पाकिस्तान का टुकड़ीकरण: भारत के लिए राहत या चिंता का विषय?
- जातीय टकराव, आर्थिक बदहाली और अलगाववादी आंदोलनों (खासतौर पर बलूचिस्तान में) ने एक बार फिर यह संभावना मजबूत की है कि पाकिस्तान कई हिस्सों में टूट सकता है।
- परंतु अगर पाकिस्तान टूट भी जाता है तो भी पंजाब के वर्चस्व वाला जो हिस्सा बचेगा, वह अपनी पुरानी हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी सोच छोड़ने वाला नहीं है, क्योंकि यह विचार सेना, सरकारी संस्थानों और शिक्षा व्यवस्था में गहराई से पैठा हुआ है।
- पाकिस्तान की सेना, जो भारत के खिलाफ उसकी नीतियों की रीढ़ की हड्डी है, टूटने के बाद भी खतरा बनी रहेगी। वह छद्म युद्धों को जारी रखेगी और उसके पास अब भी बड़ा परमाणु ज़खीरा होगा, जिससे भारत के लिए खतरा बना रहेगा।
- पाकिस्तान के बंटने से भारत को सीमा विवादों और संसाधनों के दबाव में राहत मिल सकती है, लेकिन इसके साथ-साथ अराजकता, बिखरे हुए परमाणु हथियारों और ज़्यादा कट्टर सोच वाले छोटे पाकिस्तान जैसे खतरे भी पैदा हो सकते हैं।
- ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की आतंकवाद के प्रति सख्त नीति ने पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों को काफी हद तक सीमित किया है, लेकिन असली शांति तभी संभव है जब पाकिस्तान की शत्रुता को जिंदा रखने वाले उसके वैचारिक और सैन्य ढांचे को जड़ से खत्म किया जाए।
पाकिस्तान के कई टुकड़ों में बंट जाने का विचार – जैसे बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और एक छोटा-सा पंजाब – बीते कुछ सालों में देश के अंदरूनी हालात बिगड़ने के चलते और मज़बूत हो गया है। हाल ही में जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर[1] के तहत पाकिस्तान पर हवाई हमले किए, तब संसद, सोशल मीडिया और आम जनता की ओर से ज़ोर-शोर से मांग उठी कि पाकिस्तान को तोड़ा जाए। लोगों को उम्मीद थी कि भारतीय सेना एक बड़ा ज़मीनी हमला करके पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को आज़ाद कराएगी।
अधिकतर भारतीयों को – और कई विदेशी विशेषज्ञों को भी – लगता है कि अब पाकिस्तान का विघटन एकदम करीब है। दरअसल, बांग्लादेश को अलग करने के बाद पहली बार बलूचिस्तान में पूरी तरह सक्रिय गुरिल्ला आंदोलन चल रहा है। जातीय टकराव, आर्थिक गिरावट, राजनीतिक अस्थिरता और अलगाववादी आंदोलनों के तेज़ होने से अब यह कयास लग रहे हैं कि पाकिस्तान कई हिस्सों में टूट सकता है। लेकिन अगर पाकिस्तान सचमुच भौगोलिक रूप से बंट भी जाए, तब भी जो हिस्सा बचा रहेगा, वह एक इस्लामी कट्टर राज्य ही होगा और भारत के लिए खतरा बना रहेगा। वह अपनी हिंदू-विरोधी सोच को छोड़ने वाला नहीं है, क्योंकि यह वैचारिक दुश्मनी पाकिस्तान की सोच, संस्थानों, सेना और समाज के हर स्तर में गहराई से जमी हुई है।
असल समस्या यह है कि पाकिस्तान का बिखरना भारत के लिए कुछ नई मुश्किलें भी ला सकता है – जैसे परमाणु हथियारों का बिखराव, और एक छोटा लेकिन पहले से भी ज़्यादा आक्रामक, इस्लामी और हिंदू-विरोधी पाकिस्तान। इसलिए भारत को अगर इस दिशा में कोई कदम उठाना है, तो उसे पहले पूरी गंभीरता से सोचना होगा। सबसे ज़रूरी बात यह है कि भारत के पास ऐसी किसी स्थिति से निपटने की एक ठोस रणनीति हो – खासकर तब, जब उसे एक अस्थिर और कट्टर सोच वाले पाकिस्तान से दो-चार होना पड़े।
