मुसलमानों की बढ़ती संख्या: क्या केरल कश्मीर जैसा बनता जा रहा है?

भारत की “धर्मनिरपेक्ष आदर्श भूमि” के रूप में गढ़ी गई केरल की छवि अब धीरे-धीरे कमजोर होती दिख रही है। जनसंख्या के बदलते समीकरण और बढ़ती राजनीतिक ताकत के साथ, आपसी सह-अस्तित्व बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। इस असंतुलित जनसांख्यिकीय प्रतिस्पर्धा में सबसे अधिक दबाव हिंदू समाज पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
सारांश 

केरल लंबे समय से धार्मिक सौहार्द और सामाजिक संतुलन का प्रतीक माना जाता रहा है। कोच्चि जैसे शहरों में मंदिर, मस्जिद, चर्च और आराधनालय साथ दिखाई देते हैं। पर अब इस तस्वीर के पीछे असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। जनसंख्या अनुपात में बदलाव और मुस्लिम आबादी की तेज़ वृद्धि ने हिंदू और ईसाई समुदायों में प्रभाव घटने की चिंता पैदा की है। ज़िला पुनर्गठन, आरक्षण बढ़ाने और जाति जनगणना की माँगें इस तनाव को और बढ़ाती हैं। रमज़ान में दुकानों पर रोक, भूमि विवाद और वक्फ दावों जैसे मुद्दे अविश्वास गहरा रहे हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज़ है। केरल आज ऐसे मोड़ पर है जहाँ भरोसा और संवाद ही उसके संतुलन को बचा सकते हैं।

 

“जनसंख्या ही भविष्य की दिशा तय करती है।” — ऑगस्त कॉंत, फ्रांसीसी दार्शनिक और लेखक (1798–1857)

कोच्चि की सुबह आज भी किसी पुराने पोस्टकार्ड जैसी लगती है। चारों ओर हरियाली, नारियल के पेड़, शांत बैकवॉटर और दूर तक फैला नीला समुद्र। मछुआरों की छोटी नावें पानी पर धीरे-धीरे सरकती हैं, और किनारे पर लगे पुराने मछली-जाल हवा में हिलते रहते हैं। यही वह केरल है, जिसे दुनिया “गॉड्स ओन कंट्री” के नाम से जानती है।

इसी शहर में एक तरफ़ मंदिर की घंटियाँ बजती हैं, तो कुछ दूरी पर मस्जिद से अज़ान सुनाई देती है। पास ही एक पुराना यहूदी आराधनालय है, जहाँ अब बहुत कम लोग प्रार्थना करने आते हैं। एक लैटिन चर्च भी है, जो समय की मार झेलते हुए आज भी खड़ा है। वर्षों से यही दृश्य केरल के “धार्मिक सौहार्द” और “सह-अस्तित्व” का प्रतीक माना जाता रहा है। किताबों और टीवी चर्चाओं में केरल को इसी वजह से भारत का आदर्श राज्य बताया जाता है।

लेकिन इस सुंदर तस्वीर के पीछे अब धीरे-धीरे दरारें दिखने लगी हैं। पिछले साल गर्मियों में मट्टनचेरी के बाज़ार में मेरी मुलाक़ात एक मछुआरे से हुई। उसका नाम राजन पनिक्कर था। धूप और मेहनत ने उसके हाथों को सख्त बना दिया था। बातचीत के दौरान उसने पास खड़े कुछ युवकों की ओर देखते हुए कहा, “अब हालात बदल रहे हैं। हमारी संख्या कम होती जा रही है। कुछ साल बाद हम अपने ही इलाके में अल्पसंख्यक हो जाएंगे।”

एझावा समुदाय के राजन की यह बेचैनी कई और लोगों की भावनाओं को भी दर्शा रही थी। केरल, जिसे लंबे समय तक साम्प्रदायिक संतुलन का उदाहरण माना जाता रहा, अब जनसंख्या में हो रहे बदलावों को लेकर बेचैन है। मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है। कई अनुमानों के अनुसार, यह जल्द ही कुल आबादी के लगभग 30 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। इसके साथ ही आरक्षण बढ़ाने, नए ज़िले बनाने और प्रशासनिक सीमाएँ बदलने की माँगें भी तेज़ हो रही हैं। इससे हिंदुओं और ईसाइयों में यह डर बढ़ रहा है कि कहीं उनके अधिकार, उनकी सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों तक पहुँच धीरे-धीरे कम न होती चली जाए। यह चिंता केवल केरल तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश में चल रही उस बहस का हिस्सा बन चुकी है, जिसमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक संतुलन पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

