साझी स्मृतियाँ, साझा चुनौतियाँ: बढ़ते उग्रवाद के दौर में हिंदू–यहूदी सहयोग का नया दौर

जब उग्रवादी विचारधाराएँ और ध्रुवीकृत नैरेटिव सार्वजनिक बहस को प्रभावित कर रहे हैं, तब हिंदू और यहूदी समुदाय अपनी साझा ज़मीन को अधिक स्पष्ट रूप से पहचान रहे हैं। सभ्यतागत विरासत, प्रवासी अनुभवों और धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक गरिमा तथा बहुलतावाद की रक्षा के साझा संकल्प के कारण दोनों समुदाय लोकतांत्रिक समाजों में एक-दूसरे के और करीब आते दिखाई दे रहे हैं।

सारांश
हिंदू और यहूदी, दुनिया की दो सबसे प्राचीनतम सभ्यताएँ हैं, जिनकी साझा जड़ें इतिहास के पन्नों में बहुत दूर तक जाती हैं। ये दोनों सभ्यताएँ समान नैतिक परंपराएँ के सूत्र में बँधी हुई हैं और आधुनिक समाजों में कई मिलती-जुलती चुनौतियाँ भी साझा करती हैं। इतिहास में व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से लेकर उत्पीड़न के अनुभवों और प्रवासी समुदायों की सहनशीलता और जुझारूपन तक, दोनों के बीच लंबे समय से संबंध रहे हैं। हाल के वर्षों में बढ़ते एंटीसमिटिज़म यानी यहूदी-विरोधहिंदूफोबिया, और उग्रवादी विचारधाराओं ने हिंदू और यहूदी संगठनों के बीच के सहयोग को और भी तेज़ किया है –  विशेषकर पश्चिमी देशों में। अंतरधार्मिक संवाद, जन-पहल और नागरिक भागीदारी के ज़रिये दोनों समुदाय अब एक मज़बूत आपसी एकजुटता का नेटवर्क खड़ा करने लगे हैं। साझा मूल्यों और ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित यह उभरती साझेदारी आगे चलकर बहुलतावाद और सांस्कृतिक निरंतरता की रक्षा करने वाली एक स्थायी साझेदारी का रूप ले सकती है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की इज़राइल यात्रा भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में छाई रही। अधिकांश कवरेज इस यात्रा के भू-राजनीतिक प्रभावों पर केंद्रित रही, विशेषकर आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता के परिपेक्ष्य  में भारत और इज़राइल के बीच मज़बूत होती रणनीतिक साझेदारी पर। कूटनीतिक स्तर पर भी यह यात्रा विशेष महत्व रखती थी, क्योंकि मोदी इज़राइल की संसद में संबोधन देने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने।

लेकिन इस यात्रा का महत्व केवल कूटनीति और रणनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं था। अपने संबोधन में मोदी ने भारत और यहूदी समुदाय के बीच कहीं अधिक पुराने सभ्यतागत संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने उन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक समानताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिन्होंने सदियों से इन दोनों परंपराओं को जोड़े रखा है। भारत और यहूदी समुदाय के घनिष्ठ सभ्यतागत संबंधों का ये लेखा-जोखा उस महत्वपूर्ण कथानक की ओर इशारा करता है, जिस पर अक्सर भू-राजनीतिक विश्लेषणों में अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।

दरअसल, हिंदुओं और यहूदियों के बीच संबंध केवल आज के रणनीतिक हितों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि साझा सभ्यतागत अनुभवों में गहराई से निहित हैं। दोनों समुदाय दुनिया की सबसे प्राचीन परंपराओं में से हैं, ऐसी परंपराएँ, जिन्हें पवित्र भूगोल, मज़बूत सांस्कृतिक पहचान, और लंबे प्रवासी इतिहास ने आकार दिया है।

हाल के वर्षों में ये गहरे संबंध और भी अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। पश्चिमी समाजों में हिंदू और यहूदी समुदायों के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है, विशेषकर ऐसे समय में जब दोनों समुदाय तेज़ी से बढ़ते हुए यहूदी-विरोध यानी एंटीसमिटिज़म और हिंदूफोबिया यानी हिंदू-विरोध का दंश झेल रहे हैं।

इस लेख के आगे के भागों में हिंदू–यहूदी एकजुटता के उभार को सभ्यतागत संदर्भ में देखा जाएगा, और यह समझने का प्रयास होगा कि कौन से ऐतिहासिक रिश्ते, साझा आदर्श और आज की परिस्थितियाँ इस निकटता को गहरा कर रही हैं।

