हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की पाकिस्तान कान्फ्रन्स: अकादमिक जगत कैसे आतंकवाद की लीपापोती करता है  

प्रतिष्ठित पश्चिमी विश्वविद्यालय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विविधता को बनाए रखने का दावा करते हुए, हिंदू विरोधी प्रचार को बढ़ावा दे रहे हैं और आतंकवाद से जुड़ी विचारधाराओं का महिमामंडन कर रहे हैं। यानि कि शैक्षणिक स्वतंत्रता की आड़ में इन विश्वविद्यालय परिसरों में कट्टरपंथ तेज़ी से पनप रहा है।
  • हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय तेज़ी से हिंसक विचारधाराओं का महिमामंडन कर रहे हैं जो भारत की एकता और संप्रभुता के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा हैं।
  •  इन विश्वविद्यालयों की जड़ों में गहरी पैठ बना चुकी हिंदू-घृणा अब हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी आतंकवाद के लिए एक सूक्ष्म लेकिन खतरनाक समर्थन प्रणाली में बदल गई है।
  •  पहलगाम आतंकी हमले के कुछ ही दिनों बाद आयोजित हार्वर्ड के “पाकिस्तान सम्मेलन” में वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारियों को आमंत्रित किया गया था, जो हिंदुओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को छिपाने के लिए उठाया गया था।
  •  प्रतिष्ठित पश्चिमी विश्वविद्यालय परिसरों में हिंदूफोबिया और यहूदी-विरोधी भावना के प्रसार के बीच उल्लेखनीय समानताएं हैं।
  •  हालांकि अमेरिकी सरकार ने विश्वविद्यालय परिसरों में व्याप्त यहूदी-विरोधी भावना के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की है, परंतु हिंदूफोबिया को एकदम नजरअंदाज किया गया है और उस पर अंकुश नहीं लगाया गया है।
  •  विदेशी धन जो बहुत से प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों को दिया जा रहा है, उसकी भारत-विरोधी विचारधारा और आतंकवाद को अकादमिक रूप से बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका हो सकती है

फ्रांसीसी विचारक मिशेल फूको (Michel Foucault) ने अपने लेखन में यह दिखाया था कि ज्ञान और सत्ता का आपस में गहरा संबंध होता है। उनका कहना था कि ज्ञान किस तरह बनाया और इस्तेमाल किया जाता है, इससे यह तय होता है कि समाज में किसे मान्यता मिलती है और किसे नहीं।

यह सोच आज भी उतनी ही सटीक है, क्योंकि आज की बड़ी वैश्विक ताक़तें यह तय करती हैं कि किस तरह की जानकारी को सही माना जाए और कौन-सी बातों को नकार दिया जाए। ये ताक़तें शिक्षा की दिशा को इस तरह मोड़ती हैं कि कुछ ख़ास विचारधाराओं को बढ़ावा मिले और बाकी को हटा दिया जाए।

यह खासकर उन पश्चिमी यूनिवर्सिटियों के मामले में साफ़ नज़र आता है, जो अब हिंदू विरोधी और भारत विरोधी सोच के केंद्र बन गए हैं। इन संस्थानों से लगातार ऐसी बातें फैलाई जाती हैं जो भारत के खिलाफ जहरीली धारणाएँ बनाती हैं, और यह धीरे-धीरे देश की एकता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0 (Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0) नाम की किताब में बताया गया है कि हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय इस एजेंडे में कैसे शामिल हैं। लेखकों ने भारत सरकार को सुझाव दिया है कि हार्वर्ड की गतिविधियों की जांच हो और उसे भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देने से रोका जाए। यह पुस्तक यह भी दिखाती है कि हार्वर्ड किस तरह भारत की सांस्कृतिक सोच को मिटाकर उसकी जगह ऐसे विचार लाना चाहता है, जो भारत की संप्रभुता को कमज़ोर करते हैं।[1]

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हार्वर्ड जैसे प्रसिद्ध पश्चिमी विश्वविद्यालय अब ऐसी उग्र विचारधाराओं को बढ़ावा दे रहे हैं जो भारत की एकता के लिए खतरा बन सकती हैं। ये संस्थान धीरे-धीरे ऐसे रुख अपनाते जा रहे हैं जो आतंकवाद का समर्थन करते हैं, और ऐसे लोगों को मंच देते हैं जो भारत विरोधी और हिंदू विरोधी हिंसा में शामिल रहे हैं — ताकि उनके कामों को सामाजिक आंदोलन के रूप में दिखाया जा सके। इस से भी गंभीर बात यह है कि ये विश्वविद्यालय सिर्फ छात्रों को उग्र और विध्वंसक विचारों से परिचित ही नहीं करा रहे, बल्कि उन सभी आवाज़ों को दबा रहे हैं जो इस रवैये पर सवाल उठाने की कोशिश करते हैं।