आँकड़ों की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता

जब भी धार्मिक कट्टरता या सांप्रदायिक तनाव की बात होती है, तब कई उदारवादी विचारक केरल को एक “मॉडल स्टेट” के रूप में पेश करते हैं। उनका कहना होता है कि यहाँ मुस्लिम और ईसाई बड़ी संख्या में हैं, फिर भी समाज शांतिपूर्ण है। वे यह भी कहते हैं कि मज़बूत अल्पसंख्यक समुदाय “हिंदू बहुमत” को संतुलित करता है। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि केरल की विकास उपलब्धियों के पीछे मुस्लिम और ईसाई समुदायों की भूमिका निर्णायक रही है[1]। उनके अनुसार, अगर ये समुदाय और बढ़ जाएँ तो राज्य और बेहतर हो जाएगा।

लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है।

2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में हिंदू 54.73 प्रतिशत, मुस्लिम 26.56 प्रतिशत और ईसाई 18.38 प्रतिशत थे[2]। यह एक संतुलित स्थिति लगती थी। लेकिन अगले कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले। 2021 में मुस्लिम आबादी में लगभग एक लाख चार हजार लोगों की बढ़ोतरी हुई, जबकि हिंदू आबादी में सिर्फ़ लगभग एक हज़ार लोगों की वृद्धि हुई। वहीं ईसाई समुदाय की संख्या में छह हज़ार से अधिक की कमी आ गई[3]। 2023 तक आते-आते, सरकारी और स्वतंत्र सर्वेक्षणों के अनुसार, हिंदू घटकर लगभग 53 प्रतिशत रह गए, मुस्लिम बढ़कर लगभग 29 प्रतिशत हो गए, और ईसाई 17 प्रतिशत से नीचे आ गए[4]

जन्म के आँकड़े इस बदलाव को और साफ़ करते हैं। 2019 में जन्म लेने वाले बच्चों में लगभग 44 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से थे, जबकि हिंदुओं का हिस्सा लगभग 41 प्रतिशत और ईसाइयों का केवल 14 प्रतिशत था[5]। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशकों में मुस्लिम समुदाय केरल में सबसे बड़ा समूह बन सकता है। हालाँकि, सभी समुदायों में जन्म दर अब कम हो रही है, यानी समाज धीरे-धीरे बूढ़ा हो रहा है। फिर भी आबादी का अनुपात लगातार बदल रहा है। ये आँकड़े केवल काग़ज़ पर लिखे नंबर नहीं हैं। ये लोगों की सोच, उनके डर और उनके भविष्य की योजनाओं को प्रभावित कर रहे हैं। केरल में धर्म केवल आस्था का विषय नहीं है। यह राजनीति, रोज़गार, शिक्षा और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।

इसीलिए जब जनसंख्या का संतुलन बदलता है, तो उसका असर हर स्तर पर पड़ता है।

आज कई हिंदू परिवारों को यह महसूस होने लगा है कि उनका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। ईसाई समुदाय भी असुरक्षित महसूस करने लगा है। लोगों को डर है कि कहीं वे अपने ही राज्य में हाशिये पर न चले जाएँ।

समीकरण सीधा है। जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे हिंदुओं और ईसाइयों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि कौन कितना बढ़ रहा है। असली सवाल यह है कि क्या केरल आने वाले समय में अपने पुराने संतुलन, आपसी भरोसे और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बचा पाएगा या नहीं।

मुसलमानों की सतत विभाजन की राजनीति

हाल के महीनों में केरल के एर्नाकुलम ज़िले को विभाजित करने की माँग ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जनवरी 2026 की शुरुआत में ‘केरल मुस्लिम जमाअत’ नामक एक प्रमुख संगठन ने सार्वजनिक रूप से इस ज़िले को दो हिस्सों में बाँटने की माँग की। प्रस्ताव था कि मुवत्तुपुझा को केंद्र बनाकर एक नया ज़िला बनाया जाए[6]। संगठन का तर्क था कि जनसंख्या में बदलाव और सामाजिक परिस्थितियों के कारण यह कदम “संतुलित विकास” के लिए आवश्यक है।