सभ्यतागत संबंध

भारत और यहूदी समुदाय के बीच सभ्यतागत रिश्ते आधुनिक राष्ट्र–राज्यों के उदय से भी पहले के हैं। उदाहरण के लिए, बुक ऑफ इस्थर (Book of Esther) में भारत का उल्लेख “होदू (Hodu)” के रूप में मिलता है, जबकि ताल्मूद (Talmud) में प्राचीन काल में भारत के साथ व्यापार के संदर्भ मिलते हैं। यहूदी व्यापारी भूमध्यसागर और हिंद महासागर को जोड़ने वाले समुद्री मार्गों पर यात्रा करते थे, जहाँ वे व्यापार और नए अवसरों की तलाश में आते-जाते थे[1]

कुछ इतिहासकार इन व्यापारिक संबंधों की जड़ें बाइबिल के राजाओं, डेविड और सोलोमन, के काल तक ले जाते हैं। प्राचीन टेस्टामेंट में ऐसे व्यापारिक जहाज़ों के बेड़ों का उल्लेख है, जो हर कुछ वर्षों में लौटते थे और अपने साथ सोना, चाँदी, हाथीदाँत तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर आते थे। इसमें समृद्ध ओफिर (Ophir) राज्य का भी उल्लेख मिलता है, जो मोती, चंदन और कीमती धातुओं के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। कुछ विद्वान मानते हैं कि ओफिर संभवतः पश्चिमी भारत में रहा होगा, शायद प्राचीन अभिर (Abhira) राज्य से जुड़ा हुआ, हालाँकि इसकी सटीक भौगोलिक स्थिति को लेकर आज भी बहस जारी है[2]

व्यापार से आगे बढ़कर, भारत कई बार यहूदी समुदायों के लिए शरणस्थली भी बना। इसका एक प्रारंभिक उदाहरण 70 ईस्वी में रोमन साम्राज्य द्वारा यरुशलम के विनाश के बाद देखने को मिलता है। परंपरागत कथाओं के अनुसार, उस समय यहूदी शरणार्थियों का एक समूह केरल के मालाबार तट पर पहुँचा, खासकर कोडुंगल्लूर में। स्थानीय शासकों ने उनका स्वागत किया और उन्हें भूमि प्रदान की, जिससे वे सम्मान के साथ रह सकें और अपने धर्म का स्वतंत्र रूप से पालन कर सकें। समय के साथ, दुनिया के कई हिस्सों में सताए गए यहूदी समूह भारत पहुँचे और उन्हें यहाँ शरण मिली, जिससे इस भूमि पर स्थायी यहूदी समुदायों का विकास हुआ[3]

इन ऐतिहासिक संपर्कों के साथ-साथ कुछ रोचक सांस्कृतिक कथाएँ भी प्रचलित रही हैं, जो दोनों परंपराओं के संभावित साझा मूल की कल्पना करती हैं। टाइम्स ऑफ़ इज़राइल जैसे मीडिया प्रकाशनों में छपे आधुनिक लेखों में यहूदी-यदुवंशी परिकल्पना से जुड़ी कुछ चर्चायें देखने को मिलती हैं। इस लोककथा के अनुसार, यहूदी लोग दरअसल कृष्ण से जुड़े यदुवंशी क्षत्रिय वंश के वंशज थे। एक कथा यह भी कहती है कि जब प्राचीन नगरी द्वारका समुद्र में समा गई, तब उस समुदाय के कुछ लोग पश्चिम की ओर निकल गए और आगे चलकर “हिब्रू” कहलाए। हालाँकि इस तरह की कथाओं का ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, फिर भी वे यह दिखाती हैं कि अलग-अलग सभ्यताओं की सांस्कृतिक स्मृतियाँ कभी-कभी दूर-दराज़ के संबंधों को समझाने के लिए किस तरह की कल्पनाशील कथाएँ गढ़ लेती हैं[4]

व्यापार, प्रवासन और साझा सांस्कृतिक कल्पनाओं, इन सभी के माध्यम से विकसित हुआ यह लंबा इतिहास बताता है कि इन दोनों परंपराओं का रिश्ता जिज्ञासा, आदान-प्रदान और परस्पर स्वीकार्यता के आधार पर आकार लेता रहा है।

साझी परंपराएँ और मूल्य

हिंदू और यहूदी दोनों ही प्राचीन सभ्यतागत परंपराओं के प्रतिनिधि हैं। उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान अपने-अपने पवित्र भूगोल से गहराई से जुड़ी है—यहूदियों के लिए इज़राइल और हिंदुओं के लिए भारत[5]