पहलगाम आतंकी हमले के कुछ ही दिन बाद हार्वर्ड का पाकिस्तान पर केंद्रित सम्मेलन आयोजित करना यह दिखाता है कि ऊँचे शिक्षण संस्थानों में आतंक से जुड़ी बातों को नजरअंदाज़ या ढँकने की कोशिशें कितनी बढ़ गई हैं।

आगे के हिस्सों में हम इस पर चर्चा करेंगे कि इन संस्थानों में फैले हिंदू-विरोधी नजरिए ने किस तरह एक छिपे हुए विचारतंत्र का रूप ले लिया है जो आतंकवाद को जायज़ ठहराने का काम करता है।

हार्वर्ड का शर्मनाक पाकिस्तान सम्मेलन

पहलगाम आतंकी हमले के ठीक 5 दिन बाद, 27 अप्रैल को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने “पाकिस्तान सम्मेलन” की मेज़बानी की। हार्वर्ड के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब और अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रिज़वान सईद शेख समेत कई प्रमुख पाकिस्तानी व्यक्ति शामिल हुए।

जब भारतीय छात्रों ने इसका विरोध किया, तो हार्वर्ड ने यह कहकर आलोचना से बचने की कोशिश की कि यह कार्यक्रम छात्रों द्वारा आयोजित था और विश्वविद्यालय ने वक्ताओं या एजेंडे के चुनाव में कोई भूमिका नहीं निभाई।  हालांकि इस बात में कोई भी दम नहीं है, बल्कि आलोचना से बचने के लिए एक बहाना है।[2]

पाकिस्तान सम्मेलन पर हार्वर्ड की इस कथित तटस्थता से पश्चिमी विश्वविद्यालयों का दोहरा मापदंड साफ़ झलकता है। वे अकसर “शैक्षणिक स्वतंत्रता” की बात करते हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं। जैसे कि कई अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने इज़राइल-गाजा संघर्ष को लेकर इज़राइली संस्थानों का खुला बहिष्कार किया है — और यह बहिष्कार इतना चरम था कि अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने ऐसे कॉलेजों की फंडिंग रोक दी जो इसका समर्थन कर रहे थे।[3] लेकिन जब बात पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने की होती है, तो यही विश्वविद्यालय चुप्पी साध लेते हैं। इसके उलट, ये संस्थान खुलेआम उन लोगों को मंच देते हैं जिनका जुड़ाव आतंकवाद से रहा है, और इसे “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहकर सही ठहराते हैं। यह वोक लॉबी की एक चालाक रणनीति है, जो आतंकवाद को जायज़ ठहराने का एक तरीका बन चुकी है।

भारतीय मूल के अरबपति लक्ष्मी मित्तल, जिनका परिवार हार्वर्ड के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट को आर्थिक सहायता देता है, को इस सम्मेलन से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होने के कारण तीखी आलोचना झेलनी पड़ी। सोशल मीडिया पर #ShameOnMittal और #BoycottPakistanConference जैसे हैशटैग तेज़ी से फैलने लगे, लेकिन मित्तल परिवार ने यह कहकर खुद को अलग करने की कोशिश की कि इस सम्मेलन के आयोजन में उनसे कोई सलाह नहीं ली गई थी। उनकी इस सफाई में ईमानदारी की बहुत हद तक कमी पाई गई, और ज़्यादातर लोगों को संतुष्ट नहीं कर सकी।[4]

हावर्ड के इस सम्मेलन के लिए बनाई गई एक वेबसाइट अब भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। एजेंडे पर एक नज़र डालते ही साफ़ हो जाता है कि इसके पीछे किस तरह की सोच काम कर रही थी।[5] यह बात किसी से छुपी नहीं है कि पाकिस्तान की सेना देश के आतंकी नेटवर्क में गहराई से शामिल है। यह देश न सिर्फ आतंकियों को पनाह और प्रशिक्षण देता है, बल्कि उन्हें देश के हीरो की तरह पेश भी करता है। भारत के साथ-साथ कई पश्चिमी देश भी इस आतंकी तंत्र के शिकार रहे हैं। इसके बावजूद हार्वर्ड ने ऐसा सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें इन सच्चाइयों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया और पाकिस्तान को एक लोकतांत्रिक देश के रूप में दिखाया गया जो अच्छे शासन की ओर बढ़ रहा है, जो हकीकत से मीलों दूर है।