ऊपरी तौर पर यह माँग प्रशासनिक सुधार की तरह लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरी राजनीतिक गणना भी दिखाई देती है। पिछले कुछ वर्षों में मुवत्तुपुझा और आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ी है। नया ज़िला बनने पर इस क्षेत्र में मुस्लिम प्रभाव और संगठित हो सकता है। इससे स्थानीय राजनीति, प्रशासन और संसाधनों पर उनकी पकड़ मजबूत होने की संभावना है।

कोच्चि के एक वरिष्ठ ईसाई नेता ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “यह धीरे-धीरे अलग तरह के इलाक़े बनाने की कोशिश है।” स्थानीय मीडिया में भी ऐसी ही आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं।

एर्नाकुलम में वर्तमान में लगभग 46 प्रतिशत हिंदू और 38 प्रतिशत ईसाई हैं। यानी हिंदू यहाँ बहुत मामूली बहुमत में हैं। ऐसे में ज़िले के विभाजन की योजना उन्हें अपने सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव के कमजोर होने की शुरुआत लगती है। देशभर में चल रही जनसंख्या बदलाव की बहसों ने इस डर को और गहरा कर दिया है।

इन चिंताओं की जड़ें इतिहास में भी मिलती हैं। 1969 में मलप्पुरम ज़िले का गठन इसी तरह की एक मिसाल है। मलप्पुरम भारत का पहला ऐसा ज़िला था, जिसे विशेष रूप से मुस्लिम-बहुल क्षेत्र के रूप में विकसित किया गया। इसे कई लोग धार्मिक आधार पर सीमाएँ तय करने की शुरुआत मानते हैं।

यह घटना उस दौर के कुछ ही वर्षों बाद हुई थी, जब देश के मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने पाकिस्तान के समर्थन में आंदोलन किए थे। केरल के कुछ इलाक़ों से भी उस समय अलगाववादी राजनीति को बल मिला था। इसलिए मलप्पुरम के गठन को कई लोगों ने उसी मानसिकता की निरंतरता के रूप में देखा[7]

वरिष्ठ वामपंथी नेता पालोली मोहम्मद ने एक बार कहा था कि आज़ादी से पहले पाकिस्तान की सबसे ज़ोरदार माँग मलप्पुरम क्षेत्र से उठी थी। उनके अनुसार, उस समय मुस्लिम लीग को ब्रिटिश शासन का समर्थन भी मिला, क्योंकि कई प्रभावशाली मुस्लिम नेता अंग्रेज़ों के पक्ष में थे[8]

आज एर्नाकुलम के विभाजन की माँग उसी पुराने राजनीतिक तरीके की याद दिलाती है — पहले जनसंख्या का संतुलन बदला जाए, फिर प्रशासनिक ढाँचा अपने पक्ष में ढाला जाए। यही वजह है कि इस मुद्दे ने केरल में एक बार फिर सह-अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सामुदायिक संसाधनों पर इस्लामी दबाव

केरल में बढ़ती साम्प्रदायिक बेचैनी को और गहरा कर रही हैं नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण बढ़ाने की माँगें। वर्तमान में राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) व्यवस्था के अंतर्गत मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में लगभग 10 से 12 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। यह व्यवस्था आज़ादी से पहले बनाई गई उन नीतियों की विरासत है, जिनका उद्देश्य उस समय के मुस्लिम समाज की सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की भरपाई करना था। लेकिन अब मुस्लिम समुदाय के नेता मानते हैं कि यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। पिछड़ा वर्ग विकास विभाग द्वारा 2025 में किए गए एक सर्वे के अनुसार, राज्य की सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी केवल 13.5 प्रतिशत है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात से कम है। इसी आँकड़े को आधार बनाकर आरक्षण बढ़ाने की माँग तेज़ होती जा रही है[9]

इसी संदर्भ में जाति जनगणना की माँग भी सामने आई है। इस माँग को राज्य की प्रमुख विपक्षी गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की सहयोगी पार्टी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, खुलकर समर्थन दे रही है। इसका उद्देश्य आरक्षण की नई सीमा तय करना है, जिससे मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी बढ़कर 15 से 20 प्रतिशत तक पहुँच सके। मुस्लिम नेतृत्व इसे सामाजिक न्याय और समान अवसर का प्रश्न बताता है, न कि किसी विशेष समुदाय को लाभ पहुँचाने का प्रयास।

