जिहाद के आवाहन का जवाब धर्मनिरपेक्षता के नारों से: आत्मघाती चुप्पी में डूबा हुआ हिंदू समाज
- AQIS ने एक घोषणापत्र जारी किया, जिसमें भारत के आतंकवाद-विरोधी हवाई हमलों को “भगवा शासन” द्वारा शुरू किया गया धार्मिक युद्ध बताया गया, और साफ़ तौर पर जिहाद फी सबीलिल्लाह (अल्लाह के रास्ते में पवित्र युद्ध) का आह्वान किया गया।
- AQIS ने झूठे अत्याचारों की कहानियाँ गढ़कर भारत को एक हिंदू अत्याचारी के रूप में पेश किया, ताकि दुनियाभर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काया जा सके।
- इस खुले जिहादी आह्वान के बावजूद, हिंदू समाज की प्रतिक्रिया उदासीनता, भ्रम और “असहिष्णु” कहे जाने के डर से भरी रही—जो आत्म-सुरक्षा की स्वाभाविक भावना के बजाय मानसिक और सांस्कृतिक कमजोरी को दिखाता है।
- वैचारिक ख़तरों को न पहचान पाने और उनका सामना न कर पाने की यह स्थिति दशकों से चल रहे एक बड़े वैचारिक निष्क्रियता का नतीजा है, जिसके कारण हिंदू समाज कि शत्रुबोध की भावना खो गई है।
- इससे पहले कि यह संकट ऐसा रूप ले ले जिससे लौटना नामुमकिन हो जाए, हिंदुओं को शत्रुबोध को फिर से जगाना होगा जिससे धर्म की रक्षा समझदारी और वैचारिक मजबूती के साथ की जा सके ।
भारत ने पाकिस्तान में मौजूद नौ आतंकी ठिकानों पर 7 मई 2025 को हवाई हमले किए। ठीक अगले दिन ‘अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट’ (AQIS) ने एक सीधी और साफ़ चेतावनी जारी की।[1] यह कोई आम प्रेस नोट नहीं था, बल्कि एक सोच-समझकर तैयार किया गया घोषणापत्र था, एक तरह की युद्ध की घोषणा, जो कट्टरपंथी इस्लामी सोच और हिंदू सभ्यता के प्रति गहरी दुश्मनी से भरा हुआ था।[2]
इस घोषणापत्र में AQIS ने भारत के इन हमलों को “भगवा शासन” द्वारा मुसलमानों पर किया गया हमला बताया।[3] यह शब्द जानबूझकर उकसाने के लिए चुना गया था, ताकि हिंदू पहचान से जुड़ी किसी भी राजनीतिक सोच को निशाना बनाया जा सके। “भगवा” शब्द, जो सनातन धर्म के केसरिया झंडे का प्रतीक है, यहाँ किसी संयोग से नहीं, बल्कि सोच-समझकर इस्तेमाल किया गया था। इसका मकसद भारत को एक लोकतांत्रिक देश नहीं, बल्कि एक धर्म के आधार पर ज़ुल्म करने वाला देश दिखाना था। इस तरह की भाषा ने एक आतंकवाद के ख़िलाफ़ की गई सैन्य कार्रवाई को धार्मिक संघर्ष का रूप दे दिया।
लेकिन इस बयान का सबसे खतरनाक हिस्सा सिर्फ़ राजनीतिक आरोप नहीं था, बल्कि एक सीधा धार्मिक युद्ध का खुला आह्वान था—जिहाद फी सबीलिल्लाह, यानी “अल्लाह के रास्ते में पवित्र युद्ध”। यह कोई घुमा-फिराकर कही गई बात नहीं थी, बल्कि एक साफ़ आदेश था कि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी मुसलमान भारत के खिलाफ खड़े हों और तब तक लड़ें जब तक इस्लाम की हुकूमत कायम न हो जाए।[4] यह जिहादी सोच की मुख्य धारा है जो अब सीधे भारत को निशाना बना रही है।
