भारत के देश-विरोधी पत्रकारिता पर एक नजर

भारतीय पत्रकारिता के अंधेरे गर्त की एक यात्रा, जहां की अंधेरगर्दी और आवारापन भरा व्यवहार पूरे देश के न्यूज़रूम  के वातावरण को दूषित कर रहा है । 
  • भारत की अनैतिक पत्रकारिता सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय हितों को कमज़ोर करती है, विदेशी एजेंडे को आगे बढाती है।
  • मुख्यधारा का मीडिया दोहरे मापदंड अपनाता है। हिंदू प्रथाओं और रिवाजों की कड़ी आलोचना करता है, जबकि अन्य समुदायों में इसी तरह की प्रथाओं को नज़रअंदाज़ करता है।
  • कुछ पत्रकार सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए नियमित रूप से समाचारों को सनसनीखेज बनाते हैं या व्यक्तिगत और कॉर्पोरेट लाभ के लिए उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए खबर में चालाकी करते हैं।

भारत का कथित मुख्यधारा का मीडिया प्राय: भारतीय परंपराओं, प्रथाओं, रिवाजों, संस्कृति के खिलाफ खड़ा रहता है। आपने कभी विचार किया है कि वह ऐसा क्यों करता है?  आपने कभी सोचा है कि वह क्यों हमेशा भारत के हितों की अनदेखी करता है? मीडिया उद्योग में कुछ जाने-माने नाम पाकिस्तान, चीन और पश्चिम के देशों के हितों के लिए काम क्यों करते हैं? कई पत्रकार हिंदुओं को उपदेश क्यों देते हैं? उन्हें होली पर पानी, दिवाली पर आतिशबाजी और शिवरात्रि पर दूध का उपयोग न करने की सलाह देते हैं, जबकि ईद पर सड़कों पर जानवरों की हत्या पर एक शब्द तक नहीं बोलते। ऐसे दोहरे मापदंड और पाखंड क्यों?

कुछ प्रमुख संपादकों द्वारा किए जा रहे अनैतिक पत्रकारिता के कारण हमें भारतीय पत्रकारिता जगत की यह पड़ताल करनी पड़ रही है। ऐसे संपादक और पत्रकार आदतन भारत विरोधी कहानियां फैलाते हैं। यह जानना मुश्किल हो जाता है कि ऐसे पत्रकार भारत के लिए काम कर रहे हैं या शत्रु देशों के लिए। उदाहरण के लिए कश्मीर का मुद्दा ले लीजिए । इस विषय पर पाकिस्तानी मीडिया भी भारत पर उतना हमला नहीं करता जितना ये वामपंथी-उदारवादी भारतीय पत्रकार करते हैं। जैसा कि रिपब्लिक टीवी के अर्नब गोस्वामी ने कहा: “मीडिया के कुछ हिस्सों में निहित स्वार्थ खुले तौर पर और चौंकाने वाले तरीके से पाकिस्तानी लाइन को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। कश्मीरियों का समर्थन करने की आड़ में, ये वर्ग – जिसमें मीडिया के कुछ हिस्से भी शामिल हैं – भारत में बैठकर पाकिस्तान का समर्थन करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।”[1]

आइये, भारत के न्यूज़रूम के पर्दे के पीछे की कुछ झलकियां देखते हैं, ताकि आप समझ सके कि ये संदिग्ध पत्रकार कैसे काम करते हैं।

केस स्टडी 1: सांप्रदायिक आग को हवा देना

एक अनैतिक और बिके हुए पत्रकार के साथ मेरा सबसे पहले सामना 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुई थी। मैं दिल्ली के एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक में कॉपी एडिटर था। आप जो पढ़ने जा रहे हैं, वह सीधे न्यूजरूम की अंदरूनी हकीकत है।

इस दैनिक अखबार के पास एक अनुभवी और स्थानीय रिपोर्टर का जाल था। इसके पास गुजरात ब्यूरो भी था. लेकिन जाने किस वजह से, इसने नई दिल्ली से एक क्राइम रिपोर्टर को इस तरह के बड़े सांप्रदायिक संघर्ष को कवर करने के लिए भेज दिया। अदालती मामलों की रिपोर्टिंग करने वाला यह 20 वर्षीय रिपोर्टर, जिसे मैं विनोद कहूंगा, अचानक खुद को दंगों के बीच में पाता है।

