ी गई है कि पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद की वास्तविकता पृष्ठभूमि में चली जाती है, और उसके स्थान पर एक भावनात्मक तथा मानवीय आवरण सामने आ जाता है। नतीजतन, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्नों की धार कुंद पड़ जाती है, और दर्शक का ध्यान एक ऐसे नैरेटिव की ओर मोड़ दिया जाता है जो भारत-पाक संबंधों की जटिल सच्चाइयों को सरलीकृत कर देता है।

यह प्रवृत्ति किसी एक फ़िल्म तक सीमित नहीं है। बल्कि यह उस व्यापक सोच का हिस्सा है, जिसके तहत मुख्यधारा का बॉलीवुड लंबे समय से ऐसे विषयों को चुनता और प्रस्तुत करता रहा है, जिनसे पाकिस्तान-समर्थक और भारत-विरोधी दृष्टिकोण को अप्रत्यक्ष वैधता मिलती रही है।

बदलाव की आहट और बॉलीवुड की असहज प्रतिक्रिया

लेकिन अब जब बॉलीवुड में परिवर्तन की एक साफ़ लहर दिखाई देने लगी है, और छोटे, स्वतंत्र या अब तक मुख्यधारा से बाहर माने जाने वाले फ़िल्मकार पारंपरिक बॉलीवुड नैरेटिव से बाहर निकलकर द कश्मीर फाइल्स, द केरल स्टोरी, छावा, स्वातंत्र्य वीर सावरकर, द साबरमती रिपोर्ट और धुरंधर जैसी फ़िल्में बना रहे हैं, तो एक खास वैचारिक तंत्र की बेचैनी खुलकर सामने आने लगी है। खासतौर पर धुरंधर की अभूतपूर्व बॉक्स-ऑफिस सफलता ने कई स्थापित हितधारकों को स्पष्ट रूप से असहज कर दिया है।

एक जासूसी–एक्शन थ्रिलर के रूप में धुरंधर एक ऐसे एंटी-टेरर गुप्त अभियान को दिखाती है, जिसमें एक भारतीय अंडरकवर एजेंट पाकिस्तान के कराची शहर के राजनीतिक और आपराधिक अंडरवर्ल्ड में घुसपैठ करता है। फ़िल्म पाकिस्तान को आतंकवाद के एक स्पष्ट और निर्विवाद केंद्र के रूप में प्रस्तुत करती है। इस तरह वह लंबे समय से चले आ रहे “पाकिस्तान-प्रेम” वाले विमर्श को सीधी चुनौती देती है। वाम–उदारवादी मीडिया की एकतरफ़ा और नकारात्मक समीक्षाओं के बावजूद धुरंधर ने बॉक्स-ऑफिस पर रिकॉर्डतोड़ सफलता हासिल की।

फ़िल्म की यह अप्रत्याशित कामयाबी बॉलीवुड की एलीट समीक्षक लॉबी की गहरी बेचैनी को भी उजागर कर गई। चर्चित फ़िल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा को अपनी बेहद नकारात्मक समीक्षा के चलते सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। जैसे ही नेटिज़न्स ने उन्हें घेरा, उन्होंने भी वही जाना-पहचाना पीड़ित कार्ड खेलना शुरू कर दिया और रचनात्मक स्वतंत्रता की दुहाई देने लगीं। इसके तुरंत बाद फ़िल्म क्रिटिक्स गिल्ड—एक स्वयंभू निजी संस्था—ने एक कड़े शब्दों वाला बयान जारी किया, जिसमें धुरंधर की समीक्षाओं को लेकर फ़िल्म समीक्षकों पर हुए कथित “लक्षित हमलों, उत्पीड़न और नफ़रत” की निंदा की गई।