इसमें कोई शक नहीं है कि इस कार्यक्रम का असली मकसद पाकिस्तान द्वारा लंबे समय से किए जा रहे इस्लामिक कट्टरपंथ के समर्थन को ढकने की कोशिश करना था। हालांकि यह सही है कि यह सम्मेलन पहलगाम आतंकी हमले से पहले तय हुआ था, लेकिन यह तथ्य कि किसी भी वक्ता ने उन हमलों की हिंसा की निंदा नहीं की या संवेदनशीलता नहीं दिखाई — यह साफ़ करता है कि इस आयोजन के पीछे किस तरह की सोच थी, और भारतीय छात्रों की आशंकाएँ कितनी सही थीं।[6]

अगर हार्वर्ड में पढ़ने वाले दो भारतीय छात्रों, सुरभि तोमर और अभिषेक चौधरी, ने साहस नहीं दिखाया होता, तो शायद यह कार्यक्रम ज़्यादा लोगों की नज़र में नहीं आता। उन्होंने अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि सम्मेलन में शामिल होने वाले पाकिस्तानी अधिकारियों के वीज़ा रद्द किए जाएँ। उन्होंने हार्वर्ड के प्रशासन को भी एक चिट्ठी भेजी, जिसमें यह बताया गया कि कई वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारियों ने भारत के खिलाफ अप्रत्यक्ष धमकियाँ दी हैं और कश्मीरी उग्रवादियों का खुलकर समर्थन किया है। पत्र में यह भी बताया गया कि इस सम्मेलन में पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब जैसे लोग शामिल हुए — यह उस समय हुआ जब कुछ ही दिन पहले पाकिस्तानी सिनेट ने कश्मीर के “स्वतंत्रता संघर्ष” को समर्थन देने वाला प्रस्ताव पास किया था।[7]

भारतीय छात्रों के सख्त विरोध और कुछ आमंत्रित अधिकारियों के सीमा पार आतंकवाद से जुड़ाव के साफ़ सबूत होने के बावजूद, हार्वर्ड ने यह सम्मेलन आयोजित किया — जो दिखाता है कि उसकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। जब मामला मीडिया की सुर्खियों में आया, तो हार्वर्ड ने खुद को इस आयोजन से अलग दिखाने की कोशिश की ताकि अपनी छवि को बचाया जा सके, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

हार्वर्ड में भारतीय छात्रों की हिम्मत और मज़बूत इरादों की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। उन्होंने पढ़ाई के नाम पर फैल रहे भारत-विरोधी प्रचार को उजागर किया। अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ़ छात्रों की इस पहल की तारीफ़ की, खासकर पहलगाम हमले के संदर्भ में, जिसमें हिंदुओं को उनके धर्म के कारण निशाना बनाया गया था। सान्याल ने एक्स (X) पर लिखा, “शायद ग़दर आंदोलन के बाद पहली बार, हम किसी नामी अमेरिकी विश्वविद्यालय में भारतीय छात्रों को अपने देश के लिए खड़ा होते देख रहे हैं। आमतौर पर, छात्र या तो चुप रहते हैं या भारत-विरोधी माहौल में शामिल हो जाते हैं। सुरभि और अभिषेक पर बहुत गर्व है।”[8]

नफ़रत का सामान्यीकरण

कई प्रतिष्ठित पश्चिमी विश्वविद्यालयों में हिंदू-विरोधी और यहूदी-विरोधी सोच के फैलाव में कई समानताएँ देखने को मिलती हैं।

7 अक्टूबर को हमास द्वारा इज़राइल पर किए गए हमलों के बाद, अमेरिका के कई विश्वविद्यालय परिसरों में यहूदी-विरोधी रवैये में तेज़ी आई। यहूदी छात्रों और प्रोफेसरों को डराया-धमकाया गया, परेशान किया गया और कई बार सीधे या घुमा-फिराकर धमकी भी दी गई। इसके बाद एक वैश्विक अकादमिक अभियान शुरू हुआ, जिसमें आतंकवाद को “मानवाधिकार”, “न्याय” और “आत्मनिर्णय” जैसे शब्दों में छिपाकर पेश करने की कोशिश की गई। इस सोच को बहुत ही सोच-समझकर तैयार किया गया था, ताकि हमास जैसे आतंकी संगठनों के कामों पर पर्दा डाला जा सके और इज़राइल के विरोध के बहाने यहूदी-विरोधी भावना को सामान्य और स्वीकार्य बनाया जा सके — यह वही तरीका है जैसा हिंदू-विरोधी विचारों को भी इन विश्वविद्यालय परिसरों में आम बना दिया गया है।[9] [10] [11]