लेकिन इस साफ़ और खुली युद्ध घोषणा के जवाब में हिंदू समाज की प्रतिक्रिया थी केवल एक श्मशान जैसी चुप्पी। न तो समाज में कहीं देशहित की जागरूकता दिखी, न किसी जिम्मेदार नेता ने इसकी चर्चा की, और न ही बौद्धिक या सांस्कृतिक स्तर पर कोई प्रतिक्रिया सामने आई। इसके बजाय, लोग अपनी रोज़मर्रा की दुनिया में उलझे रहे—सेलिब्रिटी की गपशप, क्रिकेट के विवाद और सोशल मीडिया की फालतू बहसें। जहाँ आक्रोश की लहर उठनी चाहिए थी, वहाँ सिर्फ लापरवाह बेफिक्री थी।
हिंदू समाज का यह रवैया न तो नया है और न ही कोई संयोग। यह एक गहरे और फैले हुए रोग का लक्षण है, जो हमारी सभ्यता, सोच और आत्मा में पूरी तरह से घर कर चुका है।
हिंदू समाज की प्रतिक्रिया—या सही कहें तो उसकी पूरी चुप्पी—एक गंभीर कमजोरी को दिखाती है। इस का अर्थ है शत्रुबोध का सम्पूर्ण अभाव, यानी दुश्मन को पहचानने की समझ का लगभग पूरी तरह से खत्म हो जाना।
AQIS की हिंदू संस्कृति के विरुद्ध युद्ध घोषणा
6 मई 2025 को भारत ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी अड्डों पर हवाई हमले किए। ये हमले हाल ही में हुए आतंकी हमलों के जवाब में थे, जिनमें 26 लोगों को उनके परिवारों के सामने केवल इस लिए मार गया कि वे हिंदू थे। भारत ने जिन ठिकानों को निशाना बनाया, वे लंबे समय से भारत के खिलाफ जिहादी गतिविधियों के केंद्र माने जाते थे। यह कार्रवाई पूरी तरह अपने नागरिकों की रक्षा के अधिकार के तहत की गई थी, जो किसी भी स्वतंत्र देश का अधिकार है।
लेकिन AQIS ने इस कार्रवाई को तुरंत एक धार्मिक युद्ध के रूप में दिखाना शुरू कर दिया। अपनी मीडिया शाखा अल-सहाब के ज़रिए AQIS ने भारत की इस आत्मरक्षा को आतंकवाद के खिलाफ एक “भगवा शासन” द्वारा मुसलमानों पर किया गया हमला बताया। “भगवा शासन” जैसा शब्द जानबूझकर भड़काने के लिए चुना गया था, ताकि हिंदू राजनीतिक पहचान को अत्याचारी और तानाशाह के रूप में दिखाया जा सके। यानि कि AQIS ने हिंदू जागरूकता को तानाशाही बताया और भारत को एक सांप्रदायिक और धर्म के नाम पर अत्याचार करने वाला देश बताया। यह एक सोची-समझी रणनीति थी जिससे इस हमले को धार्मिक रंग देकर, जिहाद को जायज़ ठहराया जा सके।
AQIS ने यह भी आरोप लगाया कि भारतीय वायुसेना ने मस्जिदों और मुस्लिम इलाकों को निशाना बनाया, जो बिलकुल मनगढ़ंत कहानी थी। इनका मकसद केवल दुनिया के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने था। इस तरह की झूठी कहानियाँ गढ़ना जिहादी संगठनों की पुरानी चाल है ताकि वे दूसरों को दोषी करार दे सकें।
AQIS ने अपने बयान में जिहाद फी सबीलिल्लाह—यानी “अल्लाह के रास्ते में पवित्र युद्ध”— का खुला आह्वान किया, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों से गुहार लगाई कि वे हथियार उठाएं और तब तक लड़ें जब तक “इस्लामी शासन” स्थापित न हो जाए। यह एक सभ्यतागत योजना है, जिसका मकसद केवल हिंदू धर्म और संस्कृति की जड़ से मिटाना है। AQIS का यह बयान कोई अचानक गुस्से में नहीं दिया गया था, बल्कि जिहादी विचारधारा की एक योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा था, जिसका मकसद मुसलमानों को उग्रवाद की ओर खींचना होता है।[5]