समीक्षक लॉबी और पीड़ित नैरेटिव

हालाँकि कई नेटिज़न्स ने इस पूरी प्रतिक्रिया को संदेह की नज़र से देखा। उन्होंने इस विडंबना की ओर ध्यान दिलाया कि जिन दो समीक्षकों—अनुपमा चोपड़ा और सुचरिता त्यागी—को सार्वजनिक आलोचना का सामना करना पड़ा, वे दोनों ही उसी संस्था के प्रमुख पदाधिकारी हैं, जिसने धुरंधर को लेकर फ़िल्म समीक्षकों पर हुए कथित “हमलों” की निंदा करते हुए बयान जारी किया था[4]

इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल और तेज़ कर दिया कि क्या यह प्रतिक्रिया वास्तव में स्वतंत्र आलोचना की रक्षा के लिए थी, या फिर एक सीमित और बंद दायरे की लॉबी द्वारा अपने ही सदस्यों को बचाने की कोशिश। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे आत्म-पीड़न का एक और उदाहरण बताया—जहाँ आलोचना होते ही संस्थागत ताक़त के ज़रिये नैरेटिव को पलटने की कोशिश की जाती है।

कंगना रनौत, मसाबा गुप्ता और असहज सच्चाइयाँ

ए.आर. रहमान से जुड़े विवाद के बीच अभिनेत्री और नेता कंगना रनौत ने X पर एक दावा किया, जिसने बॉलीवुड के भीतर मौजूद कुछ और असहज सच्चाइयों की ओर ध्यान खींचा। कंगना के अनुसार, फैशन डिज़ाइनर मसाबा गुप्ता ने एक बार स्पष्ट रूप से एक स्टाइलिस्ट से कहा था कि वह कंगना को अपने कॉस्ट्यूम न दें, जब उन्हें यह जानकारी मिली कि कंगना वह परिधान राम जन्मभूमि दर्शन के लिए पहनने वाली हैं।

कंगना रनौत का कहना है कि स्टाइलिस्ट ने किसी संभावित विवाद से बचने के लिए वह साड़ी अपने पैसों से खरीद ली और कंगना से यह भी अनुरोध किया कि वे मसाबा या उनके ब्रांड को टैग न करें। जैसे-जैसे सोशल मीडिया पर मसाबा गुप्ता को हिंदू धर्म के प्रति कथित शत्रुता को लेकर आलोचना और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा, उन्होंने इस पूरे मामले पर कोई सार्वजनिक सफ़ाई देना ज़रूरी नहीं समझा। इसके बाद मसाबा गुप्ता ने अपने हालिया सोशल मीडिया पोस्ट्स पर कमेंट सेक्शन भी बंद कर दिया[5]। यह चुप्पी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

दाऊद गैंग का शिकंजा और हिंदुओं का लक्षित उत्पीड़न

एक समय था जब बॉलीवुड फ़िल्मों में हिंदू-विरोधी संकेतों का सूक्ष्म लेकिन निरंतर इस्तेमाल लगभग सामान्य बात बन चुका था। डकैतों, बदमाशों और अपराधियों के माथे पर तिलक दिखाना आम था। मंदिरों को संदिग्ध या अवैध गतिविधियों के अड्डों के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। यहाँ तक कि हिंदुओं, विशेषकर ठाकुरों, को हिंसक और स्त्री-विरोधी किरदारों में ढाल दिया जाता था। पंडितों को चालाक और षड्यंत्रकारी रूप में दिखाया जाता था। इसके विपरीत, अल्पसंख्यक समुदायों का अक्सर अतिशयोक्तिपूर्ण सकारात्मक चित्रण किया जाता था, जबकि हिंदू पात्रों का लगातार, भले ही सूक्ष्म ढंग से, दानवीकरण किया जाता रहा।

लंबे समय तक, खासकर 1980 और 1990 के दशक में, बॉलीवुड पर एक कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र का प्रभाव बना रहा। इस दौर में कई फ़िल्मों और स्टूडियो के डी कंपनी—दाऊद इब्राहिम और उसके सहयोगियों—से कथित रूप से वित्तपोषित होने की बातें सामने आती रहीं।1990 के दशक में आशिकी जैसी फ़िल्म से लोकप्रिय हुई अभिनेत्री अनु अग्रवाल ने भी बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड की इस साँठ-गाँठ पर खुलकर बात की है। एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने उस दौर की फ़िल्म इंडस्ट्री को “गंदी” बताया और कहा कि उस समय ज़्यादातर फ़ाइनेंसिंग “ऑफ द रिकॉर्ड” होती थी, जहाँ “दाऊद इब्राहिम जैसे लोग पर्दे के पीछे से सब कुछ नियंत्रित करते थे[6]।”