भारत के हमले के बाद पाकिस्तान की स्थिति – अमरीका कि नजर से
9 दिसंबर 1971 को, जब भारतीय सेना ढाका की ओर तेज़ी से बढ़ रही थी और भारतीय नौसेना व वायुसेना लगातार पाकिस्तान पर हमले कर रही थीं, तब अमेरिका को यह साफ समझ में आ गया कि पाकिस्तान की हार तय है। भारत की सैन्य रणनीतियों को ध्यान में रखते हुए, सीआईए (CIA) ने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसका शीर्षक था – ‘भारत की पाकिस्तान पर विजय के परिणाम’।[2] इस रिपोर्ट में भारत के उद्देश्य बताए गए थे, जो सीआईए को भारतीय केंद्रीय मंत्रिमंडल के भीतर मौजूद उनके एक जासूस[3] से मिले थे:
- बांग्लादेश को आज़ाद कराना।
- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत में शामिल करना।
- पाकिस्तान की टैंक और वायुसेना की ताकत को पूरी तरह खत्म करना ताकि वह फिर कभी भारत को चुनौती न दे सके।
सीआईए कि नजर से यह रिपोर्ट, पचास साल पुरानी होने के बावजूद, आज भी उतनी ही अहम है, क्योंकि एक यथार्थपरक स्थिति की झलक देती है कि अगर भारत ने पाकिस्तान के पंजाबी इलाके पर हमला किया और पाकिस्तान बिखरा, तो आगे हालात किस दिशा में जा सकते हैं।
सीआईए का कहना था कि भले ही भारत की सेना जीत के बाद पीछे हट जाती, लेकिन लड़ाई के दौरान पश्चिम पाकिस्तान को गंभीर नुकसान झेलना पड़ता। “सब कुछ इस बात पर निर्भर करता कि सिंधु घाटी की बड़ी जल परियोजनाओं – जैसे टरबेला और मंगला बांध – और कराची के आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों को कितना नुकसान हुआ होता।”
हालांकि, अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता थी पाकिस्तान का राजनीतिक भविष्य। सीआईए ने कहा, “पश्चिम पाकिस्तान पहले से ही क्षेत्रीय दुश्मनी और टकराव से जूझ रहा है। अगर उसे एक बड़ी हार मिलती, तो ऐसी ताकतें उभर सकती थीं जो पश्चिम पाकिस्तान को तीन या चार हिस्सों में बांट देतीं – यानी पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा।”
सिंध के लोग, “जो अक्सर पंजाबी नेतृत्व के खिलाफ रहते हैं, अपनी आज़ादी का ऐलान कर सकते थे।” वहीं अफगानिस्तान के पश्तून खैबर पख्तूनख्वा के हमजातियों से एकजुट होने की कोशिश कर सकते थे। “अगर पाकिस्तान टूटता, तो अफगान शायद इस प्रक्रिया को तेज कर देते और खैबर पख्तूनख्वा को अलग कर उसे अपने संरक्षण में ले लेते।” (सीआईए रिपोर्ट के अनुसार) बलूचिस्तान या तो पंजाब के साथ जुड़ा रह सकता था या अफगानिस्तान या ईरान में मिल सकता था।
जब ये सभी विघटनकारी शक्तियाँ अपना काम कर चुकी होतीं, तो जो हिस्सा बचता, वह “एक छोटा लेकिन असरदार देश” होता। सीआईए का मानना था कि अगर बहुत ज्यादा विनाश न हुआ होता, तो पाकिस्तानी पंजाब आर्थिक रूप से जल्दी उभर सकता था। लेकिन यह बचा हुआ राज्य “कट्टर हिंदू-विरोध और भारत-विरोध की भावना का गढ़ बना रहता,” भले ही वह अब भारत के लिए पहले जैसा खतरा न होता। “उसे अब वह अंतरराष्ट्रीय अहमियत भी नहीं मिलती जो एक संपूर्ण पाकिस्तान को मिलती थी। ज्यादातर देश अब उसे अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित एक दूर, छोटा और असरहीन देश के रूप में ही देखते।”
पाकिस्तान की नफरत की ऐतिहासिक और वैचारिक जड़ें
