सिंध से सिंदूर की यात्रा: हिंदू संयम का अंत और युद्धनीति का नया अध्याय

जिस संयम को भारत ने धर्म समझकर पाला, अब उसे अपने मार्ग की बाधा के रूप में देखता है। ऑपरेशन सिंदूर बताता है कि हिंदू समाज ने अब नैतिक भ्रमों की जंजीरें तोड़ दी हैं, और एक नई युद्धनीति अपनाई है।
  • भारत की महान सभ्यता कई बार हमलावरों से इसलिए हार गई क्योंकि हमने जरूरत से ज़्यादा दया दिखाई और धर्म युद्ध के आदर्शों से बंधे रहे।
  • पुराने हिंदू ग्रंथ नैतिकता और रणनीति दोनों के साथ युद्ध का समर्थन करते हैं। आज के भारत को भी इसी संतुलन की जरूरत है।
  • उपनिवेश और गांधीवादी सोच ने भारत में निष्क्रियता को आदर्श बना दिया, जिससे हमारी सुरक्षा कमज़ोर हुई।
  • ऑपरेशन सिंदूर दिखाता है कि भारत अब इंतज़ार नहीं करता — वह पहले ही खतरे को खत्म करने की नीति पर चल पड़ा है।
  • यह नई युद्धनीति हिंदू परंपरा से जुड़ी है, लेकिन अब वह केवल आदर्शों तक सीमित नहीं — यह सोच-समझकर लिया गया, शक्तिशाली और अपनी बात खुद रखने वाला दृष्टिकोण है।

हज़ारों सालों से भारतीय सभ्यता एक अजीब विरोधाभास का सामना कर रही है। यह सभ्यता धनवान थी, वीरता से भरपूर थी और आध्यात्मिक रूप से बहुत गहरी थी, फिर भी कई बार छोटी लेकिन ज़्यादा आक्रामक ताक़तों से हारती रही। प्राचीन असीरियाई आक्रमणों से लेकर इस्लामी हमलों और यूरोपीय उपनिवेशवाद तक, यह कहानी अधूरी जीतों और खोए हुए मौकों से भरा रहा है। लेकिन अब ऑपरेशन सिंदूर के साथ यह कहानी एक नया मोड़ ले चुकी है — अब संयम को पुण्य नहीं समझा जाता, और दया उन दुश्मनों पर नहीं दिखाई जाती जिन्होंने भारत के विनाश की कसम खाई है।[1]

इससे पहले कि हम उस शांतिवाद पर चर्चा करें जिसने कई हिंदुओं को कमजोर बना दिया और हिंदू राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में निर्णय लेने की ताक़त को पंगु कर दिया, आइए थोड़ा पीछे चलते हैं और देखते हैं कि हमारे पूर्वज आत्मरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में क्या सोचते थे।

प्राचीन हिंदू ऋषियों ने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध को स्वीकार किया और उसका समर्थन किया। ऋग्वेद, जो दुनिया का सबसे पुराना ग्रंथ है, उसमें भारत के प्राचीन राजाओं द्वारा अपने शत्रुओं से लड़े गए भीषण युद्धों का ज़िक्र है।[2]

तीसरी शताब्दी ईस्वी में तमिल संत तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में लिखा था: “वह सेना जो पूरी तरह से संगठित हो और जो चोटों से डरे बिना जीत हासिल करे, वही राजा की सबसे बड़ी पूँजी होती है।” उन्होंने यह भी कहा था: “अधूरे प्रयास और अधूरे छोड़े गए शत्रु सुलगती आग की तरह होते हैं — वे सबकुछ जला सकते हैं।[3]

चौथी शताब्दी के रणनीतिकार कमंडक ने नीतिसार में लिखा: “जिस राजा की सेना सशक्त और सक्षम हो, उसके दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं; और ऐसा राजा बिना रोक-टोक के पूरी धरती पर शासन करता है।”[4]

