कैसे वैश्विक ‘जाति नैरेटिव’ भारत और हिंदू समाज पर AI विमर्श को नया आकार दे रहे हैं

यह लेख भारत में एआई पर चल रही बहस का आलोचनात्मक परीक्षण करता है। इसमें तर्क है कि बाहरी, जाति-केंद्रित सिद्धांत विमर्श को दिशा दे रहे हैं, जिससे तकनीकी गहराई और संदर्भ की समझ कमजोर पड़ती है, तथा संस्थागत भारत-विरोधी प्रवृत्तियों से ध्यान भटकता है।
सार

यह लेख इस बात का विश्लेषण करता है कि किस प्रकार से वैश्विक अकादमिक जगत, मीडिया और एक्टिविस्ट नेटवर्क्स भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संबंधी विमर्श को जाति की लेंस से एक नये सिरे से फ़्रेम कर रहे हैं, और कैसे यह फ्रेमिंग अक्सर तकनीकी तथ्यों और स्थानीय संदर्भों को पूरी तरह से अनदेखा कर देती है। लेख का तर्क है कि “AI बायसयानी AI-पूर्वाग्रह पश्चिमी अकादमिक हलकों में शोध का एक बेहद फैशनेबल विषय बन चुका है। यह एक विशिष्ट वैचारिक ढांचे में ढला हुआ विमर्श है, जिसे भारतीय संदर्भ में जबरन लगभग जस का तस आयात कर लिया जाता है, यानी बिना यह सोचे-समझे कि भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी जटिलताएँ बिलकुल अलग हैं। ChatGPT से जुड़े उदाहरणों, अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज और एक्टिविस्ट अभियानों के उदाहरणों के जरिए यह लेख दिखाता है कि कैसे तकनीकी त्रुटियों के इक्का-दुक्का केसेज़ को बढ़ा-चढ़ाकर व्यवस्थित जातिगत भेदभावके व्यापक दावों में बदल दिया जाता है। इन दावों को भारतीय मीडिया के कुछ हिस्सों और वैश्विक संस्थानों का समर्थन भी मिलता है, जिससे एक ऐसा तंत्र तैयार होता है जहाँ विचारधारा को प्रमाण और तथ्यों से ऊपर रखा जाता है। लेख आगे यह भी रेखांकित करता है कि अमेरिका में निवास कर रहे भारतीय-अमेरिकी पेशेवरों, विशेषकर टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़े लोगों को निशाना बनाने वाली जाति-आधारित एक्टिविज़्म की प्रवृत्ति अब भारतीय विमर्श को भी प्रभावित कर रही है। इस पूरे तर्क का केंद्रीय बिंदु यह है कि जातिकी यह आक्रामक बयानबाज़ी अक्सर एक रणनीतिक भटकाव के रूप में काम करती है। हिंदू समाज और भारतीय संस्थानों को जन्मजात उत्पीड़क के रूप में प्रस्तुत करके, यह विमर्श वैश्विक तकनीकी और अकादमिक तंत्र में गहराई से जड़ें जमा चुके हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी पूर्वाग्रहों से ध्यान भटका देता है।

पश्चिमी अकादमिक तंत्र में “वोक” एक्टिविज़्म अब गहराई से जड़ें जमा चुका है, और उस का प्रभाव अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर हो रहे शोध पर भी स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगा है। आज के समय में एक बड़ा अकादमिक वर्ग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को तकनीकी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि मानविकी और सामाजिक विज्ञानों के वैचारिक ढांचों के लेंस से देख-समझ रहा है। क्रिटिकल रेस थ्योरी, नारीवाद और इंटरसेक्शनैलिटी सरीखे ग़ैर-तकनीकी वैचारिक ढाँचों के माध्यम से AI जैसे तकनीकी विषय पर एक नये सिरे से शोध किया जा रहा है। इन अकादमिक प्रवृत्तियों के अन्तर्गत “AI bias” (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का पूर्वाग्रह) एक चर्चित और फैशनेबल विषय बन चुका है।