अगर पाकिस्तान सिमटकर सिर्फ चौथाई क्षेत्रफल का देश बन जाए, तो यह भारत के लिए देखने में जरूर फायदेमंद लगता है। भारत को तब अपने रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा सिर्फ पाकिस्तान के लिए अलग नहीं रखना पड़ेगा। भारत-पाकिस्तान की मौजूदा 3,323 किलोमीटर लंबी सीमा घटकर महज 553 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे घुसपैठ और तस्करी की परेशानियाँ भी काफी कम हो जाएँगी। इसके अलावा, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे अहम इलाकों के अलग हो जाने से पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति और भी कमजोर हो जाएगी।
यह भारत के लिए एक बहुत फायदेमंद स्थिति लगती है, परंतु कुछ शर्तों के साथ। अगर पाकिस्तान एक सामान्य देश होता, तो ये सभी फायदे भारत के लिए किसी बड़ी जीत से कम नहीं होते। लेकिन किस्तान कभी भी एक सामान्य देश नहीं रहा है, और इसी वजह से भारत को हमेशा एक दुश्मन पड़ोसी के साथ जीना सीखना पड़ेगा।
इसे समझने के लिए हमें पाकिस्तान की वैचारिक नींव को फिर से देखना होगा। मोहम्मद अली जिन्ना और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के नेताओं द्वारा बनाए गए दो-राष्ट्र सिद्धांत का तर्क था कि मुस्लिम और हिंदू दो अलग राष्ट्र हैं, जिनके धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मतभेद कभी नहीं सुलझ सकते। इसी सोच के आधार पर 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान को मुसलमानों के लिए एक अलग देश के रूप में बनाया गया।[4]
लेकिन यह सोच सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं थी। यह पहचान बनाने की एक कोशिश थी, जो हिंदुओं और भारत के खिलाफ खड़ी की गई थी। पाकिस्तान के संवैधानिक दस्तावेज़ों, नेताओं के भाषणों और स्कूलों के पाठ्यक्रमों में लंबे समय से मुसलमानों को अलग राष्ट्र और हिंदुओं को अपनी पहचान के लिए हमेशा खतरा के रूप में दिखाया जाता रहा है।
हाल ही में, अप्रैल 2025 में, पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने एक भाषण में फिर वही पुराना ज़हर उगला था। इस्लामाबाद में प्रवासी पाकिस्तानियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा: “आपको अपने बच्चों को पाकिस्तान की कहानी ज़रूर सुनानी चाहिए ताकि वे न भूलें कि हमारे बुज़ुर्गों ने माना था कि हम हिंदुओं से हर पहलू में अलग हैं – हमारा धर्म, हमारी रस्में, परंपराएं, सोच और आकांक्षाएं सब कुछ। यही था दो-राष्ट्र सिद्धांत की बुनियाद। हम दो राष्ट्र हैं, एक नहीं।”[5]
यह जनरल भी उसी वैचारिक दरार का हिस्सा हैं जो दशकों से पाकिस्तान की सोच में बैठा दी गई है। इस सोच को तीन प्रमुख तरीकों से जिंदा रखा गया है:
- पाकिस्तानी स्कूलों की किताबें हिंदू और भारत-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देती हैं। बच्चों को ऐसा इतिहास पढ़ाया जाता है जिसमें हिंदुओं को हमलावर और भारत को शोषक बताया जाता है।
- पाकिस्तान की सरकारें, सेना और धार्मिक दल बार-बार हिंदू और भारत-विरोधी भाषा का इस्तेमाल करते हैं ताकि जनता की भावनाओं को भड़काया जा सके और सत्ता मजबूत की जा सके।
- पाकिस्तान के धार्मिक और पंथीय संगठनों ने असहिष्णुता की एक ऐसी संस्कृति बनाई है जिसमें वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों को अक्सर भेदभाव, जबरन धर्मांतरण और हिंसा का शिकार बनना पड़ता है।
पाक सेना की भूमिका