विनोद ने जो कहानियां भेजी, उनमें से एक, जो अखबार के पहले पन्ने पर छपी, भड़काऊ और निराधार लेख था. यह लेख एक “मुस्लिम साइकिल चालक” के बारे में था, जो “हिंदू बहुल आवासीय क्षेत्र से गुजर रहा था” और कथित तौर पर एक “गुजराती भीड़” ने उसकी हत्या कर दी। उसने दावा किया कि भीड़ ने फुटपाथ से पत्थर उठा कर उसके सिर को फोड़ दिया। उस व्यक्ति का दिमाग बाहर निकल आया। चौंकाने वाली बात यह थी कि हम इस भड़काऊ रिपोर्ट को पहले पन्ने पर प्रकाशित करने से सिर्फ दो घंटे दूर थे। उस वक्त तक हमारे पास कोई आधिकारिक बयान नहीं था।

ऐसे संवेदनशील समय में, जब मीडिया को इस बारे में बेहद सतर्क रहने की जरूरत थी कि वह क्या प्रकाशित करे, रिपोर्टर और संपादक सांप्रदायिक आग में घी डालने का काम कर रहे थे। 2002 में इस दैनिक अखबार की 900,000 प्रतियों की छपाई हुई थी। खबर की सटीकता के बजाय समय मायने रखती थी। पत्रकारों के सामने एक प्रस्तुति के दौरान, प्रिंटिंग विभाग  के प्रमुख ने हमें बताया था कि हर आधे घंटे की देरी का मतलब है कि मशीन 25,000 कम प्रतियां छापेगा। इसलिए, छोटी-मोटी गलतियों को सुधारने के लिए वक्त नहीं था। अगर अगली सुबह 11 बजे के बाद 5 मिनट से अधिक की देरी होती, तो हमें देरी का कारण बताना पड़ता। कहने की ज़रूरत नहीं है कि दिल दहलाने वाली डेडलाइन की वजह से पत्रकारों के बीच भगदड़ मची रहती थी। ऐसे दबावों के बावजूद, मैंने रिपोर्टर को फोन करके कहानी की सच्चाई जानने का फैसला लिया। फोन पर हमारी बात कुछ इस तरह हुई:

दिल्ली ब्यूरो: क्या आपने उस आदमी को मरते हुए देखा?

विनोद: नहीं। लेकिन मेरे भरोसेमंद स्रोत ने बताया हैं, उसने यह देखा था।

दिल्ली ब्यूरो: तो, आपका स्रोत कौन है?

विनोद: इस हाउसिंग सोसाइटी के बाहर लोगों का एक समूह था, जिसने मुझे वह सटीक स्थान दिखाया जहां भीड़ ने उस आदमी को मारा था।

दिल्ली ब्यूरो: आपको कैसे पता कि वह आदमी मुसलमान था?

विनोद: लोगों के उसी समूह के अनुसार, उस आदमी की लंबी दाढ़ी थी। असल में वे लोग मुझे भी मारना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगा कि मैं भी मुसलमान हूं।

दिल्ली ब्यूरो: एक बड़े हिंदू-मुस्लिम दंगे के तीसरे दिन एक मुस्लिम आदमी हिंदू-बहुल इलाके में साइकिल से क्या करने जा रहा था?

विनोद: शायद वह रास्ता भटक गया था।

दिल्ली ब्यूरो: आपको कैसे पता कि हमले में उसका दिमाग बाहर निकल गया?

विनोद: लोगों के उसी समूह ने मुझे फुटपाथ पर खून के धब्बे दिखाए।

दिल्ली ब्यूरो: और आपको लगता है कि वे सच कह रहे हैं?

विनोद: हां।

दिल्ली ब्यूरो: तो, जिस समूह ने आपको मारने की धमकी दी थी, वह अब आपका प्रामाणिक स्रोत है?