ये धार्मिक वर्चस्व और वैचारिक युद्ध की खुली घोषणाएँ हैं— हिंदू सभ्यता को पूरी तरह से खत्म करने की योजनाएँ। हिंदू समाज को इनका असली रूप पहचानना होगा। इन्हें नज़रअंदाज़ करना केवल भोलेपन की बात नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को ख़तरे में डालने जैसा है। AQIS एक बड़े अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क का हिस्सा है, जो मीडिया के ज़रिए इस्लामी कट्टरपन और जिहादी विचारधारा फैलाने में माहिर है। इसका मकसद भारत के मुस्लिम समाज के बीच अस्थिरता फैलाना है।[6]
हिंदू समाज की प्रतिक्रिया – शून्य
इतने खुले और साफ़ धमकी के बावजूद, हिंदू समाज की प्रतिक्रिया केवल एक डरावनी, श्मशान जैसी चुप्पी थी। AQIS ने न सिर्फ़ भारत की राजनीति या सेना को, बल्कि पूरी हिंदू सभ्यता को युद्ध के लिए ललकारा, परंतु हिंदू समाज की ओर से कहीं कोई जागरूकता, कोई आक्रोश, कोई सुरक्षात्मक प्रवृत्ति तक नहीं दिखी। न कोई गंभीर चर्चा हुई, न ही मुख्यधारा मीडिया ने इस वैचारिक खतरे को समझने की कोशिश की, न किसी सामाजिक संगठन ने कोई ठोस पहल की, और न ही किसी धार्मिक संस्था ने कोई जागरूकता अभियान शुरू किया। हमारे खुद को “विचारक” कहने वाले लोग वेब सीरीज़ पर ट्वीट करते रहे, “टॉक्सिक मर्दानगी” पर बहस करते रहे, और पुराने सेक्युलर जुमलों को दोहराते रहे। जो लोग संस्कृति पर बड़े बड़े लेख लिखते हैं, वे क्रिकेट और फ़िल्मी गपशप में लगे रहे—या तो उन्हें सामने खड़ी वैचारिक युद्ध का आभास नहीं था, या उन्होंने जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह कोई जीवित समाज नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता शव हो, जिसके दिल में न धड़कन शेष है, न आंखों में ज्योति, और न ही आत्मा में कोई ज्वाला। यह एक संपूर्ण सभ्यता की आत्मा के मृतप्राय होने की उद्घोषणा थी।[7]
सबसे चिंताजनक बात यह थी कि जो लोग खतरे के बारे में चेतावनी देना चाहते थे, उन्हें चुप कर दिया गया। जो लोग सजग रहने और तैयारी की बात कर रहे थे, उन्हें कुछ इस तरह के जुमलों से चुप करा दिया गया: “सभी मुसलमान ऐसे नहीं होते,” “सांप्रदायिक बात मत करो,” “ये सब थोड़े दिन में शांत हो जाएगा”, “तुम नफ़रत फैला रहे हो,” “हर किसी को एक जैसा मत समझो,” “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।”
ऐसी विकृत सोच से साफ पता चलता है कि समाज की आत्म-सुरक्षा की स्वाभाविक शक्ति मर चुकी है। जिस समाज ने कभी महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे योद्धा दिए, वह अब “असहिष्णु” कहलाने के डर से चुप है। यह गहराई से आत्मसात की गई एक ऐसी लाचारगी और मानसिक गुलामी, जहाँ कभी वीरता और आत्मगौरव के प्रतीक रहे लोग अब अपने ही पतन को मूकदर्शक बनकर देखते हैं। हिंदू समाज आँखों से ख़तरे को देख रहा है, पर न उसमें उसे पहचानने की दृष्टि बची है, न उसका प्रतिकार करने का बौद्धिक साहस।