लेकिन हिंदू और ईसाई समुदायों की नज़र में यह प्रवृत्ति “अल्पसंख्यकवाद” जैसी लगती है। उन्हें लगता है कि बढ़ती जनसंख्या के आधार पर असमान लाभ लेने की कोशिश हो रही है। यह चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाले धन और प्रेषण ने कई मुस्लिम परिवारों की आर्थिक स्थिति को पहले ही मजबूत बना दिया है। ऐसे में अतिरिक्त आरक्षण उन्हें अनुचित लाभ जैसा प्रतीत होता है।

इन विवादों की जड़ें केरल के इतिहास में भी छिपी हैं। सदियों तक यह राज्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है। सातवीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के साथ इस्लाम यहाँ पहुँचा। चौथी शताब्दी में फ़ारस से आए सीरियाई ईसाइयों ने ईसाई परंपरा को मजबूत किया। यहूदी व्यापारी और शरणार्थी इससे भी पहले यहाँ बस चुके थे। मसालों के व्यापार ने इन सभी समुदायों को जोड़ा और साथ रहने की परंपरा विकसित हुई[10]। समय के साथ आपसी विवाह, साझा रीति-रिवाज़ और सामाजिक सहयोग ने सह-अस्तित्व की मजबूत संस्कृति बनाई। 95 प्रतिशत से अधिक साक्षरता दर और 1957 के बाद हुए भूमि सुधारों ने इस संतुलन को और मजबूत किया।

लेकिन हाल के दशकों में मुस्लिम समुदाय की आर्थिक प्रगति तेज़ हुई है। खाड़ी देशों में रोजगार, वहाँ से आने वाला धन, और कुछ मामलों में अपंजीकृत विदेशी पूँजी ने इस उभार को और बढ़ाया है[11]। इसके बावजूद, समुदाय के भीतर और बाहर असंतोष की भावना बनी हुई है।

एझावा और नायर जैसे पारंपरिक हिंदू समुदाय अपने राजनीतिक और भूमि-संबंधी प्रभाव के कम होने से चिंतित हैं। वहीं, मध्य केरल में बसे ईसाई घटती जन्म दर और बदलते माहौल के कारण अपनी सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं।

इन चर्चाओं में कश्मीर का उदाहरण बार-बार सामने आता है। 1990 के दशक में वहाँ कश्मीरी पंडितों का पलायन, संपत्ति का नुकसान और सामाजिक विघटन आज भी लोगों की स्मृति में है[12]। कोच्चि के एक शिक्षाविद् ने चिंता जताते हुए कहा, “अगर केरल मुस्लिम-बहुल हो गया, तो क्या हिंदुओं की स्थिति भी वैसी ही हो जाएगी?” कश्मीर में हिंदुओं के सीमित होते राजनीतिक अधिकारों और पक्षपाती भूमि कानूनों का उदाहरण देकर केरल के हिंदू और ईसाई अपनी आशंकाओं को सही ठहराते हैं। इसी संदर्भ में एक व्यापारी, राजन, ने थके और चिंतित स्वर में कहा, “जब बहुमत बदल जाता है, तो सुरक्षा अपने आप खत्म हो जाती है।”

यही आशंका आज केरल की सामाजिक बहसों के केंद्र में है।

सह-अस्तित्व को चुनौती

केरल में सामाजिक तनाव अब केवल चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन में महसूस किया जाने लगा है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण मलेशिया में रहने वाली प्रवासी भारतीय कृष्णेंदु आर. नाथ के अनुभव से मिलता है। रमज़ान के दौरान वे मलप्पुरम ज़िले से यात्रा कर रही थीं, जो मुस्लिम-बहुल क्षेत्र है। रास्ते में उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें नींबू पानी की आवश्यकता पड़ी।

उनके पति के मित्र ने सड़क किनारे कई दुकानों से संपर्क किया, लेकिन हर जगह यही जवाब मिला कि रोज़े के महीने में ऐसी चीज़ें नहीं बेची जा सकतीं। यह सुनकर नाथ स्वयं एक दुकान पर पहुँचीं और दुकानदार से पूछा कि गैर-रोज़ेदार यात्रियों के लिए पानी या शरबत बेचने में क्या समस्या है। दुकानदार ने बिना झिझक कहा कि वह बेचने के पक्ष में है, लेकिन डर के माहौल में ऐसा करना उसके लिए सुरक्षित नहीं है[13]