पश्चिमी विश्वविद्यालयों में फिलिस्तीन के समर्थन में हो रहे प्रदर्शन धीरे-धीरे हिंसक होते जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, फरवरी में प्रदर्शनकारियों ने बर्नार्ड कॉलेज की मिलिबैंक हॉल इमारत पर हमला किया, जिसमें एक कर्मचारी घायल हो गया, जिसने उन्हें अंदर जाने से रोकने की कोशिश की थी। इसके चलते कॉलेज प्रशासन को सुरक्षा के सख्त इंतज़ाम करने पड़े। प्रदर्शनकारियों ने बार-बार दो छात्रों की वापसी की मांग की, जिन्हें पहले निष्कासित किया गया था। इन छात्रों ने कथित तौर पर कोलंबिया विश्वविद्यालय में चल रही आधुनिक इज़राइल के इतिहास की कक्षा में व्यवधान डाला था। नकाब पहने छात्रों ने कक्षा में घुसकर ढोल बजाना शुरू कर दिया और “क्रश ज़ायोनिज्म” (Crush Zionism) लिखे हुए पर्चे बाँटने लगे।[12]

पश्चिमी देशों के नामी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले हिंदू छात्रों को भी धमकियों और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें उनकी पहचान, सांस्कृतिक परंपराओं और राजनीतिक सोच के कारण निशाना बनाया जाता है। लेकिन ये संस्थान हिंदुओं के खिलाफ हो रही वैश्विक हिंसा और आतंक पर चुप्पी साधे रहते हैं।

इसका एक साफ़ उदाहरण रश्मि सामंत हैं, जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन की अध्यक्ष चुनी जाने वाली पहली भारतीय मूल की महिला बनीं। उनकी हिंदू पहचान और विचारों के खिलाफ एक संगठित बदनामी अभियान चलाया गया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उनकी पुरानी सोशल मीडिया पोस्ट्स को गलत तरीके से पेश कर उन्हें “ट्रांसफोबिक”, “नस्लवादी” और “इस्लामोफोबिक” कहा गया। अपनी किताब ‘ए हिंदू इन ऑक्सफोर्ड’ में रश्मि ने विस्तार से बताया है कि कैसे नस्लभेद, धार्मिक कट्टरता और विश्वविद्यालय की उदासीनता ने उनके शैक्षिक जीवन को प्रभावित किया — साथ ही यह भी कि कैसे उनके माता-पिता को धार्मिक मान्यताओं के कारण एक प्रोफेसर  ने सार्वजनिक रूप से अपमानित किया।

हाल ही में यूसी बर्कले (University of California – Berkely) से एक और चिंताजनक मामला सामने आया, जहाँ एक प्रोफेसर ने पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए हिंदुओं की जिम्मेदारी एक हिंदू छात्र पर डालने की कोशिश की। ‘हिंदू ऑन कैंपस’ द्वारा साझा की गई और कई अंतरराष्ट्रीय हिंदू संगठनों द्वारा समर्थन प्राप्त छात्र की गवाही के अनुसार, प्रोफेसर ने छात्र पर यह कहने का दबाव डाला कि हिंदुओं पर हुई हिंसा किसी न किसी रूप में जायज़ थी। लेकिन इस घटना को मुख्यधारा की मीडिया में कहीं भी रिपोर्ट नहीं किया गया।

ये घटनाएँ दिखाती हैं कि पश्चिमी शिक्षा जगत दोहरा रवैया अपनाता है — एक तरफ़ वो विविधता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करता है, और दूसरी तरफ़ बढ़ते हिंदू-विरोध को नजरअंदाज़ करता है।[13]