विनोद: (हकलाते हुए) देखिए, वे सभी झूठ नहीं बोल सकते।

सर्दी का महीना था। फिर भी मैं महसूस कर सकता था कि विनोद अपनी टाई ढीली कर रहा था (वह अक्सर गर्मियों में भी टाई पहनता था)। अखबार में इतने सालों तक काम करने के बाद, उसे इस तरह से सवाल पूछे जाने की आदत नहीं थी। हालांकि, एक चालाक रिपोर्टर होने के नाते, उसने मुझे फोन करने के लिए धन्यवाद बोला और कहा कि वह मेरे सभी संदेहों को दूर करने की कोशिश करेगा।

उस समय मेरी चिंता कुछ अलग ही थी। खबर की साथ एक ग्राफिक डिटेल भी जा रही थी। इससे गुजरात और भारत के अन्य हिस्सों में लोगों की भावना भड़क सकती थी। इससे अगले दिन और अधिक हिंसा भड़कने की संभावना थी। मेरा अपने लाइन एडिटर से बात करना बेकार था। उन्हें पत्रकारीय नैतिकता, सार्वजनिक सुरक्षा या भारत की छवि की चिंता होती तो इस तरह से खबर बनती ही नहीं। विनोद प्रबंधन का ख़ास आदमी था। यह भी संभावना थी कि आगे मुझे ही समस्या आती।

ऐसे में सिर्फ एक ही रास्ता था। मैंने लाइन एडिटर से कहा कि इस तरह का खूनी लेख दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़का सकता है। अपनी सुरक्षा की चिंता सबको होती है। इसलिए उन्होंने तुरंत मुझे एक अलग कहानी खोजने के लिए कहा। कुछ कट्टर उदारवादियों ने विरोध कियाम, लेकिन उन्हें खारिज कर दिया गया।

कई साल बाद, मैंने गुजरात दंगों की वह कहानी विनोद के एक पूर्व बॉस को बताई। उन्होंने मुझसे कहा, “विनोद एक धोखेबाज आदमी है और मुझे इस बात पर संदेह नहीं कि उसने खुद ही गुजरात की कहानी गढ़ी हो। एक बार जब उस पर संडे मैगजीन के लिए एक बड़ी कहानी लिखने का दबाव था, तो वह नहीं आया। उसने बहाना बना दिया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और वह ऑफिस नहीं आ सकता।” विनोद किसी विचारधारा से बंधा हुआ नहीं था। वह बस फर्जी खबर बनाने वाला था। विनोद अब मुंबई के एक हेडहंटिंग फर्म (लोगों को नौकरी देने वाली कंपनी) में एक कॉर्पोरेट सलाहकार है। मुझे पक्का यकीन है कि विनोद वहां भी फर्जीवाड़ा करने से चूकता नहीं होगा।

केस स्टडी 2: परमाणु बम विस्फोट पर भ्रामक प्रचार

भारतीय मीडिया में एक विदेशी एजेंडाधारी पत्रकार थी एनी (बदला हुआ नाम)। एनी केरल की एक ईसाई पत्रकार थी। वह दिल्ली के एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रिका में काम करती थी। मैं इस अखबार से 1999 में जुड़ा था। इसके ठीक एक साल पहले 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था। एनी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लिखने वाली और धार्मिक रूप से काफी कट्टर पत्रकार थी। एक दिन, उसने न्यूज़रूम में कहा कि 1999 में गर्मी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है. उसने कहा,”यह सब पिछले साल किए गए परमाणु परीक्षणों के कारण हो रहा है।“ जब भी वह वरिष्ठ पत्रकारों के संपर्क में आती, तो उन्हें यह ‘सूचना’ दे देती। शुक्र है कि उस समय मीडिया में प्रेस्टीट्यूट इतनी बड़ी संख्या में मौजूद नहीं थे। वरना उसका झूठ और ज़्यादा लोकप्रिय हो सकता था। उस वक्त लोग उसे बहुत गंभीरता से नहीं लेते थे।