यह घटना केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक माहौल का संकेत है।

लेखक तुफ़ैल अहमद के अनुसार, भारत की पहचान हमेशा सह-अस्तित्व रही है। अलग-अलग धर्मों के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं। रमज़ान के दौरान मुसलमानों द्वारा दिन में भोजनालय बंद रखना समझ में आता है, लेकिन यह गंभीर चिंता की बात है कि अब हिंदू और ईसाई भी अपने रेस्तराँ और दुकानें नहीं खोल पा रहे हैं। उनके अनुसार, डर और दबाव के कारण स्थानीय हिंदू समुदाय धीरे-धीरे स्वयं को कमज़ोर स्थिति में मानने लगा है।

कोच्चि के वास्तुकार विवेक विभा भी इसी स्थिति की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि मलप्पुरम में हिंदू समुदाय अब संख्या और प्रभाव दोनों में कमजोर हो गया है। कुछ वर्षों पहले वहाँ मंदिरों में आग लगाने की घटनाएँ हुई थीं। यद्यपि इसका दोष एक मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति पर डाला गया, लेकिन यह सवाल बना रहा कि ऐसी घटनाएँ केवल एकतरफा क्यों दिखाई देती हैं।

अहमद का मानना है कि ये घटनाएँ अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक सोच का हिस्सा हैं, जो केरल के सामाजिक संतुलन को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है।

इसका असर कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। अभिनेत्री अंसिबा हसन को बौद्ध भिक्षुओं के साथ तस्वीर साझा करने पर कट्टरपंथी हमलों का सामना करना पड़ा। दबाव में उन्हें वह तस्वीर हटानी पड़ी। इसी तरह, अभिनेत्री नज़रिया नाज़िम को हिजाब न पहनने के कारण आलोचना और धमकियों का सामना करना पड़ा।

ये सभी उदाहरण दर्शाते हैं कि केरल की सह-अस्तित्व की परंपरा अब गंभीर दबाव में है। समाज के भीतर असहजता और अविश्वास बढ़ रहा है। यदि इस स्थिति को समय रहते नहीं समझा गया, तो आने वाले वर्षों में इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

जिहाद की ओर झुकाव

केरल में इस्लाम का कट्टरपंथी और जिहादी स्वरूप कई बार ज़मीनी विवादों और राजनीतिक टकरावों के रूप में सामने आया है। इसका एक प्रमुख उदाहरण मुनंबम भूमि विवाद है। एर्नाकुलम ज़िले में स्थित लगभग 404 एकड़ ज़मीन पर केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने यह दावा किया कि वह इस्लामी संपत्ति है। बोर्ड का कहना था कि यह भूमि ऐतिहासिक रूप से धार्मिक उद्देश्य के लिए समर्पित रही है। लेकिन इस दावे का वहाँ रहने वाले अधिकांश ईसाई निवासियों ने कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि यह ज़मीन दशकों पहले वैध रूप से खरीदी-बेची गई थी और कई परिवार पीढ़ियों से वहाँ रह रहे हैं। उनके पास कानूनी दस्तावेज़ भी मौजूद थे, जो उनके स्वामित्व को प्रमाणित करते थे। 2024 में केरल हाई कोर्ट ने इस मामले में वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि बोर्ड ने उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और उसके दावे में गंभीर खामियाँ थीं। हालाँकि, कानूनी रूप से मामला सुलझ जाने के बाद भी समाज में इसका असर बना रहा। इस विवाद ने साम्प्रदायिक बयानबाज़ी को और तेज़ कर दिया। सोशल मीडिया पर “लैंड जिहाद” जैसे शब्दों का व्यापक प्रयोग होने लगा। भले ही कुछ उदारवादी वर्गों ने इस शब्द को अतिशयोक्ति बताया, लेकिन मुनंबम मामले ने आम लोगों के मन में यह भावना पैदा कर दी कि भूमि पर नियंत्रण को लेकर एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है।

इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी, जो अब तक केरल में राजनीतिक रूप से कमजोर रही थी, ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पहली बार एक सीट जीती। पार्टी ने हिंदुओं और ईसाइयों की बढ़ती चिंताओं को राजनीतिक मंच दिया और उन समूहों से गठजोड़ किया, जो मुस्लिम प्रभाव के विस्तार से असहज महसूस कर रहे थे[14]