2023 के इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के बाद, कई आइवी लीग परिसर एक दम फिलिस्तीन समर्थक, या यूं कहें कि हमास समर्थक, एक्टिविज्म के केंद्र बन गए। इसके विपरीत, पहलगाम आतंकी हमलों पर इन संस्थानों की ओर से पूरी तरह से चुप्पी थी, जहाँ हिंदुओं को उनके परिवारों के सामने बेरहमी से मार दिया गया था। इस तरह के अत्याचारों की निंदा करने के बजाय, पश्चिमी शिक्षाविद अक्सर हिंदुओं को उत्पीड़क के रूप में चित्रित करते हैं। जैसा कि स्टॉपहिंदूद्वेष (StopHindudvesha) द्वारा उजागर किया गया है[14], एलीट शैक्षणिक मंडलियाँ क्रिटिकल रेस थ्योरी जैसे ढाँचों का इस्तेमाल करके “जाति” को जबरन “नस्ल” के रूप में चित्रित करती हैं, व जाति को सभी संरचनात्मक असमानताओं की जड़ के रूप में प्रस्तुत करती हैं – और हिंदुओं को इसके प्राथमिक प्रवर्तक के रूप में।

यह विकृत कथानक हिंदू विरोधी हिंसा के लिए बौद्धिक आवरण का काम करती है। हिंदुओं को खलनायक के रूप में पेश करके और जाति की कथा को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करके, पश्चिमी शिक्षाविद हिंदुओं को निशाना बनाने वाले इस्लामिस्ट आतंकवाद की लीपापोती करने में मदद करते हैं। साथ ही, इस्लामोफोबिया की अतिशयोक्तिपूर्ण निंदा की जाती है – इस हद तक कि जिहादी हिंसा के ख़िलाफ़ बोलने वाले हिंदू छात्रों या विद्वानों को भी “इस्लामोफोब” करार दे दिया जाता है। उस पर विडंबना ये है कि यहूदी-विरोधी भावना को कम से कम एक गंभीर मुद्दे के रूप में स्वीकार किया जाता है, लेकिन हिंदू-विरोधी भावना को एक दम अनदेखा किया जाता है – भले ही दोनों समान अकादमिक चैनलों के माध्यम से फैलते हों। जिस तरह हमास समर्थक प्रोपेगंडा को सामान्य माना जाता है, और इज़राइल को शैतानी बता कर यहूदी समर्थकों को बदनाम किया जाता है, उसी तरह हिंदू-विरोधी कथाएँ ऐसे किसी भी हिंदू को जो इस्लामिस्ट हिंसा की निंदा करता है, “हिंदुत्व फासीवादी”, “हिंदू कट्टरपंथी” या यहाँ तक कि “हिंदू आतंकवादी” करार दे देती हैं।

वोकिज़्म पर ट्रम्प की कार्रवाई

ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी विश्वविद्यालय परिसरों में वोक विचारधारा के फैलाव को रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं। कैंपस में फैल रही यहूदी-विरोधी सोच के खिलाफ एक साहसिक पहल करते हुए, सरकार ने कड़ा रुख अपनाया और प्रमुख आइवी लीग विश्वविद्यालयों को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने तय निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनकी फंडिंग में कटौती की जाएगी। मार्च 2025 में, प्रशासन ने कोलंबिया विश्वविद्यालय को मिलने वाले अनुदान में से 400 मिलियन डॉलर रोक लिए और साथ ही कुछ छात्रों को निष्कासित करने व प्रवेश नीतियों में बदलाव की मांग की। अंततः कोलंबिया विश्वविद्यालय ने इन शर्तों को स्वीकार कर लिया। दूसरे बड़े संस्थानों पर भी इसी तरह की कार्रवाई की गई: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी को 210 मिलियन डॉलर के रिसर्च अनुदान में कटौती का सामना करना पड़ा, जबकि कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की संघीय फंडिंग में कथित रूप से 1 बिलियन डॉलर से अधिक की कमी की गई, और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी को लगभग 790 मिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा।[15]

अमेरिकी विश्वविद्यालयों में गहराई तक फैले वोकिज़्म पर ट्रंप की कार्रवाई की एक अहम बात यह रही कि उन्होंने आतंकवाद का महिमामंडन करने और उसके समर्थकों को बढ़ावा देने के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। मई में, राष्ट्रपति ट्रंप ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय को एक सख्त चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर हार्वर्ड चरमपंथी, राजनीतिक या आतंकवाद से जुड़ी सोच को बढ़ावा देना जारी रखता है, तो वह अपना टैक्स-फ्री अधिकार खो सकता है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल (Truth Social) पर लिखा: “अगर हावर्ड राजनीतिक, वैचारिक और आतंकवाद से प्रेरित या समर्थक सोच को बढ़ावा देता रहा, तो उसे शायद अपनी कर-मुक्त स्थिति गंवा देनी पड़ेगी। याद रहे कि टैक्स में छूट तभी मिलती है जब कोई संस्था पूरी तरह सार्वजनिक हित में काम करे!”[16]