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब युद्ध टालना संभव न हो, तो यह धर्म के लिए लड़ने वालों को अधर्म मिटाने का एक सुनहरा अवसर होता है। उन्होंने आगे कहा कि “एक योद्धा होने के नाते, अपने कर्तव्य पर विचार करो और डरो मत। वास्तव में, धर्म की रक्षा के लिए लड़ाई करना ही योद्धा का सबसे श्रेष्ठ काम होता है।[5]

श्रीकृष्ण से भी पहले, लगभग 7,700 साल पहले, महर्षि पराशर ने पराशर स्मृति में लिखा था: “एक क्षत्रिय का धर्म है कि वह देश के नागरिकों को हर तरह के अत्याचार से बचाए। इसके लिए ज़रूरत पड़ने पर हिंसा का उपयोग करना भी उचित है ताकि कानून और व्यवस्था बनी रहे। उसे शत्रु राजाओं की सेनाओं को हराकर धर्म के सिद्धांतों पर आधारित शासन स्थापित करना चाहिए।[6]

यहाँ तक कि गौतम बुद्ध, जिन्हें सबसे शांतिप्रिय माना जाता है, उन्होंने भी युद्ध के महत्व को नहीं नकारा था। पाली ग्रंथों में उन्होंने कहा है कि सेना में भर्ती केवल जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता और युद्ध कौशल के आधार पर होनी चाहिए। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में उन्होंने कोसल नरेश प्रसेंजीत को सलाह दी थी कि बिना प्रशिक्षण और अनुभव के युवाओं को सेना में भर्ती करना नुकसानदायक हो सकता है, और सभी वर्गों से सैनिक लेने का उपदेश दिया था।[7]  बुद्ध को अपने शब्दों का मतलब पता था — वे किसी आम परिवार से नहीं, एक बलशाली हिंदू राजा के घर से थे।

हिंदू धर्मशास्त्रियों ने कभी भी रक्षा जैसे गंभीर विषय से मुँह नहीं मोड़ा। लेखक पथ्मराज नागालिंगम लिखते हैं: “थिरुक्कुरल में युद्ध और राज्य-चालन को लेकर जो सोच दिखाई देती है, वह रणनीतिक, व्यावहारिक और आक्रामक है। यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि तमिलों के सबसे लोकप्रिय देवता भगवान स्कंद मुरुगन हैं — जो युद्ध के देवता माने जाते हैं।[8]

पीछे हटने की मानसिकता का उद्गम

तो फिर आधुनिक भारत में ऐसा क्या हुआ कि वह शांति और गुलामी का प्रतीक बन गया? आख़िर भारत के नेताओं में ऐसा कौन-सा डर या गलतफहमी घर कर गई थी, जो उन्होंने उन विदेशी हमलावरों को कभी देश से बाहर नहीं निकाला, जिन्होंने कभी हमारे पूर्वजों का कत्लेआम किया था?

भारत का सैन्य संयम तीन ऐतिहासिक घटनाओं से साफ़ दिखता है: पहली 638 से 711 ईस्वी के बीच सिंध पर हुए अरबों के हमले[9]; दूसरी, 1191 में तराइन की पहली लड़ाई[10]; और तीसरी, 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की सेना की हार और 93,000 सैनिकों की गिरफ्तारी।[11]

हर बार भारत ने युद्ध जीता, लेकिन दुश्मन का पूरी तरह से अंत नहीं किया। भारत ने हमलावरों को कई बार छोड़ दिया — कभी करुणा के नाम पर, कभी ग्रह-नक्षत्रों के डर से, और कभी नैतिक भ्रम में फँसकर। सिंध, जो सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से भारत का हिस्सा था, वहाँ की हार का बदला कभी नहीं लिया गया। पृथ्वीराज चौहान की सबसे बड़ी गलती थी मोहम्मद गौरी को ज़िंदा छोड़ देना और पूरी ताकत से उसका अंत न करना — और भारत ने इस चूक की बहुत बड़ी कीमत चुकाई। भारत के राजा वीरता से लड़े, लेकिन युद्ध का ठीक तरह से अंत नहीं किया। उन्होंने बार-बार शुरुआती जीत हासिल की, पर पूर्ण विजय से पहले ही युद्ध को रोक दिया। इसका एक बड़ा कारण था धर्म युद्ध की नीति, जो कहती है कि युद्ध न्यायपूर्ण और सीमित नियमों के तहत हो।[12]