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह एक ऐसा संवेदनशील विषय है जिस पर गंभीर और प्रमाण-आधारित शोध बेहद आवश्यक है। लेकिन ऐसा शोध तभी गंभीरता से लिया जा सकता है, जब वह ठोस डेटा, स्पष्ट मानको, परिपक्व मेथोडोलॉजी, और वास्तविक सामाजिक सरोकारों पर आधारित हो। लेकिन जब तकनीकी रिसर्च में वैचारिक एक्टिविज्म की घुसपैठ बढ़ने लगती है, तो यह एक चिंता का विषय बन जाता है। इस प्रकार के शोध में AI को प्रायः उसकी तकनीकी पृष्ठभूमि से अलग-थलग कर बेहद सनसनीख़ेज़ दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है। AI को लेकर एक ऐसा नैरेटिव खड़ा कर दिया जाता है, जो शोध कम और वोक एक्टिविज्म व राजनीतिक जुमलेबाज़ी ज़्यादा प्रतीत होता है। अगर सीधे तौर पर कहें तो आज के समय में अकादमिक “शोध” का इस्तेमाल टेक कंपनियों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, ताकि वे एक विशेष नैरेटिवस और नीतिगत रुख अपनाने को बाध्य हो जायें।

यह AI एक्टिविस्ट समूह अब भारत सहित पूरे ग्लोबल साउथ के उभरते हुए AI तंत्र को निशाना बना रहे हैं। उनके दावे अक्सर कल्पना की धरातल पर विचरते प्रतीत होते हैं, जिनका तथ्यों, तर्क, या वास्तविकता से ज़रा भी लेना देना नहीं होता। इन दावों का आधार अक्सर कमज़ोर और भ्रामक होता है। AI के विकास को निशाना बनाने वाले ये अभियान एक बेहद ख़तरनाक एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं।  ऐसे अभियानों का जोखिम यह है कि वे नवाचार को हतोत्साहित कर सकते हैं, और अंततः स्वदेशी तकनीकी क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

तकनीकी क्षेत्र में “जाति” आधारित विमर्श का विस्तार इस प्रकार के वोक रिसर्च का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं। पश्चिमी सामाजिक विज्ञान में लंबे समय से प्रभावी रही अवधारणाएँ अब AI सिस्टम्स पर भी जबरन थोपी जा रही हैं, वह भी कई बार बिना पर्याप्त तकनीकी समझ के। AI संबंधी सार्वजनिक विमर्श अब डिजाइन, सुरक्षा मानकों और परफॉरमेंस जैसे ठोस मुद्दों से हटकर “जातिगत पूर्वाग्रह” के आरोपों की ओर रुख़ कर रहा है।

हालाँकि AI रिसर्च के क्षेत्र में वोकिज़्म की घुसपैठ के संभावित ख़तरों का यह ब्यौरा पाठकों को कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण अवश्य लग सकता है, लेकिन गहराई से पड़ताल करने पर पता चलता है कि यह पूरा विमर्श एक बार-बार दोहराए जाने वाले पैटर्न का हिस्सा है। ग्लोबल साउथ के संदर्भ में सांस्कृतिक और सभ्यतागत विमर्श को अक्सर “संरचनात्मक पूर्वाग्रह” के फ्रेम से प्रस्तुत किया जाता है। आगे के खंडों में हम देखेंगे कि जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म्स किस तरह से इन बहसों में घसीटे जा रहे हैं, और कैसे पश्चिमी अकादमिक जगत की प्रचलित वैचारिक धाराएँ इस विमर्श को आकार दे रही हैं।

भारत में ChatGPT पर जातिगत पक्षपातका आरोप

जनवरी 2026 में एक विवादित वीडियो वायरल हुआ, जिसमें UPSC शिक्षक विजेंदर सिंह चौहान ने दावा किया कि यदि लोग ChatGPT को कोई छोटा-सा प्रॉम्प्ट दें और उसके द्वारा उत्पन्न जानकारी का विश्लेषण करें, तो उसमें उच्च-जाति के प्रति पक्षपात या पूर्वाग्रह  दिखाई देने की अधिक संभावना है। उनका तर्क था कि जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म्स को प्रशिक्षित करने वाले लोगों के पहले से मौजूद पूर्वाग्रह ही इन प्लेटफॉर्म्स की आउटपुट में झलकते हैं। चौहान ने कहा कि ChatGPT “मौजूदा कंटेंट पर प्रशिक्षित है, जो ऊँची जातियों और सत्ता में बैठे लोगों के पक्ष में झुका हुआ है। इसे उन्हीं समूहों के अत्यधिक प्रतिनिधित्व वाले लोगों ने ट्रेन किया है।[1]