मीडिया रिपोर्ट्स पर भरोसा करें, तो एक समय ऐसा भी था जब बॉलीवुड के कई शीर्ष सितारे अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से अपने संबंधों पर खुलेआम गर्व किया करते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री का इस्तेमाल काले धन को सफ़ेद करने के माध्यम के रूप में किया गया। दाऊद कथित तौर पर अभिनेताओं को महंगे तोहफ़े देता था और फ़िल्म प्रोजेक्ट्स के लिए उदार “लोन” भी उपलब्ध कराता था। ऋषि कपूर और दिलीप कुमार जैसे अभिनेता सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि वे उससे मिल चुके थे[7]

1993 के धमाके, दाऊद का फरार होना और असली पीड़ित

1993 के मुंबई बम धमाकों में अपनी भूमिका सामने आने के बाद जब दाऊद इब्राहिम मुंबई से फरार होकर अंडरग्राउंड चला गया, तब भी एक खास तंत्र की पकड़ बॉलीवुड पर बनी रही। आज जब ए.आर. रहमान वही जाना-पहचाना “पीड़ित” वाला कार्ड खेलते हुए परोक्ष रूप से पूरे देश और उसके समाज को “सांप्रदायिक” ठहराने की कोशिश करते हैं, तो यह याद करना ज़रूरी हो जाता है कि उस दौर में असल पीड़ित कौन थे। डी कंपनी के प्रभाव वाले उस समय में, बार-बार निशाना हिंदू ही बने।

टी-सीरीज़ के मालिक और अपने भक्ति संगीत एल्बमों के लिए व्यापक रूप से पहचाने जाने वाले गुलशन कुमार की दिन-दहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वे उस समय एक मंदिर से बाहर निकल ही रहे थे, जहाँ वे अपनी सुबह की पूजा-अर्चना के लिए गए थे। हिंदूपोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि गोली मारने से पहले हमलावरों ने ताना मारते हुए कहा था, “बहुत पूजा कर ली। अब ऊपर जाकर पूजा करना।” जनवरी 2001 में अब्दुल रऊफ उर्फ़ दाऊद मर्चेंट को कोलकाता से गिरफ्तार किया गया। इसी मामले में चला मुक़दमा 2021 में जाकर समाप्त हुआ, जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने अब्दुल रऊफ की सज़ा को बरकरार रखते हुए उसे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई[8] [9]

हालाँकि गुलशन कुमार की हत्या को लंबे समय तक अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कथित पेशेवर रंजिश के रूप में देखा गया, लेकिन कई आलोचकों ने इस पूरे घटनाक्रम में छिपे हिंदू-विरोधी संकेतों की ओर भी ध्यान दिलाया है। खास तौर पर इस तथ्य को देखते हुए कि निशाना एक ऐसे प्रमुख हिंदू फ़िल्म और संगीत निर्माता को बनाया गया, जिनका ब्रांड खुले तौर पर हिंदू भक्ति संगीत को बढ़ावा देता था। यह पहलू आज भी गहरी पड़ताल और गंभीर जांच की माँग करता है[10]