भारत का संयम केवल सोच तक सीमित नहीं था — उसे एक संस्थागत परंपरा का रूप दे दिया गया। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लोगों से हथियार छीन लिए। सिर्फ राजपूतों को हथियार रखने की इजाजत थी, और वह भी शासकों की निगरानी में। अंग्रेज आए तो उन्होंने इसे क़ानून का रूप दे दिया; भारतीय दंड संहिता के तहत हथियार रखना अपराध बना दिया गया।

इसके बाद शुरू हुई मानसिक ग़ुलामी। ब्रिटिश विद्वानों ने भारत को अहिंसा और शांति की धरती के रूप में पेश किया। उन्होंने सम्राट अशोक को आदर्श शासक बताया, जिन्होंने युद्ध छोड़ दिया था। मौर्य, गुप्त और मराठा जैसे पराक्रमी राजाओं की विरासत को नज़रअंदाज़ किया गया और उसकी जगह अहिंसा को महिमामंडित किया गया।

इसके बाद आया गांधीवादी दौर — जिसे कई आलोचक ‘गांधीगिरी’ कहकर भी पुकारते हैं। इस सोच ने भारत की रणनीतिक रीढ़ को एकदम खोखला कर दिया। 1948 और 1965 में पाकिस्तान को पूरी तरह हराने का मौका छोड़ दिया गया, 1971 की निर्णायक जीत के बाद भी बढ़त को इस्तेमाल नहीं किया गया, और 1962 में चीन से युद्ध से पहले ज़रूरी सैन्य तैयारियाँ नहीं की गईं। इसी आदर्शवादी सोच ने भारत को भीतर से कमज़ोर किया और दुश्मनों को बार-बार हमला करने का साहस दिया।

धर्म युद्ध: आदर्शवाद या अव्यावहारिकता?

कई भारतीय धर्म युद्ध की बात करते हुए गर्व महसूस करते हैं। ईसाई धर्म के ‘क्रूसेड’ और इस्लाम के ‘जिहाद’ के उलट, हिंदू धर्म किसी धर्म विशेष के ख़िलाफ़ युद्ध को सही नहीं ठहराता।

अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर सूर्य पी. सुवेदी ने अपनी किताब में लिखा है: “धर्म का मतलब है — ब्रह्मांडीय व्यवस्था में कानून और व्यवस्था के ज़रिए शांति बनाए रखना। इसलिए हिंदू धर्म में युद्ध उन लोगों के खिलाफ़ होता है जो अत्याचारी या अन्यायी होते हैं, चाहे वे अपने हों या विदेशी।[13]

हिंदू युद्ध नीति का आधार सही-गलत, और न्याय-अन्याय पर है — और यह सभी मनुष्यों पर लागू होती है। इस नीति के तहत युद्ध कब लड़ा जाए, इसके भी कुछ निश्चित नियम थे, जिन्हें राजा को अनिवार्य रूप से मानना पड़ता था। अगर कोई राजा ऐसा नहीं करता, तो उसे न तो सच्चा शासक माना जाता और न ही विजयी। जिस तरह आज के अंतरराष्ट्रीय कानून युद्ध को नियंत्रित करते हैं, वैसे ही हिंदू धर्म में भी युद्ध को मानवीय बनाए रखने के लिए नियम थे, जैसे युद्ध खुले में हो और सीधे किया जाए।[14]

लेकिन एक ही नियम हर युग में नहीं चल सकता। सतयुग के आदर्श, कलियुग की कठोर वास्तविकताओं में काम नहीं आते। हमारे शासकों ने यह समझने से इनकार कर दिया कि धर्म युद्ध जैसे सिद्धांत उन आक्रमणकारियों पर लागू नहीं हो सकते जो खुद किसी नियम या नैतिकता को नहीं मानते, चाहे वे इस्लामी हों या ईसाई। ऐसे दुश्मनों से मुकाबला उन्हीं की भाषा और रणनीति में करना पड़ता है।