चौहान के मुताबिक ChatGPT पहले से प्रशिक्षित एक मॉडल है, लेकिन अपने चर्चित भाषण में उन्होंने दावा किया कि “उच्च जाति” के लोग इसकी सोच और जवाबों को प्रभावित करते हैं। उन्होंने दावा किया कि ChatGPT की ट्रेनिंग में प्रयुक्त कंटेंट पहले ही उच्च-जाति के झुकाव को मजबूत करने वाला है। “यदि किसी मशीन की बुनियादी संरचना ही समस्याग्रस्त है, तो उससे सामाजिक न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?” चौहान ने सवाल उठाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह लड़ाई केवल नौकरशाहों, सत्ताधारियों, अधिकारियों और पदाधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि एआई एल्गोरिद्म के विरुद्ध भी है [2]

सतही तौर पर उनके बयान अव्यवहारिक या मजाकिया लग सकते हैं, पर गहराई से विश्लेषण करने पर वे गंभीर रूप से विभाजनकारी दिखते हैं। भारत में एक ओर जाति-आधारित राजनीति लगातार प्रभावी है, तो दूसरी तरफ़ अमेरिकी शैली का “वोक” विमर्श देश के प्रतिष्ठित STEM संस्थानों की योग्यता तंत्र प्रणाली यानी meritocracy को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर रहा है। वहीं आरक्षण की राजनीति चिकित्सा शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों तक में गहराई से प्रवेश कर चुकी है।[3] अगर इसे बड़े संदर्भ में देखा जाये तो इस प्रकार के दावे एक बेहद चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करते हैं। बल्कि ये जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म्स पर लगातार निशाना साधने वाले उस वृहत विमर्श के ढाँचे में एकदम फिट बैठते हैं, जो इन टेक प्लेटफॉर्म्स पर जातिगत पूर्वाग्रह को बढ़ावा देने का आरोप लगाता है। जिस प्रकार से पश्चिम में आर्ट्फिशियल इंटेलिजेंस को “रेस” के दृष्टिकोण से जाँचा-परखा जा रहा है, ठीक उसी तरह भारत के संदर्भ में यही विमर्श आयातित हो “रेस” के स्थान पर “कास्ट” के दृष्टिकोण के माध्यम से AI को परिभाषित कर रहा है।

वोकनैरेटिव के निशाने पर भारत

बीते कुछ समय से टेक जर्नल्स, पश्चिमी मीडिया और कई नीति शोध संस्थान ऐसे विमर्श को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें एआई प्लेटफॉर्म्स को “जातिगत पक्षपात” के दायरे में लाया जाता है। समग्र दृष्टि से इन प्रकाशनों का विश्लेषण करें, तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है। इसमें निष्पक्षता कम दिखती है और पूर्वनिर्धारित उद्देश्य अधिक।

MIT Technology Review में अक्टूबर 2025 को प्रकाशित एक लेख “OpenAI Is Huge in India. Its Models Are Steeped in Caste Bias.” के अनुसार, “ChatGPT और Sora उन जातिगत धारणाओं को दोहराते हैं, जो लाखों लोगों के लिए हानिकारक हैं।”

यह लेख भी उसी परिचित प्रवृत्ति का अनुसरण करता दिखता है, जिसमें जाति को आधार बनाकर एक तरह का “अत्याचार साहित्य” तैयार किया जाता है। अंतर बस इतना है कि इस बार उसमें तकनीक का नया आयाम जोड़ दिया गया है। लेख में ChatGPT के कथित जातिगत पक्षपात के समर्थन में कुछ अधूरे और सीमित उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं। इन उदाहरणों से जो तस्वीर पेश की गई है, वह उतनी ही सहजता से सामान्य तकनीकी त्रुटि का परिणाम भी हो सकती है, न कि किसी विशेष जाति के विरुद्ध सुनियोजित पूर्वाग्रह का। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु में पोस्टडॉक्टरल फेलोशिप के लिए आवेदन करने वाले एक दलित शोधार्थी का मामला सामने रखा गया है। लेख के अनुसार, आवेदन संपादित करते समय ChatGPT ने उसका उपनाम “शर्मा” कर दिया। लेकिन उसी लेख में यह भी स्वीकार किया गया है कि आवेदन में उसका उपनाम था ही नहीं। ChatGPT ने उसके ईमेल आईडी में मौजूद “s” अक्षर को “Sharma” के रूप में पढ़ लिया। ऐसे में, एक संभावित तकनीकी गलती को जातिगत साज़िश के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया। साथ ही यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि उपनाम “Singha” की जगह “Sharma” समझा गया, जबकि लेख के अनुसार “Singha” दलित पहचान से जुड़ा माना जाता है।[4]