इन सामाजिक चिंताओं के बीच एक और गंभीर तथ्य सामने आया। केरल से अपेक्षाकृत बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन से जुड़ते पाए गए। यह संगठन दुनिया भर में तथाकथित “खिलाफ़त” स्थापित करने के लक्ष्य से काम करता है। 2017 से 2019 के बीच लगभग 149 लोग केरल से इस संगठन में शामिल हुए या शामिल होने का प्रयास करते पाए गए[15]

इस प्रवृत्ति ने पूर्व मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन की 2010 की चेतावनियों को फिर से चर्चा में ला दिया। उन्होंने उस समय कहा था कि “लव जिहाद” के माध्यम से संगठित रूप से धर्मांतरण कराया जा रहा है। उनके अनुसार, चरमपंथी संगठन अन्य धर्मों की युवतियों को प्रेम संबंधों में फँसाकर, आर्थिक प्रलोभन देकर और विवाह के माध्यम से धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं। अच्युतानंदन का यह भी कहना था कि यह सब योजनाबद्ध ढंग से किया जा रहा है। इसी तरह, केरल हाई कोर्ट ने भी अगस्त 2009 में पुलिस को निर्देश दिया था कि वह जाँच करे कि क्या प्रेम और धन के ज़रिए युवाओं को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करने वाला कोई संगठित नेटवर्क सक्रिय है[16]

केरल पहले से ही एक सीमित संसाधनों वाला राज्य है, जहाँ विभिन्न धार्मिक समुदाय रोज़गार, शिक्षा और राजनीतिक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इस कारण समाज में लंबे समय से ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति मौजूद रही है। लेकिन हाल के वर्षों में यह ध्रुवीकरण और गहरा हुआ है।

ईसाई समुदाय, जो कभी हिंदुओं के साथ मिलकर मुस्लिम राजनीति का संतुलन बनाता था, अब सत्तारूढ़ गठबंधन में IUML के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित है। वहीं, जातिगत विभाजन में बँटे हिंदू अब तुष्टीकरण की आशंका के चलते एकजुट होने लगे हैं।

मंदिरों में तोड़फोड़, त्योहारों के जुलूस मार्गों पर विवाद और स्थानीय झगड़े बढ़ते तनाव के संकेत हैं। अभी तक केरल बड़े दंगों से बचा हुआ है, लेकिन भीतर ही भीतर असंतोष की परतें जमती जा रही हैं।

विडंबना यह है कि इस स्थिति से सबसे अधिक नुकसान केरल के मुसलमानों को ही हो सकता है, जो पूरे देश में अपने समुदाय का सबसे समृद्ध वर्ग माने जाते हैं। खाड़ी देशों से आने वाला धन मस्जिदों, स्कूलों और व्यापारिक संस्थानों को चलाता है, और यह सब स्थिरता पर निर्भर करता है। बढ़ता ध्रुवीकरण निवेश को रोक सकता है, प्रवासन को प्रभावित कर सकता है और कश्मीर की तरह केंद्र सरकार के हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकता है।

बढ़ते तनाव और अनिश्चित भविष्य पर बात करते हुए, मलप्पुरम के एक मुस्लिम व्यापारी ने अपने गोदाम में रखे खाड़ी से आए माल की ओर देखते हुए कहा, “हम सब एक ही नाव में सवार हैं। अगर यह डूब गई, तो कोई भी नहीं बचेगा।”

यही चेतावनी आज केरल के सामने खड़ी सबसे बड़ी सच्चाई है।

आगे का रास्ता

जब शाम को बैकवॉटर पर सूरज ढलता है और पानी पर सुनहरी रोशनी फैल जाती है, तो मन में यही उम्मीद जागती है कि दिनभर की बेचैनी और तनाव फिर से शांति में बदल जाए। लोग चाहते हैं कि डर और अविश्वास की जगह आपसी समझ और भरोसा लौट आए। केरल की सुंदरता इसी में है कि यहाँ अलग-अलग धर्म और परंपराएँ मिलकर एक संतुलित समाज बनाती हैं। यह सुंदरता समानता में नहीं, बल्कि सामंजस्य में है।

अगर समाज के ये अलग-अलग हिस्से टूटने लगें, तो नुकसान केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे राज्य की पहचान और आत्मा प्रभावित होगी। तब “गॉड्स ओन कंट्री” केवल एक पर्यटन नारा बनकर रह जाएगा।