एनी ने बाद में मुझे बताया कि यह जानकारी उसे नई दिल्ली चर्च के पादरी ने दी थी। उसने कहा कि पादरी को अमेरिकी स्रोतों से भारतीय मौसम (बढ़ती गर्मी) के बारे में जानकारी मिली थी। केरल में चर्चों में सामूहिक प्रार्थना होती रहती है। एनी उसमें भी हिस्सा लेती रही थी। चर्च की बात का बाहर की दुनिया और लोगों पर बड़ा प्रभाव होता है। रविवार की प्रार्थना में भाग लेने वाले कई लोग पादरी के कहे भारत विरोधी और हिंदू विरोधी बकवास को सच मान लेते है और उसे फैलाते रहते हैं।

एनी अभी भी अपने हिंदू विरोधी लेखों के माध्यम से चर्च के भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। ये ईसाई पत्रकार खुलेआम भारत, सुरक्षा बलों, हिंदू धर्म, हिंदू भिक्षुओं और हिंदू राजाओं और रानियों की निंदा करते हैं। विडंबना यह है कि उन्हें ऐसे अखबार मालिकों द्वारा शानदार नौकरी, शानदार वेतन, शानदार सुविधाएं दी जाती हैम जो भारतीय धर्म के संरक्षक माने जाते रहे हैं। जैसे, बिरला, गोयनका और जैन घराना।

केस स्टडी 3: खबर के बहाने ईमान बेचने वाले

यह कहानी दिल्ली की एक पत्रिका में काम करने के दौरान घटी थी। हर साल दिवाली विशेषांक निकलता था। इसमें मध्यम वर्ग के लोगों लिए उपलब्ध मेगा डील्स पर अच्छी जानकारियां होती थी।

इस विषय पर लगभग तीन हजार शब्दों का एक आलेख मेरे पास संपादित होने के लिए आया। मुझे इसे संपादित करने में ज़्यादा समय नहीं लगा, क्योंकि यह एक वरिष्ठ लेखक ने लिखी थी। हालांकि, इसमें एक पैरा मुझे थोड़ा अजीब लगा। इस पैरा में देश की एक बड़ी कंपनी की ओर से पेश किए जा रहे दो फ्लैट-स्क्रीन टेलीविज़न की कीमतों का उल्लेख था। जाहिर है, इसका आलेख से कोई संबंध नहीं था। ऐसा लग रहा था कि इसे टीवी कंपनी के शेयर मूल्य को प्रभावित करने के लिए डाला गया था। इसने पूरे आलेख को एक पेड एडवरटोरियल (पैसा ले कर खबर के रूप में विज्ञापन) जैसा बना दिया गया था। मैंने उन वाक्यों को हटा दिया और लेखक के पास वापस भेज दिया। उन्होंने फिर से वहीं पैरा डाल कर आलेख वापस भेज दिया।

मैंने भी फिर से वह पैरा हटा दिया और इसे प्रोडक्शन के लिए भेज दिया। जब लेआउट प्रूफ फिर से लेखक को भेजा गया तो उन्होंने मुझे फोन किया। उन्होंने मुझसे उस पैरा को फिर से जोड़ने के लिए कहा। मैंने कहा कि शायद इससे पाठकों को कुछ मदद मिल जाए, लेकिन कुछ पाठक इसे नैतिक रूप से सही नहीं समझेंगे। उन्होंने फोन काट दिया और कॉपी एडिटर यानी मेरे बॉस को फोन करके वह पैरा डालने को कहा। अंत में, समझौता हो गया। पैरा को आलेख में रखा गया और कुछ सूचनाओं को हटा दिया गया। मुझे एक वरिष्ठ सहकर्मी की टिप्पणी याद है, “या तो एक नया टीवी या फिर बड़ी मात्रा में नकदी मुंबई में एक ख़ास जगह तक पहुंचा दी गयी है।”
कहने को ये पत्रकार हैं