लेखक आगे यह तर्क देता है कि पश्चिमी AI सिस्टम्स में मौजूद नस्ल और जेंडर संबंधी पूर्वाग्रह, भारतीय संदर्भ में जातिगत पूर्वाग्रह में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया में वह भारतीय समाज को लेकर प्रचलित जाति-आधारित रूढ़िगत धारणाओं को दोहराता है, और “जाति” को एक स्वाभाविक व शाश्वत भारतीय संरचना के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि प्राचीन भारत की वर्ण-जाति व्यवस्था को, जो कई विद्वानों के अनुसार अधिक लचीली, गतिशील और योग्यता-आधारित थी, लगभग अनदेखा कर दिया जाता है। लेख में कहा गया है, “जहाँ AI कंपनियाँ नस्ल और जेंडर संबंधी पूर्वाग्रह को कम करने पर कुछ हद तक काम कर रही हैं, वहीं वे जाति सरीखी गैर-पश्चिमी अवधारणाओं पर कुछ कम ध्यान देती हैं। जाति एक सदियों पुरानी भारतीय व्यवस्था है, जो लोगों को चार श्रेणियों में बाँटती है: ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (योद्धा), वैश्य (व्यापारी) और शूद्र (श्रमिक)। इस पदानुक्रम से बाहर दलित हैं, जिन्हें ‘अछूत’ माना गया और अपवित्र समझा गया।[5]

नवंबर 2021 में AI Now Institute द्वारा प्रकाशित एक लेख का शीर्षक था— “AI-Based Policing: A Veneer of Neutrality to India’s Casteist Criminal Justice System.” (AI-आधारित पुलिसिंग: भारत के कास्टेस्ट क्रिमिनल जस्टिस तंत्र का तटस्थता का दिखावा)। लेखकों का दावा था कि भारतीय सरकार द्वारा पुलिस रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, इस जोखिम को जन्म देता है कि AI के माध्यम से जातिगत पूर्वाग्रह और मज़बूत हो सकते हैं, क्योंकि AI-पूर्वाग्रह कुछ जाति समूहों को अपराध की अधिक संभावना से जोड़ सकता है।[6]

प्रमाण-आधारित विमर्श होना चाहिए। किंतु संबंधित लेख जिस प्रकार निष्कर्ष तक पहुँचता है, वह कुछ हद तक जल्दबाज़ी भरा प्रतीत होता है। भारत में पुलिसिंग तंत्र में एआई का उपयोग अभी प्रारंभिक अवस्था में है, विशेषकर अमेरिका जैसे देशों की तुलना में। ऐसे में व्यापक संरचनात्मक निष्कर्ष निकालना सावधानी की अपेक्षा करता है। इस संदर्भ में लेख स्वयं एक पूर्वनिर्धारित दृष्टिकोण से प्रभावित दिखाई देता है, जहाँ पश्चिमी समाजों में उठी एआई-पूर्वाग्रह संबंधी बहसों को भारतीय परिप्रेक्ष्य पर सीधे आरोपित कर दिया गया है। यह एक परिचित अकादमिक प्रवृत्ति का पुनरावृत्ति करता है, जिसमें “क्रिटिकल रेस थ्योरी” की रूपरेखा के भीतर विकसित “रेस” की अवधारणा को भारतीय समाज की “जाति” संरचना पर यांत्रिक ढंग से लागू किया जाता है। परिणामस्वरूप, जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को सरलीकृत ढाँचों में समेटते हुए भारत के बारे में सामान्यीकृत और अक्सर पूर्वाग्रह-प्रेरित टिप्पणियाँ सामने आती हैं।

विडंबना यह है कि “जातिगत पूर्वाग्रह” की ओर इशारा करने के नाम पर ऐसे शोध और लेख स्वयं उसी पूर्वाग्रह को हवा देते प्रतीत होते हैं। यह ट्रेंड एक “अत्याचार साहित्य चक्र” का आभास दिलाता है, जहाँ पहले ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों और यूरोपीय इंडोलॉजिस्टों ने भारतीय “जाति-व्यवस्था” की एक छवि-विशेष गढ़ी, और फिर अकादमिक, मीडिया और थिंक टैंक जगत के कुछ हिस्सों ने उसे लगातार बढ़ावा देने का काम किया। जबकि भारत ने संवैधानिक प्रावधानों के ज़रिये जातिगत असमानताओं को कम करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, और समाज एक अलग दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब भी ऐसे पक्षपाती विमर्श जाति की सामुदायिक आँच को सुलगाए रखते हैं।