बॉलीवुड–पाकिस्तान गठजोड़ और उठते सवाल

बॉलीवुड में पाकिस्तानी अभिनेताओं और गायकों की लगातार मौजूदगी—जैसे आतिफ़ असलम, राहत फ़तेह अली ख़ान, अली ज़फ़र, फ़वाद ख़ान, माहिरा ख़ान आदि—ने इंडस्ट्री की भूमिका को लेकर कई वैध सवाल खड़े किए हैं। खास तौर पर यह सवाल कि क्या बॉलीवुड, परोक्ष रूप से ही सही, पाकिस्तान राज्य द्वारा पोषित आतंकवाद और कट्टरपंथ के प्रति एक नरम रुख़ अपनाता रहा है। बॉलीवुड में काम कर चुके कई पाकिस्तानी कलाकार समय-समय पर भारत-विरोधी बयान देते रहे हैं। यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा पैटर्न है जो इस असहज सच्चाई की ओर इशारा करता है कि भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री भारत-विरोधी विमर्श के लिए एक सुविधाजनक मंच बनती जा रही है।

मई 2025 में ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने पाकिस्तानी अभिनेता फ़वाद ख़ान और माहिरा ख़ान के भारत-विरोधी बयानों की कड़ी आलोचना करते हुए एक सख़्त बयान जारी किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, माहिरा ख़ान ने ऑपरेशन सिंदूर को “बेहद कायरतापूर्ण” बताया था, जबकि फ़वाद ख़ान पर आतंकवाद की स्पष्ट निंदा करने से बचते हुए “विभाजनकारी नैरेटिव” का समर्थन करने का आरोप लगा। इन बयानों के बाद AICWA ने भारत में पाकिस्तानी कलाकारों पर पूर्ण प्रतिबंध की अपनी पुरानी मांग को एक बार फिर दोहराया[11]

जब बॉलीवुड निर्माता और फ़िल्मकार भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सरोकारों को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने प्रोजेक्ट्स में लगातार पाकिस्तानी कलाकारों को जगह देते रहते हैं, तो यह रुख़ महज़ संयोग नहीं लगता। ऐसे समय में, जब लाखों भारतीय कलाकार छोटे-मोटे रोल के लिए भी संघर्ष करते हैं, वहीं पाकिस्तानी कलाकारों को न सिर्फ़ काम मिलता है, बल्कि उन्हें रातोंरात स्टार भी बना दिया जाता है। यह प्रवृत्ति एक सोची-समझी प्राथमिकता की ओर इशारा करती है।

अभिजीत भट्टाचार्य का सवाल और देशभक्ति की कसौटी

इस मुद्दे पर प्रसिद्ध बॉलीवुड गायक अभिजीत भट्टाचार्य लंबे समय से खुलकर अपनी बात रखते आए हैं। अक्टूबर 2015 में, मुंबई में पाकिस्तानी कलाकारों के परफॉरमेंस पर शिवसेना द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को लेकर जब विवाद खड़ा हुआ, तब अभिजीत भट्टाचार्य ने इस कदम का समर्थन किया था। इसी संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए उन्हें “डेंगू कलाकार” तक कहा था। अभिजीत भट्टाचार्य ने उस समय भारतीय मीडिया के एक वर्ग पर भी सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि यह वर्ग पाकिस्तानी कलाकारों के प्रचार-प्रसार में आवश्यकता से कहीं अधिक उत्साह दिखाता है। उनका सवाल सीधा और स्पष्ट था—जब पाकिस्तान लंबे समय से भारत के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर, यानी छद्म युद्ध चला रहा है, तो ऐसे में भारतीय समाज अपने मनोरंजन के लिए पाकिस्तानी गायकों और कलाकारों पर निर्भर क्यों रहे[12]?

“मैं कोई ऐसा गीत गाऊँ” (यस बॉस) और “सुनो ना सुनो ना” (चलते चलते) जैसे लोकप्रिय गीतों को आवाज़ देने वाले अभिजीत भट्टाचार्य 1990 और 2000 के शुरुआती वर्षों में काफ़ी चर्चित रहे। इसके बाद वे धीरे-धीरे मुख्यधारा के संगीत जगत से पीछे हटते चले गए। अभिजीत भट्टाचार्य उन गिने-चुने बॉलीवुड कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने हिंदू-समर्थक विचारों को खुलकर और बिना किसी झिझक के सामने रखा है। उनका कहना है कि वे स्वयं को हिंदू, हिंदुत्व और हिंदुस्तान से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए देशभक्ति सर्वोपरि है, और वे देशप्रेम को अपने पेशेवर हितों से भी ऊपर मानते हैं[13]