इन परंपराओं के मूल ग्रंथ भी इन्हीं भूभागों में विकसित हुए। वेद, जो हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं, भारत में रचे गए; वहीं हिब्रू बाइबिल—जिसे तनाख (Tanakh) या ओल्ड टेस्टामेंट भी कहा जाता है, प्राचीन इज़राइल और यहूदा के राज्यों में आकार लेती है। दोनों परंपराओं के प्रवासी समुदायों के लिए ये भूमियाँ भौगोलिक स्थान मात्र नहीं हैं, बल्कि स्थायी सभ्यतागत आधार हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी साझा स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखते हैं।

हिंदू धर्म और यहूदी धर्म के बीच एक और महत्वपूर्ण समानता उनकी गैर-प्रचारक प्रवृत्ति है। इन दोनों परंपराओं ने इतिहास में वैसी व्यापक मिशनरी संरचनाएँ विकसित नहीं कीं, जैसी कुछ विस्तारवादी धर्मों में देखने को मिलती हैं। इसके बजाय, दोनों ने अपनी-अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के भीतर विकसित होकर विरासत में मिली परंपराओं के संरक्षण पर जोर दिया। इसी कारण कई समाजों में हिंदू और यहूदी समुदाय अन्य आस्थाओं के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रहे हैं, और साथ ही अपनी सांस्कृतिक व सभ्यतागत पहचान भी मज़बूती से बनाए हुए हैं। हालाँकि, उनकी यह प्रवृत्ति कभी-कभी इन समुदायों को गलत चित्रण, विकृतीकरण और धार्मिक कट्टरता से उपजी शत्रुतापूर्ण भावनाओं का लक्ष्य भी बना देती है। इस संदर्भ में, पिछले कुछ दशकों में विश्व के कई क्षेत्रों में एंटीसेमिटिज़्म और हिंदूफोबिया (हिन्दुद्वेष) के मामलों में तेज़ बढ़ोतरी देखी गई है, जो गहरी चिंता का विषय है।

धार्मिक आचरण और विश्वदृष्टि के स्तर पर भी इन दोनों परंपराओं में कई दिलचस्प समानताएँ दिखाई देती हैं। दोनों में अनुष्ठानिक शुद्धता, पवित्र भूगोल, और दैनिक जीवन के आचरण को लेकर विस्तृत नियमों पर ज़ोर दिया जाता है। जाने माने विद्वान नेथन कैट्ज़ ने दोनों परंपराओं में जल-संबंधी अनुष्ठानों के महत्व की ओर ध्यान आकर्षित है। हिंदू मंदिरों में अनुष्ठानिक स्नान के लिए बने कुंड और सरोवर मंदिर स्थापत्य का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। इसी तरह यहूदी परंपरा में मिक्वेह (mikveh) नामक जलाशय होता है, जहाँ शुद्धिकरण के लिए धार्मिक स्नान किया जाता है। खान-पान के नियमों को लेकर भी दोनों संस्कृतियों में कई सी समानताएँ देखने को मिलती हैं। जैसे कि बहुत से हिंदू अहिंसा के सिद्धांत के आधार पर शाकाहार का पालन करते हैं, और यहूदी समुदाय कोशर (kosher) आहार नियमों का पालन करता है।

पवित्र स्थलों का महत्व भी दोनों परंपराओं में अत्यंत केंद्रीय है। हिंदुओं की धार्मिक मान्यताओं में कैलाश पर्वत और वाराणसी जैसे स्थान विशेष महत्व रखते हैं। वहीं यहूदियों का आध्यात्मिक केंद्र यरूशलम है, विशेषकर वह क्षेत्र जिसे टेम्पल माउंट कहा जाता है। ये स्थान केवल तीर्थ नहीं हैं बल्कि लंबे समय से चली आ रही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक भी हैं[6]

विद्वानों ने दोनों परंपराओं के नैतिक ढाँचों में भी कुछ रोचक समानताएँ देखी हैं। यहूदी परंपरा का नैतिक सिद्धांत तिक्कुन ओलाम (tikkun olam), जिसे अक्सर विश्व को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी के रूप में समझा जाता है, हिंदू दर्शन के “वसुधैव कुटुंबकम्” के विचार से मेल खाता है, जिसमें पूरे विश्व को एक परिवार माना जाता है। इसी तरह यहूदी विधिक परंपरा हलाखा (Halakha), जो जीवन के दैनिक आचरण को नियमों और प्रथाओं के माध्यम से निर्देशित करती है, हिंदू समुदाय की धर्म की अवधारणा की स्मृति कराती है, एक ऐसा ढाँचा जो नैतिक कर्तव्य और सदाचारपूर्ण जीवन पर बल देता है[7]