कमंडक ने कहा था कि असली जीवन में धर्म युद्ध और कूट युद्ध दोनों ज़रूरी होते हैं।[15] बाणभट्ट ने हर्षचरित में भी कहा है कि स्थिति के अनुसार धर्मप्रिय राजा को भी कूटनीतिक युद्ध का सहारा लेना पड़ सकता है। अगर भारत यह सच्चाई समय पर समझ लेता, तो शायद हम कई त्रासदियों और ज़मीन खोने से बच सकते थे।

हमारे शासकों ने हमलावरों का पीछा नहीं किया, उन्हें सज़ा नहीं दी, और उन्हें पूरी तरह से समाप्त नहीं किया। इसी वजह से धन, जनशक्ति और युद्ध कौशल होते हुए भी, भारत टूटे हुए राजवंशों और उजड़े हुए मंदिरों की धरती बन गया।

अगर हिंदू शासकों ने इस्लामी हमलावरों को बग़दाद, सीरिया, फारस, तुर्की और समरकंद तक खदेड़ दिया होता, तो भारत शायद कभी गुलाम नहीं बनता। उन राज्यों में न तो इतनी जनसंख्या थी और न ही संसाधन कि वे बार-बार भारत पर हमला कर पाते। सातवीं शताब्दी में खलीफा उस्मान भारत में हुई हार से इतने परेशान हुए कि उन्होंने भारत पर दोबारा हमला करने से मना कर दिया। खलीफा वालिद ने लिखा था: “भारत के लोग चतुर हैं और यह देश बहुत दूर है। वहां सेना भेजना, हथियार और संसाधन जुटाना बहुत महंगा पड़ेगा। हर बार जब हमारी सेना भारत जाती है, हमारे बहुत से लोग मारे जाते हैं। इसलिए अब इस योजना को छोड़ देना चाहिए।”[16]

सच यह है कि भारत की अपार संपत्ति ही इन आक्रमणों की सबसे बड़ी वजह बनी। 1757 की प्लासी की लड़ाई के बाद ब्रिटिशों ने बंगाल की दौलत लूटी, और उसी से उन्हें इतनी ताकत मिली कि वे पूरे भारत को अपने अधीन कर सके। बार-बार विदेशी हमलावरों को मौका देना दरअसल भारतीय शासकों की सबसे बड़ी भूल थी — उन्होंने अपने ही पतन का रास्ता खुद खोल दिया।

धर्म युद्ध का दर्शन भले ही ऊँचे आदर्शों पर टिका था, लेकिन मुस्लिम और ईसाई आक्रमणकारियों से हुए सभ्यतागत संघर्षों के लिए यह नीति बिल्कुल अप्रभावी साबित हुई। कलियुग की कठोर वास्तविकताओं में धर्म युद्ध का आदर्श एक कमजोरी बन गया।

ऑपरेशन सिंदूर: एक अहम मोड़

ऑपरेशन सिंदूर महज़ एक सैन्य कार्रवाई नहीं था — यह भारत की युद्ध नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ का संकेत था। पहली बार भारत ने केवल हमले रोकने की नीति से आगे बढ़कर यह साफ़ कर दिया कि अब वह दुश्मन की सरहद पार करके भी निर्णायक कार्रवाई कर सकता है।

हालाँकि इस ऑपरेशन की आधिकारिक जानकारी गोपनीय रखी गई, लेकिन यह माना जा रहा है कि इसमें दुश्मन की सीमा के भीतर घुसकर आतंकी ठिकानों, लॉजिस्टिक हब और कमांड सेंटर्स को निशाना बनाया गया। यह 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक या 2019 के बालाकोट हवाई हमले जैसा सीमित अभियान नहीं था — बल्कि एक पूरी तरह योजनाबद्ध, गहराई से सोची गई और रणनीतिक रूप से व्यापक कार्रवाई थी।