अगर कट्टरपंथी सोच हावी हो गई और केरल अपना संतुलन खो बैठा, तो यह उन लोगों के लिए भी एक झटका होगा, जो वर्षों से कहते आए हैं कि मजबूत हिंदू बहुमत लोकतंत्र के लिए ज़रूरी नहीं है। आज देशभर में आम लोग यह महसूस करने लगे हैं कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब बहुसंख्यक समाज स्वयं को असुरक्षित न माने।

कश्मीर, बंगाल और कुछ अन्य क्षेत्रों के अनुभव लोगों के सामने हैं, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक बनकर हाशिये पर चले गए। यही चेतावनी केरल के लिए भी है।

अब केरल के सामने अवसर है कि वह समय रहते अपने सामाजिक संतुलन को बचाए और अपनी बहुलतावादी परंपरा को केवल शब्दों में नहीं, जीवन में भी बनाए रखे। तभी उसकी असली पहचान जीवित रह पाएगी।

संदर्भ सूची 

[1] Government of Kerala. “Quality of Life.” Invest Kerala 2025. https://investkerala2025.kerala.gov.in/quality-of-life/

[2] Government of Kerala. “Quality of Life.” Invest Kerala 2025. https://investkerala2025.kerala.gov.in/quality-of-life/

[3] Census2011. “Kerala Religion Data.” https://www.census2011.co.in/data/religion/state/32-kerala.html

[4] Samayam Malayalam. “Religious and Community Population Data of Kerala.” https://malayalam.samayam.com/latest-news/kerala-news/religious-and-samudayika-population-data-of-kerala-hindus-christians-muslims-nairs-and-ezhavas/articleshow/126435548.cms

[5] Centre for Policy Studies India. “Religious Demography of India I: Kerala.” CPS Blog, January 2025.
https://blog.cpsindia.org/2025/01/religious-demography-of-india-i-kerala.html

[6] Mathrubhumi English. “Kerala Muslim Jamaath Seeks New District with Muvattupuzha as Headquarters.”
https://english.mathrubhumi.com/news/kerala/bifurcate-ernakulam-kerala-muslim-jamaath-seeks-new-district-with-muvattupuzha-as-headquarters-e18walzy

[7] Swarajya. “Soft Corner for Communists: What Else Explains Media’s Silence on the Tanur Riots in Kerala?” https://swarajyamag.com/politics/soft-corner-for-communists-what-else-explains-medias-silnece-on-the-tanur-riots-in-kerala

[8] Times of India. “Demand for Pakistan Was Popular in Malappuram.” https://timesofindia.indiatimes.com/city/kochi/demand-for-pak-was-popular-in-mlpm/articleshow/116950228.cms

[9] Press Information Bureau, Government of India. “Review Meeting on Backward Classes Development.”
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2184988&reg=3&lang=2

[10] International Journal of Creative Research Thoughts. “Socio-Religious Study of Kerala.” https://ijcrt.org/papers/IJCRT2203176.pdf

[11] Enforcement Directorate, Government of India. “Press Release: Arrest of Ismail Chakkarath.” November 27, 2024. https://enforcementdirectorate.gov.in/sites/default/files/latestnews/Press%20Release%20%20Arrest-Ismail%20Chakkarath-27-11-2024%203.pdf

[12] SAGE Journals. “Article on Radicalisation in Kerala.” https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/17506980241243236

[13] Ahmed, Tufail. “The Roots of Islamic Radicalisation in Kerala.” New Age Islam.
https://www.newageislam.com/radical-islamism-jihad/tufail-ahmad-new-age-islam/the-roots-islamic-radicalisation-kerala/d/108722

[14] Verdictum. “Kerala High Court on Munambam Waqf Property Dispute.”
https://www.verdictum.in/court-updates/high-courts/kerala-high-court/the-state-v-tki-ahamed-sherief-2025ker74409-munambam-property-waqf-property-dispute-1594079

[15] Onmanorama. “Kerala Youth Recruited by ISIS Terror Outfits.” July 28, 2020.
https://www.onmanorama.com/news/kerala/2020/07/28/kerala-isis-recuits-terror-outfits.html

[16] Times of India. “Kerala CM Reignites ‘Love Jihad’ Theory.”
https://timesofindia.indiatimes.com/india/kerala-cm-reignites-love-jihad-theory/articleshow/6216779.cms

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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