त्योहारों के स्तर पर भी सांस्कृतिक समानताएँ दिखाई देती हैं। यहूदियों के त्योहार हनुक्का (Hanukkah), जिसमें मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं, की तुलना अक्सर हिंदू पर्व दीपावली से की जाती है। इसी तरह रंगों और उल्लास से भरा हिंदू पर्व होली, यहूदी पर्व पुरिम (Purim)से कुछ हद तक मेल खाता है; दोनों ही अच्छाई की बुराई पर विजय का उत्सव मनाते हैं[8]

शोधकर्ताओं ने हिंदू और यहूदी सभ्यताओं के बीच और भी बहुत सी समानताओं के ब्यौरे प्रस्तुत किए हैं। Pharos Journal of Theology में प्रकाशित एक अध्ययन में डी. वल्लभ (D. Vallabh) बताते हैं कि दोनों परंपराएँ पवित्र स्थलों में प्रवेश से पहले शुद्धिकरण की विधियाँ निर्धारित करती हैं, और धार्मिक पर्वों के आयोजन के लिए चंद्र कैलेंडर का उपयोग करती हैं। इसी तरह योम किप्पुर (Yom Kippur) के उपवास और हिंदू परंपरा के अन्तर्गत रखा जाने वाला नवरात्रि का व्रत, दोनों ही आध्यात्मिक अनुशासन और आत्मचिंतन पर बल देते हैं[9]

शायद इन दोनों परंपराओं को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी उनकी धार्मिक सहिष्णुता की दीर्घकालिक प्रकृति है। इतिहास में अनेक बार उत्पीड़न का सामना करने के बावजूद, दोनों समुदायों ने सामान्यतः अन्य संस्कृतियों और आस्थाओं के साथ सह-अस्तित्व की भावना बनाए रखी है[10]

देखा जाये तो बहुलतावाद और सभ्यतागत निरंतरता का यह स्थायी भाव ही हिंदू और यहूदी सभ्यताओं को एक सूत्र में बांधने वाले सबसे गहरे संबंधों में से एक है।

उत्पीड़न के समानांतर इतिहास

यहूदी समुदाय की सामूहिक स्मृति पर होलोकॉस्ट की भयावह त्रासदी की गहरी छाप है। अनेक यहूदियों के लिए यह घटना आज भी एक केंद्रीय ऐतिहासिक स्मृति बनी हुई है, जो उनके सामुदायिक मानस और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को गहराई से प्रभावित करती है। इसी तरह हिंदू समुदाय के बड़े हिस्से भी हिंसा और विस्थापन की स्मृतियों के साथ जीते हैं, ऐसी स्मृतियाँ जो दशकों के अनुभवों से आकार लेती रही हैं। इनमें सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक 1990 के दशक की शुरुआत में हुआ कश्मीरी पंडितों का पलायन है। इसी तरह पूर्वी पाकिस्तान में भी बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान और उसके बाद हिंदू समुदाय को व्यापक हिंसा का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में रहने वाले हिंदू अल्पसंख्यकों को आज भी समय-समय पर उत्पीड़न की घटनाओं का सामना करना पड़ता है।

कई चिंतकों का मानना है कि इन ऐतिहासिक अनुभवों की स्मृतियों को सार्वजनिक विमर्श में कई बार या तो सिरे से नकार दिया जाता है या उनका महत्व कम करके दिखाया जाता है। कुछ हद तक इसी प्रकार की बहस इज़राइल की सुरक्षा स्थिति को लेकर भी देखने को मिलती है। इज़राइली समाज को हमास और हिज़्बुल्लाह जैसे उग्रवादी समूहों के हमलों का बार-बार सामना करना पड़ा है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कुछ हिस्सों में इन घटनाओं को अक्सर तीव्र रूप से ध्रुवीकृत कथनों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इज़राइल में यहूदी नागरिकों पर हमले और भारत में हिंदुओं को निशाना बनाने वाली घटनाएँ अक्सर उन उग्रवादी विचारधाराओं से जुड़ी बताई जाती हैं, जो धार्मिक आधार पर हिंसा को उचित ठहराती हैं। दोनों ही समुदायों की यह धारणा है कि संघर्ष, सुरक्षा और धार्मिक उग्रवाद पर होने वाली वैश्विक चर्चाओं में उनकी पीड़ा को पर्याप्त मान्यता नहीं मिलती।