भारतीय मीडिया का एक वर्ग भी “AI में जातिगत पक्षपात” के नैरेटिव को बढ़ावा देता दिखता है, जो पश्चिमी अकादमिक विमर्श की शोध-पद्धति का ही प्रतिबिंब है। कुछ शीर्षक देखें:

“AI knows how caste works in India. Here’s why that’s a worry” – The Times of India, 17 फरवरी 2026 (AI जानता है कि भारत में जाति-व्यवस्था कैसे काम करती है। यह इसलिए चिंता का विषय है कि)[7]

“Racist, sexist, casteist: Is AI Bad News for India?” – The Hindu, 11 सितंबर 2023 ( रेसिस्ट, सेक्सिस्ट, कास्टेस्ट: क्या AI भारत के लिए एक बुरा समाचार है?)[8]

“Beware: AI is learning caste-based, communally-sensitive human biases in India, how can it be prevented?” – DNA, 16 सितंबर 2025 ( सावधान: AI भारत में, जाति-आधारित और सामुदायिक रूप से संवेदनशील मानव-जनित पूर्वाग्रह सीख रहा है)[9]

“How AI risks reinforcing caste and inequality” – Governance Now, 4 सितंबर 2025 ( कैसे AI कास्ट और असमानता को बढ़ावा देने का ख़तरा उत्पन्न करता है)[10]

“Dalit folklore to AI bias, Offstream Futures Bengaluru spotlights resistance through art” – The News Minute, 3 मार्च 2025 (दलित लोक-साहित्य से लेकर AI पूर्वाग्रह तक, ऑफ़स्ट्रीम फ्यूचर्स बेगलुरु कला के माध्यम से प्रतिरोध को स्पॉटलाइट में लाता है)[11]

“The Digital Caste System: How LLMSs Perpetuate Ancient Hierarchies In Modern India” – Feminism in India, 27 अगस्त 2025 (डिजिटल कास्ट सिस्टम: कैसे LLMSs आधुनिक भारत में प्राचीन सामाजिक पदानुक्रमों को क़ायम रखते हैं) [12]

भारतीय-अमेरिकी जाति नैरेटिवके निशानी पर

एआई में कथित “जातिगत पक्षपात” पर केंद्रित मीडिया लेखों और शोध में हाल की तेज़ बढ़ोतरी स्वयं में ध्यान देने योग्य है। यह उछाल अचानक और कुछ हद तक योजनाबद्ध प्रतीत होता है। गहराई से देखने पर यह रुझान अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी टेक पेशेवरों को जाति-भेदभाव के प्रश्न पर लगातार सार्वजनिक बहस के केंद्र में लाए जाने की प्रवृत्ति से जुड़ा दिखाई देता है। जाति-भेदभाव से निपटने के नाम पर विशेष रूप से भारतीय मूल के, खासकर टेक क्षेत्र में कार्यरत पेशेवरों को बार-बार लक्षित किया जा रहा है। ऐसे में एआई प्लेटफॉर्म्स पर “जातिगत पक्षपात” के आरोपों की बढ़ती संख्या को व्यापक सामाजिक और नीतिगत संदर्भों से अलग करके देखना कठिन है। प्रश्न यह है कि क्या तकनीकी विमर्श पहचान-आधारित राजनीति से प्रभावित हो रहा है।

फरवरी 2023 में Seattle अमेरिका का पहला शहर बना, जिसने जाति-आधारित भेदभाव पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाने वाला कानून पारित किया। इसी तरह का एक विधेयक 2023 में California की स्टेट असेंबली में भी पारित हुआ। हालांकि, गवर्नर Gavin Newsom ने उसे वीटो कर दिया। उनका कहना था कि यह अनावश्यक है, क्योंकि कैलिफ़ोर्निया में पहले से ही नस्ल, रंग, धर्म, वंश, राष्ट्रीय मूल, विकलांगता, लैंगिक पहचान, यौन अभिविन्यास, आदि के आधार पर भेदभाव निषिद्ध है, और राज्य का क़ानून यह स्पष्ट तौर पर रेखांकित करता है कि नागरिक अधिकार कानूनों की व्याख्या व्यापक रूप से की जानी चाहिए।[13]

पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका में जाति-आधारित एक्टिविज़्म की एक तीखी और आक्रामक लहर उभरी है। इसकी अगुआई Equality Labs जैसे संगठनों ने की है, जिन्हें अनेक हिंदू समूह पक्षपाती और हिंदू-विरोधी मानते हैं।