पाकिस्तान की सेना देश की सबसे प्रभावशाली संस्था है और उसने हमेशा से भारत के प्रति नीति तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाई है। उसकी सोच कश्मीर विवाद और भारत से आने वाले एक काल्पनिक “अस्तित्वगत खतरे” से गहराई से प्रभावित रही है। इसी सोच ने भारत के खिलाफ स्थायी दुश्मनी वाली रणनीति को जन्म दिया है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को लगातार समर्थन दिया है, जिनका मकसद भारत में अस्थिरता पैदा करना और माहौल को भड़काना रहा है।
आर्थिक संकटों के बावजूद पाकिस्तान ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में भारी निवेश किया है, खासकर परमाणु हथियारों को विकसित करने में, ताकि वह भारत की पारंपरिक सैन्य शक्ति का संतुलन बना सके। सेना भारत से उत्पन्न खतरे का हवाला देकर नागरिक सरकारों पर अपना दबदबा बनाए रखती है और खुद को राष्ट्रीय एकता की रक्षक के तौर पर पेश करती है। भारत-विरोधी बयानबाज़ी एक ऐसा माध्यम बन गया है जिसके ज़रिए पाकिस्तान जैसा जातीय और सांप्रदायिक रूप से बंटा हुआ देश एकजुट रखा जाता है।
अगर पाकिस्तान टूट भी जाए, तो जो हिस्सा बचेगा, वह अपने सैन्य नेतृत्व की वजह से भारत के खिलाफ वैसी ही रणनीतिक सोच को बनाए रखेगा। सेना का अस्तित्व और ताकत भारत-विरोधी रवैये से ही जुड़ा हुआ है और उसे छोड़ना उसके लिए आसान नहीं होगा।
टूटने के बाद की स्थिति क्या हो सकती है
मान लें कि पाकिस्तान बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और एक छोटे पंजाब जैसे चार या उससे अधिक हिस्सों में टूट जाता है, तो भू-राजनीतिक नक्शा जरूर बदलेगा। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि बचे हुए पाकिस्तान से भारत को राहत मिलेगी। इसके कई कारण हैं।
सबसे पहले, पंजाब पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सैन्य रूप से सबसे ताकतवर प्रांत है, और वही बचे हुए पाकिस्तान का केंद्र बनेगा। पाकिस्तान की भारत-विरोधी नीतियाँ हमेशा से पंजाब के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में रही हैं। इसलिए उस सोच में कोई खास बदलाव आने की संभावना नहीं है। दो-राष्ट्र सिद्धांत और हिंदू-विरोधी विचारधारा कोई स्थानीय सोच नहीं बल्कि उस राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा है जिसे यह छोटा पाकिस्तान भी अपनाएगा। उसका सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व इन्हीं बातों का सहारा लेकर जनता को जोड़ने और अपनी सत्ता को कायम रखने की कोशिश करेगा।
पाकिस्तान के टूटने से जो अस्थिरता पैदा होगी, वह आर्थिक और राजनीतिक तौर पर उसे और कमजोर बना देगी। ऐसे हालात में बाहरी दुश्मन दिखाना और राष्ट्रवादी भावनाएँ भड़काना उसके लिए एक आसान रास्ता रहेगा। संकट के समय अक्सर सरकारें आंतरिक विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए किसी बाहरी दुश्मन का सहारा लेती हैं, और भारत इस भूमिका में पहले से मौजूद रहेगा।
इसके अलावा, छोटा पाकिस्तान भी कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखने के लिए आतंकवादी संगठनों को समर्थन देता रहेगा, क्योंकि यह एक सस्ता और प्रभावी तरीका है जिससे वह भारत को चुनौती दे सकता है। यह रणनीति दशकों से उसकी नीति का हिस्सा रही है और इसमें बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं दिखती।