नया मोर्चा: हिंदूफोबिया और यहूदी-विरोध

हाल के वर्षों में कई चिंतकों ने इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि पश्चिमी समाजों में कुछ कट्टरपंथी इस्लामिस्ट नेटवर्क्स और “वोक” तंत्र के कुछ हिस्सों के बीच एक ऐसा गठजोड़ उभरता दिख रहा है जो हिंदू और यहूदी समुदायों को निशाना बनाता है। इन प्रवासी समुदायों से जुड़े संगठन या व्यक्ति जब अपने समुदायों से जुड़े मुद्दों पर आवाज़ उठाते हैं, तो उन्हें अक्सर तीखी आलोचना, सार्वजनिक दबाव अभियानों, और एक विशिष्ट वैचारिक एजेंडे के तहत गढ़ी गयी भाषा में लगाए गए आरोपों का सामना करना पड़ता है।

जो हिंदू या यहूदी धार्मिक भेदभाव, आतंकवाद या समुदाय की सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाने की कोशिश करते हैं, उन्हें “इस्लामोफोबिया” फैलाने का आरोप झेलना पड़ता है। ऐसे विमर्शों में “हिंदू फ़ंडामेंटलिस्ट” (हिंदू कट्टरपंथी) या “ज़ायनिस्ट” जैसे लेबल अक्सर एक तरह के शाब्दिक आडंबर के औज़ार बन जाते हैं, जिनका इस्तेमाल इन समुदायों की आवाज़ों को अवैध ठहराने और खुली चर्चा को हतोत्साहित करने के लिए किया जाता है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता रिचर्ड बेनकिन का तर्क है कि पश्चिमी सार्वजनिक विमर्श में हिंदू और यहूदी समुदाय कुछ समान चुनौतियों और असुरक्षाओं का सामना करते हैं। मिडिल ईस्ट फोरम में प्रकाशित एक साक्षात्कार में बेनकिन के अनुसार, दोनों समुदाय कई बार एक ही तरह के वैचारिक विरोधियों से जूझते हैं, इस लिए इन के बीच सहयोग की भावना स्वाभाविक है। उसी साक्षात्कार के अनुसार इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC), काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR), स्टैंड विद कश्मीर, और फ्रेंड्स ऑफ कश्मीर सरीखे कई एक्टिविस्ट संगठन भारत और इज़राइल की सरकारों की आलोचना करने वाले अभियानों में सक्रिय रहे हैं। ये अभियान अक्सर अपनी आलोचना को मानवाधिकारों की भाषा में प्रस्तुत करते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि कई बार ये अभियान व्यापक वैचारिक विमर्श का हिस्सा प्रतीत होते हैं, जो भारत को “हिंदुत्व राज्य” और इज़राइल को मूलतः दमनकारी व्यवस्था के रूप में चित्रित करते हैं[11]

इसी साक्षात्कार में यह भी कहा गया है कि हिंदू–यहूदी एकजुटता को बढ़ाने की कोशिशों को कुछ एक्टिविस्ट समूहों से विरोध का सामना करना पड़ा है, जो ऐसे सहयोग को राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण मानते हैं। उदाहरण के लिए, इस्लामोफोबिया स्टडीज़ सेंटर ने हिंदू और यहूदी संगठनों के बीच बनने वाले गठबंधनों की आलोचना की है और उन्हें वैचारिक रूप से समस्याग्रस्त बताया है। हालाँकि हिंदू–यहूदी सहयोग के समर्थकों का तर्क है कि इस तरह के आरोप निराधार हैं और अक्सर दोनों समुदायों के बीच उभरते सहयोग को कमजोर करने की कोशिश करते हैं[12]

नेटवर्क कंटेज़न रिसर्च इंस्टीट्यूट (NCRI) के शोध ने भी ऑनलाइन माध्यमों में हिंदुओं और यहूदियों के खिलाफ़ फैलने वाली शत्रुतापूर्ण प्रवृत्तियों का अध्ययन किया है। इन अध्ययनों में सोशल मीडिया पर फैलने वाले यहूदी-विरोधी और हिंदू-विरोधी नैरेटिव्स के बीच कई चौंकाने वाली समानताएँ सामने आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, डिजिटल मंचों पर दोनों समुदायों को निशाना बनाने वाली अमानवीय छवियाँ, षड्यंत्र सिद्धांत और घृणित मीम्स अक्सर तेज़ी से फैलते हैं। इन रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस तरह की सामग्री का प्रसार अक्सर तब और बढ़ जाता है, जब वास्तविक दुनिया में हिंसा की घटनाएँ, जैसे आतंकवादी हमले या सांप्रदायिक तनाव की वारदाते, सामने आती हैं[13] [14]