सूफ़ी संगीत और बॉलीवुड का बदलता सांस्कृतिक स्वर

बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में ए.आर. रहमान ने सूफ़ी संगीत पर विस्तार से बात की और बताया कि यह उनकी आध्यात्मिक यात्रा का एक अहम हिस्सा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि बॉलीवुड के कुछ गाने सूफ़ी संगीत को महज़ एक मार्केटिंग टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिससे उसकी मूल आत्मा और गहराई कमज़ोर पड़ जाती है[14]

यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास उभरता है। जिस तरह रहमान हाल के वर्षों में बॉलीवुड पर एक खास नैरेटिव के प्रभाव में “तेज़ी से विभाजनकारी” होने का आरोप लगाते हैं, उसी तरह यह सवाल भी उठता है कि क्या उन्होंने स्वयं अपने संगीत के ज़रिये, जानबूझकर या अनजाने में, एक विशेष सूफ़ी नैरेटिव को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है। कई अवसरों पर उन्होंने ऐसी फ़िल्मों के संगीत में भी इस्लामिक प्रतीकों और शब्दावली को प्रमुखता दी है, जहाँ पटकथा और कथानक के लिहाज़ से ऐसा संगीत कुछ असंगत या बेमेल सा लगता है। यह बात अलग है कि हिंदू समाज ऐतिहासिक रूप से विविध सांस्कृतिक प्रभावों के प्रति खुला और ग्रहणशील रहा है। इसी उदारता और समन्वय की परंपरा ने उसे सदियों तक जीवंत बनाए रखा है। लेकिन इसी संदर्भ में ‘डेविल्स एडवोकेट’ की भूमिका में यह प्रश्न उठाना भी ज़रूरी हो जाता है कि क्या रचनात्मक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की आड़ में, एक तंत्र-विशेष लंबे समय से सॉफ्ट प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाता रहा है।

बॉलीवुड गीतों के बोलों से संस्कृत-निष्ठ हिंदी शब्दों का लगभग लुप्त हो जाना भी एक ऐसा बदलाव है, जिस पर गंभीर अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता है। इसके विपरीत, गीतों में उर्दू-प्रभावित शब्दावली का प्रयोग लगातार बढ़ा है, जिन पर इस्लामिक सांस्कृतिक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। “इश्क़”, “फ़ना”, “फ़िदा”, “बुतपरस्ती”, “परदानशीं”, “इबादत”, “सजदा” और “जन्नत” जैसे शब्द आज बॉलीवुड गीतों में आम हो चुके हैं, जबकि संस्कृत-आधारित काव्यात्मक भाषा और शब्द-संपदा धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई है।

यह क्रमिक बदलाव—जहाँ उर्दू को सहज और आधुनिक बताकर आगे बढ़ाया जाता है, और संस्कृतनिष्ठ हिंदी को पुराना या बोझिल कहकर पीछे किया जाता है—किसी संयोग से ज़्यादा एक व्यवस्थित प्रवृत्ति जैसा प्रतीत होता है। अक्सर इसे “हिंदुस्तानी” या बोलचाल की भाषा के नाम पर उचित ठहराने की कोशिश की जाती है, जबकि वास्तव में इसका असर सांस्कृतिक संतुलन पर पड़ता है।

रहमान का “सांप्रदायिक” विमर्श और उठते सवाल

बीबीसी इंटरव्यू के बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेज़ी से वायरल हुई, जिसमें वर्ष 2020 की एक घटना की ओर ध्यान दिलाया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रहमान की माँ ने एक तमिल गीतकार से अपने घर में प्रवेश करने से पहले माथे से तिलक हटाने को कहा था। आलोचकों ने इस घटना को हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह के उदाहरण के रूप में देखा।

हिंदूपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, गीतकार और कवि पिरैसूदान एक बार ए.आर. रहमान के घर गए थे। उनके माथे पर विभूति और कुमकुम लगा हुआ था—जो कई आस्थावान हिंदुओं द्वारा धारण किए जाने वाले सामान्य धार्मिक चिह्न हैं। बताया जाता है कि रहमान की माँ करीमा बेगम ने उनसे कहा कि वे उनके घर आते समय कुमकुम और विभूति न लगाएँ। उस समय रहमान भी वहीं मौजूद थे, लेकिन उन्होंने किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया और चुप्पी बनाए रखी। हिंदूपोस्ट के लेख में स्वयं गीतकार का एक छोटा वीडियो क्लिप भी शामिल है, जिसमें वे तमिल भाषा में इस घटना का उल्लेख करते नज़र आते हैं[15] [16]

बीबीसी इंटरव्यू से पहले तक रहमान आम तौर पर खुले तौर पर “सांप्रदायिक” विषयों से दूरी बनाए रखते दिखाई देते थे। हालाँकि, कई मौकों पर उन्होंने हिंदू धर्म से इस्लाम में अपने धर्मांतरण का उल्लेख सूक्ष्म रूप से किया है। वर्ष 2000 के एक इंटरव्यू में रहमान ने कथित तौर पर कहा था कि उन्हें जन्म के समय दिया गया नाम ‘दिलीप’ असहज लगता था, क्योंकि वह उनकी आत्म-छवि से मेल नहीं खाता था। उनकी जीवनी AR Rahman: The Spirit of Music में उल्लेख है कि उनकी माँ ने उनके नाम में “अल्लाह रखा” जोड़ा। यह बदलाव कथित रूप से उन्हें एक सपने में मिले रहस्योद्घाटन से जुड़ा बताया गया है।

2020 में सोशल मीडिया पर रहमान की बेटी की कुछ तस्वीरें भी वायरल हुई थीं, जिनमें उन्हें बुर्का पहने देखा गया। इस पर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने X पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि भले ही वे रहमान के संगीत की प्रशंसक हैं, लेकिन उनकी बेटी को बुर्के में देखकर उन्हें “घुटन” महसूस हुई[17]

समापन टिप्पणी: बॉलीवुड का हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह उजागर

जैसे-जैसे अंडरवर्ल्ड तंत्र की पकड़ बॉलीवुड पर धीरे-धीरे ढीली पड़ती जा रही है, और पारंपरिक मुख्यधारा से बाहर काम करने वाले स्वतंत्र फ़िल्मकारों व प्रोडक्शन हाउसों का प्रभाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इंडस्ट्री के भीतर मौजूद हिंदू-विरोधी सोच दिशाहीन होती दिखाई दे रही है। नतीजतन, वह उसी तथाकथित सेक्युलरिज़्म के बचे-खुचे अवशेषों से चिपकी हुई है, जिसे वर्षों तक उसने आगे बढ़ाया, लेकिन जिसकी प्रासंगिकता अब लगभग समाप्त हो चुकी है।

धुरंधर की असाधारण व्यावसायिक सफलता ने बॉलीवुड में गहराई तक जड़ें जमाए भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी नैरेटिव को एक करारा झटका दिया है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और भारतीय दर्शकों के बीच फैलते सभ्यतागत आत्मबोध के चलते अब ऐसी पटकथाओं को खुलकर नकारा जा रहा है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि इंडस्ट्री की प्रोपेगैंडा मशीनरी स्पष्ट दबाव में नज़र आने लगी है।

जब किसी नैरेटिव को बिना सवाल उठे, सहज रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं रह जाता, तब आख़िरी सहारे के रूप में वही पुराना और जाना-पहचाना “सांप्रदायिक पीड़ित” वाला कार्ड सामने लाया जाता है। ए.आर. रहमान से जुड़ा हालिया विवाद इसी बदलते दौर और उस पर प्रतिक्रिया कर रहे तंत्र की बेचैनी का एक और उदाहरण बनकर सामने आया है।