चरम-वामपंथी नेटवर्क, कुछ इस्लामिस्ट समूहों और पहचान-आधारित “वोक” सक्रियता का एक साझा गठजोड़ अमेरिकी हिंदुओं, विशेषकर टेक क्षेत्र में कार्यरत भारतीय-अमेरिकियों, को लगातार निशाना बना रहा है। उन पर व्यवस्थित रूप से जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि इन दावों के समर्थन में व्यापक और निर्णायक प्रमाण सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हुए हैं। आलोचकों के अनुसार, एक सुनियोजित विमर्श के माध्यम से ऐसा वातावरण निर्मित किया जा रहा है, जिसमें भारतीय-अमेरिकी पेशेवरों को सामूहिक संदेह की दृष्टि से देखा जाए। परिणामस्वरूप, उन्हें असामान्य स्तर की निगरानी, संस्थागत जाँच और पहचान-आधारित प्रोफ़ाइलिंग का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति तकनीकी क्षेत्र में कार्यरत एक संपूर्ण समुदाय को रक्षात्मक मुद्रा में धकेलने का जोखिम पैदा करती है। शैक्षणिक संस्थानों में “कास्ट सेंसिटाइजेशन” कार्यशालाओं के आयोजन से लेकर अकादमिक और मीडिया जगत में हिंदू-विरोधी भावना के सामान्यीकरण तक, अमेरिका एक सुनियोजित एजेंडे के तहत फैलाये जाने वाले जातिगत विमर्श का गढ़ बन चुका है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय, जो अमेरिकी टेक कार्यबल का बड़ा हिस्सा है, इस मुहिम का प्रमुख टारगेट रहा है।

भारत में “टेक में जातिगत पक्षपात” का नैरेटिव भी कुछ हद तक इसी पैटर्न को दोहराता दिखता है। यहाँ “जनरल कैटेगरी” या तथाकथित “उच्च जातियों” को निशाना बनाकर, सामाजिक न्याय के नाम पर मेरिटोक्रेसी को तोड़ने का वही विमर्श आयात किया जा रहा है, जो आज पश्चिमी समाजों में वोक राजनीति का प्रमुख आधार है। उदाहरण के लिए, Governance Now में प्रकाशित एक लेख की ये पंक्तियाँ [14] इस विभाजनकारी प्रवृत्ति को स्पष्ट करती हैं:
“यह पक्षपात आकस्मिक नहीं है। LLMs ऑनलाइन टेक्स्ट से सीखते हैं, जिसका अधिकांश हिस्सा डिजिटल रूप से सशक्त समूहों, मुख्यतः शहरी, पुरुष और उच्च जाति के लोगों, से आता है।”

टेक में जातिगत पक्षपात के नाम पर भारत की “उच्च जातियों” का यह दानवीकरण, अमेरिकी समाज में भारतीय-अमेरिकियों के ख़िलाफ़ चल रहे नस्लवादी अभियानों से अजीब समानता रखता है, जहाँ उन्हें “हिंदुत्व विचारधारा” का एजेंट बताकर उनपर अमेरिकी टेक नौकरियों पर एकाधिकार स्थापित करने का आरोप लगाया जाता है।

अमेरिका में जातिगत भेदभाव के व्यापक होने का एक तयशुदा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, जहाँ हिंदू-विरोधी एक्टिविस्ट समूह लोगों को उनके उपनाम के आधार पर प्रोफाइल करते हैं और “अमेरिका में दलित उत्पीड़न” जैसी साजिश कथाएँ फैलाते हैं। भारतीय संदर्भ में AI पर लगाए जा रहे “जातिगत पक्षपात” के विचित्र आरोपों से इसकी समानता चौंकाने वाली है।

हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह का आवरण बनता जाति विमर्श

2023 और 2024 में Google Gemini और ChatGPT जैसे AI चैटबॉट्स में निहित संभावित “एंटी-इंडिक” पूर्वाग्रह का मुद्दा प्रमुखता से उठा। कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़े सवाल पूछे, और चैटबॉट्स के जवाबों को “पक्षपाती” बताते हुए साझा किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी 2023 में ChatGPT ने भगवान राम और श्रीकृष्ण जैसे हिंदू भगवानों पर चुटकुले बनाए, लेकिन जब पैगंबर मोहम्मद या यीशु मसीह पर वैसा ही करने को कहा गया, तो उसने साफ़ इनकार कर दिया। इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण व्यवहार, जिसमे हिंदूफोबिया की झलक साफ़ देखने को मिली, ने AI एल्गोरिद्म के संभावित “अब्राहमिक झुकाव” और अंतर्निहित हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह पर व्यापक बहस छेड़ दी।[15]