हिंदू–यहूदी एकजुटता का उदय

हाल के वर्षों में पश्चिमी समाजों में एक ऐसे हिंदू–यहूदी सहयोग के उदय के संकेत दिखाई देने लगे हैं, जिसे बढ़ते एंटीसमिटिज़म, हिंदूफोबिया और कट्टरपंथी इस्लामिस्ट उग्रवाद को लेकर साझा चिंताओं ने आकार दिया है। यह साझेदारी अभी शुरुआती चरण में है, और अभी तक किसी पूर्णतः संस्थागत वैश्विक आंदोलन का रूप नहीं ले पाई है। फिर भी नागरिक पहलों, सामुदायिक नेटवर्कों और साझा जन-पहल के माध्यम से इसका स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा है। जो संवाद कभी समुदायों के नेताओं के बीच अनौपचारिक बातचीत के रूप में शुरू हुआ था, वह अब दोनों प्रवासी समुदायों को प्रभावित करने वाली चुनौतियों से निपटने के व्यापक प्रयास में बदलता दिख रहा है।

अमेरिका में, जहाँ हिंदू और यहूदी समुदायों की नागरिक भागीदारी की परंपरा लंबे समय से रही है, सहयोग के नेटवर्क विशेष रूप से विस्तार लेते दिखाई दे रहे हैं। दोनों परंपराओं के सामुदायिक नेता, विद्वान और कार्यकर्ता अब भेदभाव, विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़ती शत्रुता, आतंकवाद और भू-राजनीतिक तनाव जैसे मुद्दों पर साझा चर्चा के लिए अधिकाधिक साथ आ रहे हैं। इस सहयोग का एक स्पष्ट उदाहरण अक्टूबर 2025 में देखने को मिला, जब हिंदू और यहूदी नेताओं ने अमेरिका के सात शहरों में एक संयुक्त व्याख्यान यात्रा (speaking tour) में भाग लिया। इस पहल का उद्देश्य दोनों समुदायों के बीच संबंधों को मज़बूत करना और दोनों समुदायों को लेकर तेज़ी से फैलते पूर्वाग्रह या पक्षपाती दृष्टिकोण के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। HinduACTion द्वारा आयोजित इस यात्रा में नागरिक कार्यकर्ता, नीति-विशेषज्ञ, धार्मिक नेता और सामुदायिक आयोजक शामिल हुए। कार्यक्रम न्यूयॉर्क, टेक्सास, ओहायो, सैन फ़्रांसिस्को बे एरिया, वॉशिंगटन डी.सी., और लॉस एंजिलिस जैसे शहरों में आयोजित किए गए।

यह पहल अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इज़राइल पर किए गए हमलों की दूसरी वर्षगाँठ के आसपास हुई। यह यात्रा उस समय भी हुई जब SB 509 जैसे विधायी प्रस्तावों को लेकर चर्चा चल रही थी, जिसमें क़ानून-प्रवर्तन एजेंसियों को “transnational repression” से जुड़े मुद्दों पर प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी। कुछ हिंदू संगठनों ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए कहा कि इससे एक ऐसे नैरेटिव को बल मिल सकता है जो हिंदू संगठनों को अनुचित रूप से निशाना बनाते हैं[15]

इस व्याख्यान-यात्रा के दौरान वक्ताओं ने उन संस्थागत पक्षपातों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जिन्हें उनके अनुसार अमेरिका में दोनों समुदायों को झेलना पड़ता है, खासकर शैक्षणिक और विश्वविद्यालयी परिवेश में। वक्ताओं ने चर्चा की कि सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और कुछ एक्टिविस्ट नेटवर्कों में कभी-कभी भारत और इज़राइल के बारे में ऐसे नैरेटिव सामने आते हैं, जो उनके अनुसार हिंदू और यहूदी समुदायों के अनुभवों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करते। इन सत्रों में भेदभाव से निपटने की व्यावहारिक रणनीतियों, सामुदायिक वकालत को मज़बूत करने और सार्वजनिक विमर्श में अपनी आवाज़ और उपस्थिति को और अधिक स्पष्ट बनाने के तरीकों पर भी चर्चा हुई[16]