यह कदम ट्रंप सरकार द्वारा हार्वर्ड को 2.2 बिलियन डॉलर की फंडिंग रोकने के कुछ ही हफ्तों बाद उठाया गया।[17] यह फंडिंग इसलिए रोकी गई क्योंकि हार्वर्ड ने कैंपस में फैल रही नफरत और यहूदी-विरोधी सोच पर लगाम लगाने से इनकार कर दिया था। प्रशासन ने हार्वर्ड को एक पत्र भेजा, जिसमें नेतृत्व और प्रबंधन से जुड़े बड़े सुधारों के साथ-साथ प्रवेश नीतियों में बदलाव की मांग की गई थी। प्रमुख मांगों में ये बातें शामिल थीं:

  • फेस मास्क के इस्तेमाल पर रोक लगाना
  • विविधता, समानता और समावेशन से जुड़े कार्यक्रमों को बंद करना
  • यहूदी-विरोध और आतंकवाद का समर्थन करने वाले छात्रों की पहचान करने के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव करना
  • विश्वविद्यालय की आचरण नीतियों का उल्लंघन करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों की जानकारी संघीय अधिकारियों को देना।[18]

परिसरों में फैल रही यहूदी-विरोधी भावना को लेकर ट्रंप प्रशासन की कार्रवाई खास मायने रखती है, क्योंकि अब इसके पुख्ता संकेत मिल रहे हैं कि कुछ विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षक खुद इसमें शामिल हैं।

AMCHA इनिशिएटिव द्वारा किए गए एक अध्ययन ने अमेरिका के विश्वविद्यालय परिसरों में यहूदी-विरोधी हिंसा और एक संकाय समूह ‘Faculty for Justice in Palestine (FJP)’ की गतिविधियों के बीच सीधा संबंध दिखाया है। अध्ययन में पाया गया कि जहाँ-जहाँ FJP की शाखाएँ थीं, वहाँ इज़राइल के खिलाफ प्रदर्शन ज़्यादा तेज़ और लंबे चले। साथ ही, यहूदी छात्रों को धमकियाँ मिलने के मामलों में भी तेज़ी से बढ़ोतरी हुई — जिनमें जान से मारने की धमकियाँ भी शामिल थीं।[19] इस अध्ययन ने अमेरिका के 100 से अधिक ऐसे विश्वविद्यालयों के आँकड़ों का विश्लेषण किया जो यहूदी छात्रों के बीच लोकप्रिय हैं। यह विश्लेषण 7 अक्टूबर 2023 से 30 जून 2024 तक की अवधि को कवर करता है। इस दौरान, यहूदी छात्रों पर शारीरिक हमलों में 2,500% की बढ़ोतरी देखी गई, जबकि जान से मारने जैसी गंभीर धमकियाँ 900% तक बढ़ीं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन परिसरों में FJP की शाखाएँ मौजूद थीं, वहाँ यहूदी छात्रों के लिए माहौल कहीं ज्यादा असुरक्षित था। ऐसे परिसरों में शारीरिक हमलों की संख्या 7.3 गुना अधिक थी, और हत्या या हिंसा की धमकियाँ मिलने की संभावना उन परिसरों की तुलना में 3.4 गुना ज्यादा थी, जहाँ FJP की शाखाएँ नहीं थीं।[20]

इन निष्कर्षों का महत्व तब और बढ़ जाता है जब इन्हें अमेरिका के कॉलेजों में बढ़ते हिंदू-विरोध और इस्लामी कट्टरपंथ द्वारा हिंदुओं पर हमलों से जोड़ा जाए — जिन्हें अक्सर अनदेखा किया जाता है। जहाँ यहूदी-विरोधी घटनाओं पर अब कड़े सरकारी कदम उठाए जा रहे हैं, वहीं हिंदू-विरोध को मीडिया और प्रशासन दोनों ही बड़ी हद तक अनदेखा करते हैं। हिंदू छात्रों को डराने, भेदभाव करने या धमकी देने जैसी घटनाएँ अक्सर ध्यान से बाहर रह जाती हैं। भले ही शैक्षणिक स्वतंत्रता के नाम पर हिंदू-विरोधी विचार और आतंक का महिमामंडन लगातार हो रहा हो, फिर भी संस्थागत स्तर पर इसका विरोध बहुत कम देखने को मिलता है।