विवाद तब और भी ज़्यादा गहरा गया जब Gemini AI ने प्रधानमंत्री मोदी से जुड़े एक प्रश्न पर पक्षपाती जवाब दिया। एक यूजर ने पूछा, “क्या मोदी फासीवादी हैं?” चैटबॉट ने उत्तर हाँ में दिया, जबकि अन्य वैश्विक नेताओं के बारे में इसी तरह के सवालों पर वह सीधा उत्तर देने से बचता दिखा।[16]

संभव है कि इस तरह का पूर्वाग्रह अब भी जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म्स में किसी न किसी रूप में मौजूद हो। उदाहरण के लिए, “क्या हिंदू धर्म और हिंदुत्व में अंतर है?” जैसे प्रश्न पर Gemini और ChatGPT प्रायः वही रटा-रटाया उत्तर देते हैं, जहाँ हिंदू धर्म को एक आध्यात्मिक/धार्मिक परंपरा और हिंदुत्व को एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह व्याख्या सूक्ष्म रूप से वाम-उदारवादी विमर्श से मेल खाती दिखाई देती है। AI एल्गोरिथम्स में निहित संभावित हिंदू या इंडिक-विरोधी पूर्वाग्रह की व्यापकता का विस्तृत विश्लेषण इस लेख की परिधि से बाहर है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह एक गंभीर विषय है, जिस पर और अधिक गहराई से अध्ययन और संतुलित विमर्श की आवश्यकता है।

इसी संदर्भ में, AI प्लेटफॉर्म्स पर “जातिगत पक्षपात” के आरोपों की अचानक आई बाढ़ एक सुनियोजित रणनीति जैसी प्रतीत होती है, मानो इस पूरी मुहिम का उद्देश्य किसी और संवेदनशील मुद्दे से ध्यान भटकाना हो। यदि जातिगत विमर्श पर केंद्रित जुमलेबाज़ी का इस्तेमाल हिंदू धर्म को दोषी ठहराने और हिंदुओं को उत्पीड़क के रूप में पेश करने के लिए किया जा सके, तो AI प्लेटफॉर्म्स में निहित संभावित हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह पर होने वाली कोई भी बहस स्वतः ही संदिग्ध ठहराई जा सकती है।

यह भी विचारणीय है कि सामाजिक विज्ञान और मानविकी के दृष्टिकोण से AI पर होने वाला अकादमिक शोध पश्चिमी समाजों में मौजूद नस्लीय या जेंडर पूर्वाग्रहों पर खुलकर चर्चा करता है, लेकिन “हिंदू-विरोधी बायस” के मुद्दे पर लगभग मौन रहता है। ऐसा क्यों?

जब बात भारत की आती है, तो अचानक ही सारे समीकरण बदल जाते हैं। भारतीय संदर्भ में हिंदुओं की पहचान “जाति” की श्रेणी में समेट दी जाती है,  और जो लोग पश्चिमी अकादमिक विमर्श के ख़ुद के मानदंडों के अनुसार “उत्पीड़ित” तथा “सबऑल्टर्न” की श्रेणियों में आने चाहिए थे, वे अचानक ही “उत्पीड़क” में परिवर्तित हो जाते हैं।

भारत वैश्विक दक्षिण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में, मुख्यधारा के AI विमर्श में मौजूद यूरोकेन्द्रिक झुकाव की आलोचना करने के बजाय, जाति- विमर्श को एल्गोरिद्मिक बायस पर जबरन आरोपित कर भारत को ही “उत्पीड़क” की भूमिका में स्थापित करना, एक गंभीर बौद्धिक प्रश्न खड़ा करता है।

समापन टिप्पणी

फरवरी 2026 में New Delhi ने India AI-Impact Summit 2026 की मेज़बानी की। इस वैश्विक सम्मेलन में 100 से अधिक देशों का प्रतिनिधित्व रहा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया के दिग्गज एक मंच पर जुटे। 500 से अधिक वैश्विक AI लीडर्स और 20 राष्ट्राध्यक्षों व सरकार प्रमुखों की उपस्थिति[17] ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि AI के भविष्य का एक निर्णायक निर्माता बनना चाहता है। इस शिखर सम्मेलन में भारत द्वारा विकसित स्वदेशी AI प्लेटफॉर्म्स की उपलब्धियों को रेखांकित किया गया और देश में बुनियादी यानी foundational AI के विकास को गति देने की व्यापक दृष्टि प्रस्तुत की गई।