ऐसे सहयोग का एक और उदाहरण अक्टूबर 2023 में वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित एक कांग्रेसनल ब्रीफिंग के दौरान सामने आया, जहाँ हिंदू और यहूदी संगठनों के प्रतिनिधियों ने उत्तरी अमेरिका में बढ़ते यहूदी-विरोध और हिंदूफोबिया पर चर्चा की। वक्ताओं ने उग्रवादी हिंसा और उन वैचारिक परिवेशों को लेकर चिंता व्यक्त की, जिन्हें वे दोनों समुदायों के खिलाफ़ बढ़ती शत्रुता का कारण मानते हैं[17]

हालाँकि इस तरह के संबंधों को विकसित करने के प्रयास नए नहीं हैं। हिंदू और यहूदी धार्मिक नेताओं के बीच संवाद कई दशकों से चलता आया है। एक महत्वपूर्ण पड़ाव 2008 में आया, जब द्वितीय हिंदू–यहूदी नेतृत्व शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इस बैठक में हिंदू धर्माचार्य सभा के प्रतिनिधियों ने इज़राइल के मुख्य रब्बिनेट के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। सम्मेलन के बाद जारी घोषणा-पत्र में कई साझा आध्यात्मिक सिद्धांतों पर ज़ोर दिया गया, जैसे सर्वोच्च दैवीय सत्ता के प्रति श्रद्धा, और जीवन की पवित्रता व धार्मिक विविधता का सम्मान। इसमें यह भी कहा गया कि अलग-अलग आस्थाएँ अपने-अपने समुदायों के लिए पवित्र मूल्य रखती हैं, और किसी भी धर्म को दूसरे धर्म को नीचा दिखाने का स्वाभाविक अधिकार नहीं है[18]

पिछले कुछ वर्षों में, खासकर 2023 के बाद, हिंदू–यहूदी संवाद और सहयोग अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम,[19] और ऑस्ट्रेलिया[20] जैसे देशों में और भी अधिक तेज़ हुआ है। अंतरधार्मिक संवाद, नागरिक पहलों, और साझा अभियानों के माध्यम से दोनों समुदाय अब भेदभाव से निपटने के साथ-साथ उस साझेदारी को भी मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी जड़ें उनके साझा सभ्यतागत अनुभवों में निहित हैं।

समापन

हिंदू और यहूदी समुदायों के बीच गहरे सभ्यतागत संबंध, मिलते-जुलते नैतिक मूल्य और पश्चिमी समाजों में सामने आती कई समान चुनौतियाँ दिखाई देती हैं। दोनों प्रवासी समुदायों के पास लंबी ऐतिहासिक स्मृतियाँ, मज़बूत सांस्कृतिक पहचान, और अपनी परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए अपने-अपने देशों के नागरिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने की प्रतिबद्धता है। यही साझा अनुभव ऐसे समय में सहयोग की एक स्वाभाविक आधारभूमि तैयार करते हैं, जब दोनों समुदाय बढ़ते यहूदी-विरोध, हिंदूफोबिया और वैचारिक शत्रुता का सामना कर रहे हैं।

लेकिन इन दोनों प्रवासी समुदायों की संस्थागत यात्रा काफ़ी अलग रही है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यहूदी समुदायों ने ऐतिहासिक अनुभवों से सीखते हुए अपने अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए मज़बूत प्रतिनिधित्व संगठनों, शोध संस्थानों और मीडिया मंचों का व्यवस्थित निर्माण किया। समय के साथ ये संस्थाएँ केवल समुदाय की आवाज़ ही नहीं बनीं, बल्कि उसकी सामूहिक सुरक्षा, सार्वजनिक प्रभाव और राजनीतिक भागीदारी के स्थायी स्तंभ भी बन गईं।

इसके विपरीत, हिंदू प्रवासी समुदाय की संस्थागत यात्रा अपेक्षाकृत धीमी और सीमित रही। पश्चिमी देशों में बड़े पैमाने पर हिंदू प्रवासन मुख्यतः 1960 के दशक के मध्य के बाद तेज़ हुआ, जब नस्लीय और धार्मिक बहिष्कार की नीतियाँ पहले ही काफ़ी हद तक कम हो चुकी थीं। ऐसे में अनेक हिंदू प्रवासियों ने अपनी ऊर्जा मुख्यतः पेशेवर सफलता, आर्थिक उन्नति और सामाजिक समावेशन पर केंद्रित की। परिणामस्वरूप, समुदाय के अधिकारों की वकालत करने वाले ढाँचों या सार्वजनिक विमर्श को दिशा देने वाली संस्थाओं के निर्माण पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।