और अंततः, यह बचा हुआ पाकिस्तान परमाणु हथियारों का वारिस रहेगा। उसके पास लगभग 180 परमाणु हथियार रह सकते हैं – बशर्ते भारत के किरणा हिल्स पर किए गए हवाई हमलों में कुछ हथियार नष्ट न हुए हों। यह परमाणु खतरा आगे भी भारत की सुरक्षा नीति के लिए एक चुनौती बना रहेगा।
इसलिए चाहे पाकिस्तान चार टुकड़ों में टूट जाए या सिर्फ आकार में छोटा हो जाए, उसका भारत-विरोधी रवैया और उससे उत्पन्न खतरे पूरी तरह खत्म होने वाले नहीं हैं।[6]
हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी
पाकिस्तान में हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी महज़ राजनीतिक विवादों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक और संस्थागत समस्या है, जो वहां की सोच और व्यवस्था में गहराई से बैठ चुकी है।
- पाकिस्तानी मीडिया, खासकर सोशल मीडिया, अक्सर हिंदुओं के खिलाफ झूठी कहानियाँ, साजिशें और भ्रामक जानकारियाँ फैलाती है, जो समाज में सांप्रदायिक नफरत को और हवा देती हैं।[7]
- पाकिस्तान के हिंदू अल्पसंख्यकों को लगातार भेदभाव, जबरन धर्मांतरण, अपहरण और उनके मंदिरों पर हमलों का सामना करना पड़ता है। इन घटनाओं पर सरकार अक्सर आंख मूंद लेती है या फिर चुपचाप सहमति देती है।[8]
- इस्लामी राजनीतिक दल और मौलवी हिंदू-विरोधी भाषणों का इस्तेमाल करके अपने समर्थकों को उकसाते हैं और इससे नीति निर्धारण पर भी असर पड़ता है।[9]
अगर पाकिस्तान का बंटवारा हो भी जाए, तब भी जो छोटा-सा बचा हुआ राज्य रहेगा, उसका राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व हिंदू-विरोधी भावना को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करता रहेगा – कभी सत्ता बनाए रखने के लिए, तो कभी समाज को नियंत्रित करने के लिए।
भू-राजनीति और बाहरी हस्तक्षेप
पाकिस्तान की भारत-विरोधी सोच सिर्फ उसके आंतरिक कारणों से नहीं, बल्कि उसके अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और प्रतिद्वंद्विताओं से भी प्रभावित होती है।
- चीन के साथ पाकिस्तान का गठजोड़ – खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के ज़रिए – पाकिस्तान की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देता है और उसे सैन्य व आर्थिक समर्थन भी दिलाता है। चीन की रणनीति यही रही है कि पाकिस्तान भारत के लिए एक संतुलन बना रहे, और यह सोच भविष्य में बदलने की कोई उम्मीद नहीं है।
- अगर पहलगाम घटना के बाद की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया को देखें, तो पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी संगठनों को समर्थन देने पर दुनिया भर से आलोचना तो हुई है, लेकिन कई वैश्विक शक्तियों ने अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी है। यही वजह है कि जब कश्मीर में हुए एक आतंकी हमले में 25 हिंदुओं की जान गई, तो कुछ ही दिन बाद पाकिस्तान को IMF से एक अरब डॉलर का कर्ज मिल गया।[10]
- कश्मीर विवाद और सीमा पार आतंकवाद, दोनों ही भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में स्थायी तनाव बनाए रखते हैं। भले ही पाक सेना भारत से कश्मीर नहीं छीन सकती, लेकिन वह इस मुद्दे को लगातार ज़िंदा रखती सकती है ताकि पाकिस्तान की जनता में भारत के खिलाफ भावनाएं भड़कती रहें। राजनीतिक विश्लेषक मुहम्मद बदर आलम मानते हैं कि भारत से जुड़ा खतरे का यह भाव “उन मूल वजहों में से एक है” जिसकी वजह से पाकिस्तान में सेना को समाज, राजनीति और शासन में एक केंद्रीय भूमिका मिलती है।[11]