अब समय आ गया है कि हिंदू अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह, AMCHA इनिशिएटिव की तरह डेटा आधारित अध्ययन करें — ताकि प्रमुख पश्चिमी विश्वविद्यालयों में फैल रहे हिंदू-विरोध के दायरे को ठीक से दर्ज किया जा सके। जब तक ठोस प्रमाण और लगातार दबाव नहीं बनाया जाएगा, तब तक इन मुद्दों को दबाया जाता रहेगा।

विदेशी फंडिंग अकादमिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देते हुए

‘स्नेक्स इन द गंगा 2.0’ में राजीव मल्होत्रा और विजया विश्वनाथन बताते हैं कि किस तरह चीन के अरबपति हार्वर्ड को रणनीति के तहत फंडिंग करते हैं, ताकि चीन के भू-राजनीतिक हितों को बढ़ावा दिया जा सके और पश्चिमी शिक्षा जगत में चीन समर्थक विचारों को आगे बढ़ाया जा सके। इसके विपरीत, भारतीय अरबपति — चाहे जानकारी की कमी से या हार्वर्ड जैसी संस्थाओं की चमक से प्रभावित होकर — उन विश्वविद्यालयों को फंड करते हैं जो खुलकर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी शोध को बढ़ावा देते हैं।

स्टॉपहिंदूद्वेष (StopHindudvesha) के एक पुराने लेख में यह दिखाया गया था कि कैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों को मिलने वाली विदेशी फंडिंग और शिक्षा जगत में आतंकवाद के परोक्ष समर्थन के बीच एक चिंताजनक रिश्ता है। जहाँ पहले सऊदी अरब इन विश्वविद्यालयों का सबसे बड़ा दानदाता था, अब उसकी जगह कतर ने ले ली है। 2022 में कतर अमेरिकी विश्वविद्यालयों का सबसे बड़ा विदेशी फंडिंग स्रोत बन गया था, जिसने 2001 से 2021 के बीच कम से कम 4.7 बिलियन डॉलर दिए थे। माना जाता है कि कतर ने 11 सितंबर के आतंकी हमलों के बाद इन विश्वविद्यालयों को बड़े पैमाने पर फंडिंग देना शुरू किया — हर साल औसतन 200 मिलियन डॉलर से ज़्यादा।[21]

NCRI के एक अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका के कॉलेजों को तानाशाही सरकारों से मिलने वाली विदेशी फंडिंग से न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्य कमजोर हो रहे हैं, बल्कि यहूदी-विरोधी घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। इस रिपोर्ट में सब से अहम बात यह बताई है कि कतर और कुछ खाड़ी देशों से मिले फंड का सीधा जुड़ाव अमेरिका के कॉलेजों में “Students for Justice in Palestine” (SJP) जैसे समूहों की बढ़ती गतिविधियों से है।[22]

यह बात ध्यान देने योग्य है कि 7 अक्टूबर को हमास के आतंकी हमले के बाद अमेरिका के कॉलेजों में फिलिस्तीन के पक्ष में और इज़राइल के खिलाफ़ छात्रों को संगठित करने में SJP समूहों की बड़ी भूमिका रही। इन लोगों ने कई जगह रैलियाँ कीं, जहाँ हमास के आतंकियों को “शहीद” कहा, हिंसा फैलाने की बात की, और इज़राइल को मिटाने की माँग तक की।[23]

निष्कर्ष

जहाँ विदेशी फंडिंग से पश्चिमी विश्वविद्यालय परिसरों में यहूदी-विरोधी सोच के फैलाव को लेकर काफी शोध हो चुका है, वहीं हिंदूफोबिया या हिंदू-विरोध की बढ़ती समस्या की अभी तक उसी तरह जांच नहीं की गई है।

इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले हिंदू छात्रों को एक गहरे षड्यंत्र का सामना करना पड़ता है, जो मुख्य रूप से दो तरीकों से काम करता है। पहला, शिक्षा और शोध के ज़रिये हिंदू धर्म, भारत और उनसे जुड़े विषयों को गलत ढंग से पेश कर, हिंदू-विरोध को सामान्य बना देना। दूसरा, हिंदुओं के खिलाफ़ हुए आतंकी हमलों को छिपाने के लिए बौद्धिक तरीकों से ऐसा नैरेटिव बनाना जिसमें अपराधियों को बचाया जाए और पीड़ितों की पहचान ही मिटा दी जाए।

पश्चिम में सक्रिय हिंदू संगठनों को चाहिए कि वे अपनी-अपनी सरकारों से यह मांग करें कि कैंपस में बढ़ते हिंदूफोबिया को रोकने के लिए कड़ी नीतियाँ बनाई जाएँ। साथ ही, हिंदू छात्र और शिक्षक समुदाय को चाहिए कि वे उन कोर्सों, कार्यक्रमों और घटनाओं की खुलकर पहचान करें और उन्हें सार्वजनिक रूप से बेनकाब करें जो भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी सोच को बढ़ावा देते हैं।

संदर्भ सूची

[1]  Snakes in the Ganga by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan, p.p. 322-331.