आज ऐसी संस्थागत क्षमता की आवश्यकता अधिक स्पष्ट होती जा रही है। यहूदी अनुभव से सीख लेते हुए कई हिंदू संगठन अब वकालती नेटवर्क, बौद्धिक ढाँचों और नैरेटिव-निर्माण करने वाली संस्थाओं में अधिक गंभीरता से निवेश करने लगे हैं, ताकि समुदाय के हितों की रक्षा हो सके और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मज़बूती मिल सके।

यदि इस उभरती हुई हिंदू–यहूदी साझेदारी को सावधानी और दूरदृष्टि के साथ विकसित किया जाए, तो यह केवल अस्थायी हित-सामंजस्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रूप ले सकती है। साझा सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित और समकालीन चुनौतियों से प्रेरित यह सहयोग आगे चलकर एक ऐसी स्थायी साझेदारी में बदल सकता है, जो तेज़ी से बदलते और उथल-पुथल भरे वैश्विक परिदृश्य में बहुलतावाद, सांस्कृतिक निरंतरता और प्राचीन परंपराओं की गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित हो।

सन्दर्भ सूची

[1] Prime Minister’s Address to the Knesset  ( February 25, 2026);  https://www.mea.gov.in/Speeches-Statements.htm?dtl/40821/Prime_Ministers_Address_to_the_Knesset_February_25_2026

[2]  Hindu and Jews: The history of the mutual interaction and relation between the two oldest civilizations;   https://organiser.org/2021/05/17/136578/bharat/hindus-and-jews-the-history-of-the-mutual-interaction-and-relation-between-the-two-oldest-civilizat/

[3] Ibid.

[4] The Blogs:India-Israel: Rediscovering Lost Civilizational Links | Gajendra Singh | The Times of Israel;  https://blogs.timesofisrael.com/india-israel-rediscovering-lost-civilizational-links/

[5] Two Ancient Civilizations, One Grievous Wound: Hindu-Jewish Solidarity in the Face of Terror – American Kahani;   https://americankahani.com/perspectives/two-ancient-civilizations-one-grievous-wound-hindu-jewish-solidarity-in-the-face-of-terror/

[6] Dr. Nathan Katz: Exploring Jewish-Hindu Connections; https://stophindudvesha.org/exploring-the-deep-roots-of-jewish-hindu-connections-with-dr-nathan-katz/

[7] Prime Minister’s Address to the Knesset ( February 25,2026); https://www.mea.gov.in/Speeches-Statements.htm?dtl/40821/Prime_Ministers_Address_to_the_Knesset_February_25_2026

[8] Ibid.

[9] Cross-examining similarity and variance between Hinduism and Judaism by Dr. D. Vallabh; https://www.pharosjot.com/uploads/7/1/6/3/7163688/pharos_article_21_vol_97_2016.pdf

[10] Ibid.

[11] Richard Benkin: Jews and Hindus Face the “Same” Islamist Adversaries – Middle East Forum; https://www.meforum.org/benkin-jews-hindus-face-same-islamist-adversaries

[12] Ibid.

[13] Antisemitic Disinformation: A Study of the Online Dissemination of Anti-Jewish Conspiracy Theories ;  https://networkcontagion.us/wp-content/uploads/NCRI–AntisemiticDisinformation-FINAL.pdf

[14] Quantitative Methods for Investigating Anti-Hindu Disinformation;  https://networkcontagion.us/wp-content/uploads/NCRI-Anti-Hindu-Disinformation-v2.pdf

[15] Combating hate: Hindu and Jewish leaders unite for seven-city US tour against rising hate | World News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/combating-hate-hindu-and-jewish-leaders-unite-for-seven-city-us-tour-against-rising-hate/articleshow/124621537.cms

[16] Ibid.

[17] Congressional Briefing: Hindu, Jewish, Multi-faith Communities Stand in Solidarity with Israel; https://www.pgurus.com/hindu-jewish-multifaith-communities-stand-in-solidarity-with-israel-at-multi-faith-congressional-briefing/

[18] Declaration of the Second Hindu-Jewish Leadership Summit; https://hindupact.org/wp-content/uploads/2021/04/Hindu-Jewish_Leadership_Summit_Declaration.pdf

[19] INSIGHT UK. “Tens of Thousands Join in Solidarity Against Terrorism.”  https://insightuk.org/tens-of-thousands-join-in-solidarity-against-terrorism/

[20] Hill, Bruce. “A Growing Bond.” The Australian Jewish News. https://www.australianjewishnews.com/a-growing-bond/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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