इसलिए पाकिस्तान चाहे जितना भी छोटा क्यों न हो जाए, वह अपने पुराने गठबंधनों और जारी संघर्षों का सहारा लेकर भारत के खिलाफ अपनी शत्रुता को बनाए रखेगा।
भारत के विकल्प
दक्षिण एशिया में जो स्थिति आज बनी हुई है, वह भले ही “मैक्सिकन स्टैंडऑफ” जैसी लगती हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि भारत को पाकिस्तान के बिखराव की दिशा में प्रयास नहीं करने चाहिए। 1971 का युद्ध, जिसमें पाकिस्तान ने अपना पूर्वी हिस्सा खो दिया था, भले ही पाकिस्तान की भारत-विरोधी मानसिकता को पूरी तरह न मिटा पाया हो, लेकिन इसने उपमहाद्वीप की शक्ति-संरचना को हमेशा के लिए बदल डाला। इसके बाद पाकिस्तान, जो अब आकार और ताकत में भारत से बहुत छोटा और कमजोर हो चुका था, खुलकर युद्ध छेड़ने की स्थिति में नहीं रहा, जैसा कि वह पहले 1948, 1965 और 1971 में कर चुका था। बांग्लादेश के निर्माण ने भारत की सैन्य ताकत को दुनिया के सामने उजागर किया और उसे इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित किया, जिससे पश्चिमी सीमा पर लंबे समय तक अपेक्षाकृत शांति बनी रही।[12]
ऑपरेशन सिंदूर के बाद, जिसमें पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित कई आतंकी ठिकाने खत्म कर दिए गए और 11 वायुसेना अड्डों को भारी नुकसान पहुँचा, भारत ने साफ कहा कि यह अभियान खत्म नहीं हुआ है, बस फिलहाल रोक दिया गया है। इसका मतलब था कि अब से अगर भारत पर फिर कोई आतंकी हमला हुआ, तो भारत सीधे पाकिस्तान की सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा। भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब इस्लामी आतंकवादियों और उन्हें पालने-पोसने वाली पाकिस्तानी सेना के बीच कोई फर्क नहीं किया जाएगा – दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाएंगे।
भारत की “शून्य सहनशीलता” की नीति ने पाकिस्तान की सेना को एक ऐसे फंदे में डाल दिया है, जहां इस्लामाबाद की नीति खुद जड़ता का शिकार हो चुकी है। अगर पाकिस्तान अपने पुराने रास्ते पर लौटता है, तो उसे फिर से जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। और अगर वह कुछ नहीं करता, तो उसकी खुद की उपयोगिता सवालों के घेरे में आ जाएगी। जब पाकिस्तान न तो युद्ध कर सकता है और न ही भारत को चोट पहुँचा सकता है, तो फिर उसकी जनता भी आखिरकार सवाल उठाएगी कि 6 लाख सैनिकों की यह सेना किस काम की है। शायद उस वक्त पाकिस्तान की जनता सेना की तानाशाही से निजात पाने का रास्ता खोजे, भारत से जिहाद के नाम पर लड़ने से इनकार करे, और उस पहचान से बाहर निकले जो उसे आतंकवाद से जोड़ती है।
लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान की सेना का बैरकों में लौटना और लंबे समय तक चुपचाप बैठ जाना इतना आसान नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि सहारा रेगिस्तान में बर्फबारी देखने की संभावना उससे ज़्यादा है। इसका साफ मतलब है कि भारत को आने वाले समय में भी जटिल और बहुस्तरीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इनसे निपटने के लिए उसे लगातार सतर्क रहना होगा, रणनीतिक रूप से तैयार रहना होगा, और साथ ही कूटनीतिक प्रयासों को भी तेज़ करना होगा। पाकिस्तान की भारत-विरोधी सोच की जो गहरी जड़ें हैं, उन्हें समझे बिना भारत कोई भी प्रभावी नीति नहीं बना सकता। भारत को ऐसे रास्ते तलाशने होंगे जो उसके राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में भी आगे बढ़ें।