ऑपरेशन सिंदूर में उन ठिकानों को निशाना बनाया गया जो सेना के साथ-साथ आम नागरिकों के भी इस्तेमाल में आते थे। उच्च-स्तरीय लक्ष्यों को सटीक तरीके से खत्म किया गया, और दुश्मन को न फिर से संगठित होने का मौका मिला, न ही जवाब देने की कोई गुंजाइश छोड़ी गई। यह केवल एक “संदेश देने” वाली कार्रवाई नहीं थी — इसका असली उद्देश्य आतंक के सिलसिले को जड़ से तोड़ना था।

अर्बन वॉरफेयर इंस्टीट्यूट के निदेशक जॉन स्पेंसर के अनुसार, 7 मई को पाकिस्तान के बहावलपुर और मुरिदके जैसे बड़े आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर नौ हमले किए गए; पाकिस्तान के 11 वायुसेना ठिकानों और किरणा हिल्स के परमाणु हथियार केंद्र को नुकसान पहुँचाया गया।  जो ‘फायरिंग में ठहराव’ देखा गया, वह कोई संयोग नहीं था — यह ऑपरेशन की रणनीतिक सफलता का परिणाम था, जिसने दुश्मन को पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया। इन घटनाओं ने भारत की आतंकवाद के खिलाफ नीति में बदलाव कर दिया: अब अगर पाकिस्तान से कोई आतंकी हमला हुआ, तो भारत उसका जवाब सीधी फौजी कार्रवाई से देगा। इस ऑपरेशन से भारत ने न केवल अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि अपनी रणनीतिक आज़ादी और डर पैदा करने की क्षमता भी फिर से साबित की।[17]

‘सिंदूर’ नाम का चयन भी बहुत मायने रखता है। यह वह लाल निशान है जो हिंदू विवाहित स्त्रियाँ अपनी माँग में लगाती हैं — जो परंपरा, निष्ठा और सांस्कृतिक गर्व का प्रतीक है। इस नजरिए से यह ऑपरेशन एक ऐसे समाज की पहचान बन गया है जो अब अपनी शक्ति से डरता नहीं, और जो अब पुराने ‘संयम के आदर्शों’ की बेड़ियों में खुद को नहीं बाँधना चाहता।

इस तरह ऑपरेशन सिंदूर भारत की उस पुरानी झिझक और संकोच वाली सोच से एक निर्णायक अलगाव का प्रतीक बन गया है।

नई हिंदू युद्ध नीति की झलक

ऑपरेशन सिंदूर से जो नजरिया सामने आया है, वह एक नई सोच की ओर इशारा करता है — जिसमें हिंदू संस्कृति की नैतिक समझ को आधुनिक रणनीति के साथ जोड़ा गया है। इसमें धर्म को छोड़ा नहीं गया, बल्कि उसे वर्तमान हालात में नए तरीके से अपनाया गया है।

  1. जीत सिर्फ बातचीत या समझौते तक सीमित नहीं होनी चाहिए; उसे आखिरी और निर्णायक होना चाहिए। जैसे रोमनों ने कार्थेज को पूरी तरह खत्म कर दिया था, वैसे ही भारत को भी यह तय करना चाहिए कि दुश्मन दोबारा सिर न उठा सके।
  2. जो लोग आपको मिटाने की सोच रहे हैं, उन्हें समय रहते खत्म करना ज़रूरी है। केवल  अपनी सीमा में रहकर ही लड़ने कि नीति एक खतरनाक भ्रम है जो केवल दुश्मनों को फायदा देता है।
  3. अगर दुश्मन के हमले की आशंका है तो पहले हमला करना भी आत्मरक्षा ही है। देश की सुरक्षा सिर्फ प्रतिक्रिया से नहीं चलती, उसे पहले से सोचकर योजना बनानी होती है।
  4. कुछ दुश्मन ऐसे होते हैं, जिनको जीत कर भी क्षमा कर देना कोई दया नहीं, बल्कि आत्मघात है।
  5. जब तक कोई देश अपने सैन्य अभियानों की कहानी खुद नहीं कहता, उसकी जीत अधूरी रहती है। भारत को अब अपनी लड़ाइयों की कथा खुद लिखनी होगी — मीडिया और विश्वविद्यालयों के भरोसे नहीं रहा जा सकता।
योद्धा भावना की पुनर्प्रतिष्ठा