ये वही सोच है जिसके कारण जब जिहादी संगठन हथियार, रणनीति और घोषणापत्र तैयार कर रहे होते हैं, तब हिंदू समाज आईपीएल की प्लेइंग इलेवन सेट कर रहा होता है। जब दुश्मन वैचारिक जीत के लिए तैयारी में लगे होते हैं, तब हम बॉक्स ऑफिस के आंकड़े देख कर राष्ट्रगौरव महसूस करते हैं। और जब हमारे सामने सभ्यतागत युद्ध अपने पूरे उभार पर होता है, तब हम ‘निष्पक्षता’ और ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ के घिसे-पिटे मन्त्रों से अपने विवेक को सुला देते हैं। यह सहिष्णुता नहीं, बेहयाई में लिपटा हुआ आत्मसमर्पण है।
शत्रुबोध की समझ खो चुका हिंदू समाज
शत्रुबोध धर्म से जुड़ा एक अनिवार्य विचार है, जो ‘शत्रु’ यानी दुश्मन और ‘बोध’ यानी जागरूकता या समझ से मिलकर बना है। इसका अर्थ है ऐसी सोच और सतर्कता, जो हमें उन व्यक्तियों या शक्तियों की पहचान करने में सक्षम बनाए जो हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बन सकते हैं। धर्म के दृष्टिकोण से शत्रु बोध कोई वैकल्पिक भावना नहीं, बल्कि जीवित रहने और आगे बढ़ने की अनिवार्य प्रतिक्रिया है। यह केवल देश की सीमाओं की रक्षा की बात नहीं करता, बल्कि हमारी संस्कृति, विचार और आत्मा की रक्षा का भी मूल आधार है।[8]
हमारे पूर्वज इस बोध को बहुत अच्छे से समझते थे। महाभारत सिर्फ़ किसी परिवार का झगड़ा नहीं था, बल्कि एक बड़ा सभ्यतागत संघर्ष था, जहाँ अधर्म के खिलाफ़ साफ़ सोच और सही कार्रवाई सबसे ज़रूरी थी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सिखाया कि बुराई को ठीक से पहचानो और बिना किसी झिझक के उसका सामना करो।
लेकिन आज यह बोध लगभग नष्ट हो चुका है, और यह कोई अचानक नहीं हुआ है। यह दशकों से चल रही वैचारिक उदासीनता एक सुयोजित माहौल का नतीजा है। इस उदासीनता के तीन बड़े स्रोत हैं: नेहरूवादी सेक्युलरिज़्म, मार्क्सवादी इतिहास, और बॉलीवुड।
नेहरूवादी सेक्युलरिज़्म के चलते हिंदुओं को उनकी खुद की सभ्यतागत पहचान से दूर कर दिया गया। उन्हें सिखाया गया कि वे एक अंधविश्वासी और पिछड़ी सोच के लोग हैं। इस सोच ने पीड़क और पीड़ित दोनों को एक जैसा दिखाने की कोशिश की, और इतिहास की कड़वी सच्चाइयों को याद करना एक गुनाह जैसा बना दिया।
मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इस विचारधारा को और आगे बढ़ाया। उन्होंने बाहरी आक्रमणों को, मंदिरों के तोड़े जाने, ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन और हत्याओं की सच्चाइयों को या तो दबा दिया या उन्हें “संस्कृति का आदान-प्रदान” कहकर समाज को बेवकूफ बना दिया। उन्होंने बाहरी हमलावरों को सभ्य और दयालु बताया, और जो लोग अपनी संस्कृति की रक्षा कर रहे थे, उन्हें दोषी या अयोग्य करार दे दिया।
इस मानसिक ज़हर को पूरी तरह फैलाने में बॉलीवुड ने निर्णायक भूमिका निभाई। फिल्मों में हिंदुओं को या तो खलनायक या मज़ाक का पात्र दिखाया गया, और इस्लामी हमलावरों को बहादुर और रोमांटिक नायक बनाकर दिखाया गया। उन्होंने कला को एक हथियार बना कर हिंदू समाज की मानसिक ताक़त को लगभग नष्ट कर दिया। इसका असर बेहद विनाशकारी साबित हुआ, जैसे कि,
- असल ख़तरों को नज़रअंदाज़ या बिल्कुल खारिज करना,
- दुश्मन को नायक समझना और रक्षक को बदनाम करना,