लेकिन जैसे-जैसे भारत गैर-पश्चिमी और वैदिक दृष्टिकोणों से प्रेरित स्वदेशी AI नैरेटिव गढ़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, एक चिर-परिचित तंत्र इस प्रगति को पटरी से उतारने की कोशिश में जुटा दिखाई देता है। और इस मुहिम में उसका प्रमुख औज़ार है – “जाति” का आक्रामक नैरेटिव।

टेक, विशेषकर AI का क्षेत्र, अभी हिंदू-विरोधी वोक तंत्र के लिए अपेक्षाकृत नया मोर्चा है। लेकिन रणनीति वही पुरानी है जिसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है: जाति विमर्श को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करो, हिंदू समाज और हिंदू धर्म को “आदर्श उत्पीड़क” के रूप में स्थापित करो, और इस तरह किसी भी वैकल्पिक, स्वदेशी या सभ्यतागत विमर्श की विश्वसनीयता को कमजोर कर दो।

संदर्भ सूची 

[1] UPSC educator Vijender Chauhan claims ChatGPT favours Upper-Caste: How UPSC coaching faculties are injecting caste discrimination in education; https://www.opindia.com/2026/01/upsc-educator-vijender-chauhan-claims-chatgpt-favours-upper-caste-how-upsc-coaching-faculties-are-injecting-caste-hatred-in-education/

[2] UPSC Educator Dr Vijender Chauhan Accuses ChatGPT of Upper-Caste Bias; https://www.newsgram.com/entertainment/2026/01/19/dr-vijender-chauhan-chat-gpt-viral-comment

[3] Alarm Over NEET-PG Cut-Offs As Government Medical Seats Fill At Single-Digit Scores; https://www.ndtv.com/education/alarm-over-neet-pg-cut-offs-as-government-medical-seats-fill-at-single-digit-scores-10980064

[4] OpenAI is huge in India. Its models are steeped in caste bias. | MIT Technology Review; https://www.technologyreview.com/2025/10/01/1124621/openai-india-caste-bias/

[5] Ibid.

[6] A New AI Lexicon: ‘Caste’ – AI Now Institute;  https://ainowinstitute.org/publications/collection/a-new-ai-lexicon-caste

[7] AI knows how caste works in India. Here’s why that’s a worry | India News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/ai-knows-how-caste-works-in-india-heres-why-thats-a-worry/articleshow/128448262.cms

[8] Racist, sexist, casteist: Is AI bad news for India? – The Hindu;  https://www.thehindu.com/sci-tech/technology/racist-sexist-casteist-is-ai-bad-news-for-india/article67294037.ece

[9] Beware: AI is learning caste-based, communally-sensitive human biases in India. How can it be prevented?; https://www.dnaindia.com/science/report-beware-ai-is-learning-caste-based-communally-sensitive-human-biases-in-india-how-can-it-be-prevented-3180433

[10] How AI risks reinforcing caste and inequality – Governance Now; https://www.governancenow.com/views/columns/how-ai-risks-reinforcing-caste-and-inequality

[11] Dalit folklore to AI bias, OffStream Futures Bengaluru spotlights resistance through art;  https://www.thenewsminute.com/karnataka/dalit-folklore-to-ai-bias-offstream-futures-bengaluru-spotlights-resistance-through-art

[12] The Digital Caste System: How LLMs Perpetuate Ancient Hierarchies in Modern India | Feminism in India; https://feminisminindia.com/2025/08/27/the-digital-caste-system-how-llms-perpetuate-ancient-hierarchies-in-modern-india/

[13] Weaponization of Caste and the Attack on IIT Meritocracy;  https://stophindudvesha.org/weaponization-of-caste-and-the-attack-on-iit-meritocracy/

[14] How AI risks reinforcing caste and inequality – Governance Now;  https://www.governancenow.com/views/columns/how-ai-risks-reinforcing-caste-and-inequality

[15] The Case for India’s Digital Sovereignty;  https://stophindudvesha.org/the-case-for-indias-digital-sovereignty/

[16] Ibid.

[17] PM inaugurates India AI Impact Summit 2026 | Prime Minister of India;  https://www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pm-inaugurates-india-ai-impact-summit-2026/?comment=disable

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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