अधिकतर पत्रकार नैतिक होते हैं। वे अच्छा काम करना चाहते हैं। वे अपने काम के लिए पहचाने जाना चाहते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनके काम से समाज पर कुछ अच्छा असर होगा। कई लोग कभी रिश्वत नहीं लेते हैं और खाने-पीने की चीज़ें या उपहार भी स्वीकार नहीं करते। मैं एक वरिष्ठ संपादक को जानता था, जिन्होंने मुलायम सिंह यादव (तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री) को मेरी मौजूदगी में फोन पर जोर से डांटा था। कारण, मुख्यमंत्री ने उन्हें “एक कप चाय” के लिए आमंत्रित करने की हिम्मत की थी। रेडिफ का एक लेखक मुंबई में एक कमरे वाले अपार्टमेंट में रहता था क्योंकि राजनीतिक दलों से रिश्वत लेने के बजाय वह ऐसे ही रहना पसंद करता था। उन्होंने मुझसे कहा था,”क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मैं कितनी गहरी नींद सोता हूं।“

मेरा एक करीबी दोस्त है। उसे इस बात का कोई मलाल नहीं कि 30 साल की पत्रकारिता के बाद उसके पास दिखाने के लिए दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय इलाके में दो बेडरूम का फ्लैट है। उसने अपने संपादक की उस योजना का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया, जिसमें संपादक उसकी खोजी पत्रकारिता कौशल का इस्तेमाल करके राजनीतिक नेताओं को ब्लैकमेल करना चाहता था।

हालांकि, पत्रकारों का एक ऐसा छोटा वर्ग भी है, जो राजनेताओं, विदेशी एजेंटों और बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ गलबहियां करता नजर आता हैं। यह एक बहुत बड़ी समस्या है। मीडिया को आज संदेह की नजर से देखा जा रहा है।  ऐसे पत्रकार शूट-एंड-स्कूट (मारो और भागो) नीति का इस्तेमाल करते हैं। अजीबोगरीब आरोप लगाते हैं, सनसनी फैलाते हैं और फिर छिप जाते हैं। जब तक वे सामने आते हैं, तब तक कुछ हफ्ते बीत चुके होते हैं और देश अगली बड़ी कहानी पर चर्चा कर रहा होता है।
ऐसे अनैतिक गतिविधियों में शामिल पत्रकार उदार और निष्पक्ष होने का दिखावा करेंगे। खुद को बाख (पश्चिमी संगीतकार) के मुरीद बताएंगे। खान मार्केट के किसी रेस्तरां में सिंगल माल्ट (शराब) ऑर्डर करेंगे। लेकिन अगर सही तरीके से उन्हें देखेंगे तो पाएंगे कि ये लोग अपने वेतनदाताओं-नेताओं, व्यापारिक घरानों और विदेशी खुफिया एजेंसियों के मोहरे बन चुके हैं।[2]
ये तथाकथित उदारवादी पत्रकार शायद ही कभी उदार मुद्दों के लिए अभियान चलाते हैं। मसलन, तीन तलाक पर प्रतिबंध, समान नागरिक संहिता, वेश्यावृत्ति को वैध बनाना, समलैंगिक और उनके अधिकार, इत्यादि। इसके ठीक उलट, उनका एजेंडा पुरानी व्यवस्था को फिर से स्थापित करना है, ताकि इनके पास पैसा आता रहे। कई धूर्त नेताओं के प्रकाशन समूह इन चुनिंदा पत्रकारों का ख्याल रखते हैं। उन्हें अच्छा वेतन देते हैं। इनको मिलने वाली सुविधाओं में विदेश यात्रा, मुफ्त आवास और घटिया काम शामिल है, जो वे करने में सक्षम हैं।
इसलिए, जब पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने प्रेस के लोगों के लिए प्रेस्टीट्यूट शब्द का इस्तेमाल किया था, तब वे बिलकुल सही थे।[3]

 

[1] Why I can no longer laugh at Arnab Goswami (newslaundry.com); https://www.newslaundry.com/2016/07/29/why-i-can-no-longer-laugh-at-arnab-goswami

[2] Rajeev Sharma, journalist arrested for spying for China, gets bail (opindia.com); https://www.opindia.com/2020/12/delhi-hc-bail-journalist-rajeev-sharma-spying-china/

[3] VK Singh calls social media ‘presstitutes’ for linking him to video | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india/vk-singh-calls-social-media-presstitutes-for-linking-him-to-video/story-vr10EMShwuCxZUb73i7nEI.html

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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