- वैचारिक युद्ध का जवाब खोखले सेक्युलर नारों से देना,
- धर्मांतरण जैसे संगठित प्रयासों को “स्वतंत्र पसंद” बताना,
- शत्रु बोध की माँग को “उग्रता” कहकर नकार दिया जाना।
हिंदू समाज में शत्रु बोध की कमी वास्तव में एक बहुत बड़ी कमजोरी है। जिस समाज को इतनी सी समझ नहीं कि उसका मित्र कौन है और दुश्मन कौन, धर्म क्या है और अधर्म क्या, तो समझिए कि वो समाज विनाश की कगार पर है।
शत्रु संगठित हैं, हिंदू समाज बिखरा हुआ
यह लड़ाई सिर्फ़ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सभ्यतागत संघर्ष है। AQIS और उससे जुड़े जिहादी संगठन कोई नई या अस्पष्ट ताक़तें नहीं हैं—ये उस मज़हबी विचारधारा का हिस्सा हैं जो हजार वर्षों से हिंदू धर्म और भारत की सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का प्रयास कर रही है। उनके इरादे छुपे नहीं हैं—वे फतवे जारी करते हैं, खुले मंचों पर घोषणाएँ करते हैं, और साफ़ कहते हैं कि ‘काफ़िरों’ का इस धरती पर कोई हक़ नहीं।
इसके विपरीत, हिंदू समाज भयावह चुप्पी और आत्ममुग्धता में डूबा है। न कोई चेतना है, न तैयारी, न ग़ुस्सा। आज भी वही थके हुए जुमले दोहराए जाते हैं: “सांप्रदायिक सौहार्द ज़रूरी है”, “हर धर्म में बुरे लोग होते हैं”, “अगर हम प्रतिक्रिया देंगे, तो हम भी वैसे ही बन जाएंगे।” यह सब ऐसे लगता है मानो युद्ध के मैदान में कोई सैनिक फूलों से हमला करने निकला हो।
इतिहास की स्पष्ट चेतावनियों, बार-बार उजागर हुए इरादों, और खुले सबूतों के बावजूद, समाज अब भी रेत में सिर छिपाए बैठा है—शुतुरमुर्ग की तरह, जो सोचता है कि तूफ़ान बिना उसे छुए निकल जाएगा। यह कोई उदारता नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण है। जो डर “असहिष्णु” कहे जाने के डर से शुरू होता है, वह अंततः आत्मरक्षा से भी इनकार करवा देता है।
सभ्यताएँ जब अपनी रक्षा करना भूल जाती हैं, तो वे इतिहास से मिटा दी जाती हैं। इतिहास कायरों को नहीं बख़्शता—वह उन्हें कुचल देता है।
एक आह्वान: शत्रुबोध का पुनर्जागरण
यह मान लेना कि जिहादी ताक़तें कोई रहस्यमयी या अदृश्य खतरा हैं—एक खतरनाक भ्रम है। उनके नाम, संगठन, विचारधाराएँ और लक्ष्य सब कुछ खुले हैं। वे अपने इरादे छिपाते नहीं, मंचों से घोषणा करते हैं कि ‘काफ़िरों’ का इस धरती पर कोई हक़ नहीं। केवल उनके निशाने पर खड़ा हिंदू समाज ही आँखें मूँदे बैठा है।
इतिहास बताता है—हर बार समाज तब जागा जब बहुत देर हो चुकी थी। यह सिर्फ़ लापरवाही नहीं, धर्म से विश्वासघात है। धर्म चुप्पी, भ्रम या कायरता नहीं सिखाता। धर्म का सार है—साहस, स्पष्टता और शत्रुबोध। चुप्पी रक्षा नहीं देती: शुतुरमुर्ग कितना भी रेत में सर छिपाए, आँधी से बचता नहीं है, बल्कि उस में दफ़न हो जाता है।
ख़तरे को पहचानना नफ़रत नहीं, सतर्कता है। तैयारी करना युद्ध नहीं, आत्मरक्षा है। और सच बोलना सांप्रदायिकता नहीं, कर्तव्य है।
अगर हिंदू समाज अब भी बहानों और तर्कों से अपनी चुप्पी को सही ठहराता रहा, तो जल्द वह उस मोड़ पर होगा जहाँ कुछ भी बचाने लायक नहीं रहेगा। और इतिहास हिंदू समाज के लिए आँसू नहीं बहाएगा—क्योंकि यह पतन किसी और ने नहीं, स्वयं हिंदुओं ने अपनी जड़ता मूर्खता से अर्जित किया होगा।