संदर्भ सूची
[1] Operation Sindoor and the Evolution of India’s Military Strategy Against Pakistan War on the Rocks,2025); https://warontherocks.com/2025/05/operation-sindoor-and-the-evolution-of-indias-strategy-against-pakistan/
[2] Implications of an Indian Victory over Pakistan (CIA report available on Freedom of Information Act Electronic Reading Room, December 1971); https://www.cia.gov/readingroom/document/cia-rdp79r00967a000400020005-1
[3] Report of High CIA Tipster Stirs Furor in India (The Washington Post; 1979); https://www.cia.gov/readingroom/docs/CIA-RDP88-01350R000200050003-6.pdf
[4] Exposing the Truth of Two-Nation Theory (Vivek Agnihotri blog); https://vivekagnihotri.com/exposing-the-truth-of-the-two-nation-theory/
[5] Freedom of Information Act Electronic Reading Room (Hindustan Times, 2025); https://www.hindustantimes.com/india-news/different-from-hindus-pakistan-army-chief-asim-munir-two-nation-theory-jugular-vein-pahalgam-terror-attack-101745382805306.html
[6] What Exactly Are Pakistan’s Kirana Hills? Do They House Country’s Nuclear Weapons? Radiation Rumours To Underground Tunnels- All You Need To Know! (News 24, 2025); https://news24online.com/india/what-exactly-are-pakistans-kirana-hills-do-they-house-countrys-nuclear-weapons-from-radiation-rumours-to-underground-tunnels-all-you-need-to-know/565718/
[7] Hindus in Pakistan Face Rising Online Hate and Disinformation! (Center for the Study of Organized Hate, 2025). https://www.csohate.org/2025/04/14/weaponizing-social-media-against-hindus-in-pakistan/
[8] Forced conversions, rapes, mob lynchings: US report exposes how Pakistan targets Hindus, other minorities | 20 key findings (MoneyControl, 2025); https://www.moneycontrol.com/world/forced-conversions-blasphemy-hysteria-and-more-us-report-exposes-how-pakistan-targets-hindus-other-minorities-20-highlights-article-13030429.html/amp
[9] Viral In Pakistan: Celebrity Cleric Visits Kali Mata Temple, Mocks Hindus And India (Swarajya, 2022); https://swarajyamag.com/world/viral-in-pakistan-celebrity-cleric-visits-kali-mata-temple-mocks-hindus-and-india
[10] Pakistan Seeks $4.9 Billion More In Loans After Missing Growth Target (NDTV World, 2025); https://www.ndtv.com/world-news/pakistan-seeks-4-9-billion-in-external-loans-after-missing-growth-target-8468522
[11] How conflict with India helped boost the Pakistan military’s domestic image (Al Jazeera, 2025); https://www.aljazeera.com/news/2025/5/20/how-conflict-with-india-helped-boost-the-pakistan-militarys-domestic-image
[12] The fight for joy Bangla: How India helped Bangladesh achieve independence (DDNews, 2024); https://ddnews.gov.in/en/the-fight-for-joy-bangla-how-india-helped-bangladesh-achieve-independence/
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