सन्दर्भ सूची

[1] (62) A.R. Rahman Interview | Roja to Ramayana | International Success | Oscars | AI | – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=GvRPrjPyC8c&t=3417s

[2] The Wire: The Wire News India, Latest News, News from India, Politics, External Affairs, Science, Economics, Gender and Culture;  https://thewire.in/history/aurangzeb-chhaava-indian-history

[3] One-Sided Pakistan Love In Bollywood; https://swarajyamag.com/culture/one-sided-pakistan-love-in-bollywood

[4] Film Critics Guild’, headed by critics Anupama Chopra and Sucharita Tyagi, condemns criticism of their Dhurandhar reviews; https://www.opindia.com/news-updates/film-critics-guild-headed-by-critics-anupama-chopra-and-sucharita-tyagi-condemns-criticism-of-their-dhurandhar-reviews/

[5] Masaba Gupta disables Instagram comments after Kangana Ranaut’s saree allegation? – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/fashion/buzz/masaba-gupta-disables-instagram-comments-after-kangana-ranauts-saree-allegation/articleshow/126789760.cms

[6] Anu Aggarwal exposes Bollywood’s 90s underworld ties: ‘Ruled by Dawood Ibrahim…It was a dirty business’ | – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/anu-aggarwal-exposes-bollywoods-90s-underworld-ties-ruled-by-dawood-ibrahim-it-was-a-dirty-business/articleshow/121252376.cms

[7] Rishi Kapoor, Dilip Kumar openly spoke about meeting Dawood Ibrahim: ‘It was a thing to be proud of, he gave expensive gifts’ | Hindi Movie News – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/rishi-kapoor-dilip-kumar-openly-spoke-about-meeting-dawood-ibrahim-it-was-a-thing-to-be-proud-of-he-gave-expensive-gifts/articleshow/119105110.cms

[8] The Gulshan Kumar Murder Case: A Recap – India Today;  https://www.indiatoday.in/movies/celebrities/story/gulshan-kumar-murder-case-a-recap-1821531-2021-07-01

[9] The Gulshan Kumar Murder Case: A Recap – India Today;  https://www.indiatoday.in/movies/celebrities/story/gulshan-kumar-murder-case-a-recap-1821531-2021-07-01

[10] Ibid.

[11] AICWA Condemns Mahira Khan And Fahad Khan Over “Anti-India” Remarks, Reiterates Ban On Pakistani Artists;  https://www.ndtv.com/entertainment/aicwa-condemns-mahira-khan-and-fawad-khan-over-anti-india-remarks-reiterates-ban-on-pakistani-artists-8361794

[12] Expose anti-Hindu media and intellectuals in India, says star singer Abhijeet Bhattacharya. | Struggle for Hindu Existence; https://hinduexistence.org/2015/10/21/expose-anti-hindu-media-and-intellectuals-in-india-says-star-singer-abhijeet-bhattacharya/

[13] I am associated with Hindu, Hindutva and Hindustan: Abhijeet Bhattacharya | Hindustan Times;  https://www.hindustantimes.com/music/i-am-associated-with-hindu-hindutva-and-hindustan-abhijeet-bhattacharya/story-2jKsZECLgzZcTYnBUgRMNM.html

[14] A.R. Rahman Interview | Roja to Ramayana | International Success | Oscars | AI | – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=GvRPrjPyC8c&t=3417s

[15] A.R. Rehman’s mother asked Hindu lyricist to remove tilak if he was to enter the house!; https://hindupost.in/news/a-r-rehman-mother-refused-tilak-sporting-hindu-entry-in-house/

[16] A.R. Rahman’s mother had asked Tamil poet Piraisoodan to remove Tilak;   https://www.opindia.com/2020/07/piraisoodan-a-r-rahman-mother-remove-vibhuti-kumkum-tilak/

[17] A.R. Rahman Removes his Façade: The Real Picture is Hideous;  https://www.dharmadispatch.in/commentary/ar-rahman-removes-his-facade-the-real-picture-is-hideous

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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