निष्कर्ष
अब समय बर्बाद करने का नहीं, चेतने का है। शत्रु बोध, यानी अपने अस्तित्व के दुश्मनों को पहचानने की जो पुरानी धर्मसिद्ध समझ है, कोई नफ़रत या संकीर्णता नहीं, बल्कि सजगता, स्पष्टता और साहस का आह्वान है। यह धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए निर्णायक संकल्प की माँग करता है।
धर्म की रक्षा तब ही संभव है जब यह पहचाना जाए कि धर्म को ख़तरा कहाँ से है। इसके लिए उस लंबे इनकार, लापरवाही और भ्रम से बाहर आना होगा जो हिंदू मानस पर थोप दिया गया है। हमें धर्म को केवल पूजा और कहानियों तक सीमित नहीं रखना, बल्कि उसे वैचारिक शक्ति और आत्मरक्षा की दृष्टि से फिर से समझना होगा।
इसका सीधा एक रास्ता है—शैक्षिक संस्थानों, मीडिया और कला में फैले झूठे विमर्शों को चुनौती देना। मार्क्सवादी विकृति, नेहरूवादी विस्मृति, और बॉलीवुड की झूठी लोरी, जिन्होंने हिंदू चेतना को जड़ और निष्क्रिय बना दिया है, इन सब को अब खारिज करना होगा। हमें उन आवाज़ों का साथ देना होगा जो डटकर, निर्भीक होकर हिंदू सभ्यता के पक्ष में बोलते हैं—शिक्षक हों, लेखक हों, कलाकार हों या नेता। यही हमारी वैचारिक रक्षा की पहली पंक्ति हैं।
अगर अब भी हिंदू समाज सोता रहा, तो न कोई सेना, न कोई हथियार, न कोई वीर उसे बचा पाएगा। हथियार युद्ध जीतते हैं, पर अस्तित्व की लड़ाई केवल एक जागरूक, एकजुट संस्कृति ही लड़ सकती है।
शत्रु बोध कोई पुरानी अवधारणा नहीं—यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और कर्तव्य भी। इसे पुनः अपनाना होगा, इससे पहले कि कुछ अपनाने को शेष न बचे।
संदर्भ सूची
[1] Al-Qaeda In The Indian Subcontinent (AQIS) Declares Jihad Against India Is A Must Following Airstrikes in Pakistan; https://www.memri.org/jttm/al-qaeda-indian-subcontinent-aqis-declares-jihad-against-india-must-following-airstrikes
[2] Rohan Gunaratna; Inside Al Qaeda: Global Network of Terror; Columbia University Press, 2002; https://cup.columbia.edu/book/inside-al-qaeda/9780231126922/
[3] Peter L. Bergen; The Osama bin Laden I Know: An Oral History of al Qaeda’s Leader; Free Press; 2006; https://www.foreignaffairs.com/reviews/capsule-review/2006-03-01/osama-bin-laden-i-know-oral-history-al-qaedas-leader
[4] Rudolph Peters; Jihad in Classical and Modern Islam; Markus Wiener Publishers; 1996.
[5] Gilles Kepel; The War for Muslim Minds: Islam and the West; Belknap Press; 2004.
[6] Arun Shourie; The World of Fatwas: Or the Shariah in Action; ASA Publications; 1995.
[7] Sita Ram Goel; Hindu Society under Siege; Voice of India; 1981.
[8] Ram Swarup; Understanding Islam through Hadis; Voice of India; 1982.
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