प्राचीन भारत में सैन्य भावना जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। वहाँ एक सुव्यवस्थित प्रणाली थी जो भविष्य के सेनापतियों और रणनीतिक सोच रखने वाले योद्धाओं को तैयार करती थी। कौशिक रॉय अपनी किताब Warfare in Pre-British India में लिखते हैं कि मौर्य साम्राज्य से पहले तक्षशिला में एक सैन्य विद्यालय था जहाँ बच्चे आठ साल की उम्र में भर्ती होते और सोलह की उम्र में स्नातक बनते। हर साल वहाँ 500 से ज़्यादा छात्र, जिनमें करीब 100 राजकुमार होते थे, दाखिला लेते थे। स्नातक होते समय उन्हें एक तलवार, धनुष-बाण, कवच और एक हीरा उपहार में दिया जाता था।[18]

भारत को यह सोच फिर से अपनानी चाहिए। भारत में अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण शुरू किया जाना चाहिए, और सैनिक संस्कृति को राष्ट्र की एक गरिमामयी नींव के रूप में फिर से स्थापित किया जाना चाहिए। सेना को केवल एक सरकारी मशीनरी नहीं, बल्कि नीति निर्माण में एक सक्रिय और सम्मानित भागीदार के रूप में देखा जाना चाहिए।

वर्तमान समय में इसमें कुछ बदलाव दिखा है। पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक और लद्दाख में चीन से झड़प जैसी कार्रवाइयाँ सीधे ज़मीन पर मौजूद कमांडरों ने संभालीं — दिल्ली के नेताओं ने हर चीज़ पर कड़ी निगरानी नहीं रखी। ऐसे फैसलों में सेना को आज़ादी देना किसी भी रणनीति की सफलता के लिए बहुत जरूरी होता है।

एक सभ्यता ने अपना अधूरा अध्याय पूरा किया

‘ऑपरेशन सिंदूर’ सिर्फ एक नाम नहीं है — यह एक गहरे प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है। सिंध, जो आज पाकिस्तान में है, वहीं से 1,314 साल पहले अरब हमलावरों ने भारत की पहली बड़ी सभ्यतागत हार दी थी। आज जब भारत ने उसी क्षेत्र में जाकर दुश्मन के ठिकानों को खत्म किया है, तो यह सिर्फ एक जवाबी हमला नहीं, बल्कि इतिहास की स्मृति की रक्षा का भी अधिकार है।

भारत को अपनी आध्यात्मिक परंपरा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन यह भी समझना चाहिए कि धर्म अगर सजा नहीं दे सकता, तो वह सिर्फ कमजोरी बनकर रह जाता है। ऑपरेशन सिंदूर इस सच्चाई का आज के समय में पहला सजीव रूप है। यह दिखाता है कि अब भारत अधूरे युद्ध नहीं लड़ेगा। अब भारत की युद्ध नीति केवल चुपचाप सहने वाली नहीं, बल्कि कर्म और निर्णायक कार्यवाही पर आधारित होगी। अब तिरुवल्लुवर के कथन को अपनाया जाएगा कि “अधूरे प्रयास और अधूरे छोड़े गए दुश्मन, बुझी नहीं हुई आग की तरह सब कुछ नष्ट कर सकते हैं।” यानि कि अब अधर्म को केवल रोका नहीं जाएगा, उसे पूरी तरह मिटाया जाएगा।

यह भारत न तो बेपरवाह है और न ही भावनाओं में बहकर काम करने वाला। यह भारत अब किसी भ्रम में नहीं जीता — बल्कि पूरी स्पष्टता और सोच-समझ के साथ कदम उठाता है। वह जानता है कि रोक तभी असर करता है, जब उसमें दृढ़ता और विश्वसनीयता हो। भारत अगर आज वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तो वह अपने मूल्यों को त्यागकर नहीं, बल्कि उन्हें समय के अनुसार ढालकर ही करेगा।

भारत की सभ्यता तब तक सुरक्षित नहीं रह सकती जब तक वह यह न मान ले कि संयम एक गुण है, जो केवल उन्हीं के लिए जो दया के योग्य हैं — शत्रुओं के लिए नहीं।

संदर्भ सूची 

[1] A vow to avenge 1971 (Frontline, 2003); (https://frontline.thehindu.com/the-nation/article30216857.ece

[2] Weapons and War in Vedas (Wisdom Library, 2016); https://www.wisdomlib.org/hinduism/essay/nitiprakasika-critical-analysis/d/doc1147768.html

[3] Verse 761, Tirukular, 3rd century CE, https://tamilnation.org/literature/kural/nagalinkam.pdf

[4] The Art of War in Ancient India, (Rare Book Society – Archives, 1941); https://rarebooksocietyofindia.org/book_archive/6141.pdf

[5] Bhagavad Gita Weekly – Chapter 2 – Sankhya Yoga – A Warrior Must Fight – Verses 31 to 38, Part 12; https://trueindology.com/bhagavad-gita-weekly-chapter-2-sankhya-yoga-a-warrior-must-fight-verses-31-to-38-part-12/#google_vignette

[6] Ibid

[7] The Paradox of the Buddhist Soldier (Taylor & Francis Online, 2021); https://www.tandfonline.com/doi/pdf/10.1080/14639947.2021.2145683

[8] Tirukural on War, Defense and Foreign Affairs (Tamilnation, 2008);  https://tamilnation.org/literature/kural/nagalinkam.pdf

[9] The Sindh Story – A Great Account of Sindh (Online archive, 1984); https://sanipanhwar.com/uploads/books/2024-08-29_13-05-56_9415e8449215959d01f22c94a43e6758.pdf

[10] Battle of Tarain: When Ghori fled and Prithviraj Chauhan gave the chase (The Times of India, 2021); https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/voices/battle-of-tarain-when-ghori-fled-and-prithviraj-chauhan-gave-the-chase/

[11] The Unfinished Business of the 1971 War and Its Impact on Bangladesh Hindus

(Stop Hindudvesha, 2025); https://stophindudvesha.org/the-unfinished-business-of-the-1971-war-and-its-impact-on-bangladesh-hindus/

[12] The difference between Dharma Yuddha and Jihad (India Facts, 2013); https://www.indiafacts.org.in/the-difference-between-dharma-yuddha-and-jihad/

[13] The Concept in Hinduism of ‘Just War’ (Research Gate, 2003);  https://www.researchgate.net/publication/31478127_The_Concept_in_Hinduism_of_’Just_War

[14] Ibid

[15] Hinduism and the Ethics of Warfare in South Asia: From Antiquity to the Present (Journal of Defence Studies, Vol. 7, No. 4, 2013);  https://idsa.in/system/files/jds_7_4_JeanLanglois.pdf

[16] The Sindh Story – A Great Account of Sindh (Online archive, 1984); https://sanipanhwar.com/uploads/books/2024-08-29_13-05-56_9415e8449215959d01f22c94a43e6758.pdf

[17] Operation Sindoor: A Decisive Victory in Modern Warfare (John Spencer on X, 2025); https://x.com/SpencerGuard/article/1922492011526996012

[18] Warfare in Pre-British India 1500 BCE to 17 40 CE (Taylor and Francis Group – Online Archives, 2015); https://apnaorg.com/books/english/warfare-in-pre-british-india/warfare-in-pre-british-india.pdf

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
See All Contributions

Donate to HINDUDVESHA

Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.

SUPPORT US