[2] Harvard faces backlash for hosting Pak officials after Pahalgam terror attack – India Today;    https://www.indiatoday.in/world/us-news/story/harvard-university-top-pakistan-officials-after-pahalgam-terror-attack-glbs-2717160-2025-04-30

[3]  US’s NIH bans grants for schools that boycott Israeli companies | The Times of Israel;  https://www.timesofisrael.com/nih-bans-grants-for-schools-that-boycott-israeli-companies/

[4] Mittal family says it was not consulted on Harvard’s Pakistan conference by Institute they funded – The Times of India;   https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/mittal-family-says-it-was-not-consulted-on-harvards-pakistan-conference-by-institute-they-funded/articleshow/120769833.cms

[5] Agenda – Pakistan Conference at Harvard 2025;   https://www.harvardpakistanconference.com/agenda

[6] Students condemn Harvard for hosting ‘Pakistan Conference’ following Pahalgam attack – The Economic Times;  https://economictimes.indiatimes.com/nri/latest-updates/students-condemn-harvard-for-hosting-pakistan-conference-following-pahalgam-attack/articleshow/120755852.cms?from=mdr

[7] Take stance against Hinduphobia’: Why Harvard University is under fire days after Pahalgam terror attack;  https://www.firstpost.com/explainers/harvard-university-row-pakistan-conference-pahalgam-terror-attack-13884236.html

[8] First time in 100 years’: Sanjeev Sanyal lauds Indian students at Harvard for calling out Pak-backed terror – BusinessToday; https://www.businesstoday.in/india/story/first-time-in-100-years-sanjeev-sanyal-lauds-indians-students-at-harvard-for-calling-out-pak-backed-terror-474324-2025-05-01

[9] ADL finds 10,000 antisemitic incidents in US since Hamas’s October 7 attack | The Times of Israel;  https://www.timesofisrael.com/adl-finds-10000-antisemitic-incidents-in-us-since-hamass-october-7-attack/

[10] Over 1,000 antisemitic incidents on college campuses since October 7 – The Jerusalem Post;   https://www.jpost.com/diaspora/antisemitism/article-787895

[11]  Anti-Israel student groups plan ‘Week of Rage’ for deadly Hamas terrorist attack anniversary: ‘Boggles   the mind’; https://www.bostonherald.com/2024/10/03/anti-israel-student-groups-plan-week-of-rage-for-deadly-hamas-terrorist-attack-anniversary-boggles-the-mind/

[12] Barnard College pro-Palestinian protest turns violent – The Forward;  https://forward.com/fast-forward/699868/barnard-college-protests-palestinians-israel/

[13] Hindu On Campus on X;   https://x.com/hinduoncampus/status/1919380191823962551

[14] Hindudvesha’s and UN’s Double Standard; https://stophindudvesha.org/hindudvesha-and-uns-double-standard/

[15] First Columbia, now Harvard and more… How Trump is targeting elite US universities;  https://www.firstpost.com/explainers/donald-trump-harvard-funding-freeze-us-colleges-13879983.html

[16] Pushing Terrorist-Inspired Sickness: Donald Trump Slams Harvard University, Threatens To Withdraw Tax Free Status | Republic World;  https://www.republicworld.com/world-news/donald-trump-says-harvard-university-pushing-terrorist-inspired-sickness-wants-it-to-lose-tax-free-status

[17] Trump to take away Harvard’s tax-exempt status: ‘It’s what they deserve!’ (NY Post, 2025); https://nypost.com/2025/05/02/us-news/trump-to-take-away-harvards-tax-exempt-status/

[18] Why has Trump paused funding for Harvard University? Why is the US president targeting US colleges? – Firstpost; https://www.firstpost.com/explainers/donald-trump-harvard-funding-freeze-us-colleges-13879983.html

[19]Study: US Professors Are Fueling Antisemitic Violence Against Jewish Students – The Media Line;  https://themedialine.org/by-region/study-us-professors-are-fueling-antisemitic-violence-against-jewish-students/

[20] How a Faculty Network Fuels Campus Unrest & Antisemitic Violence: Report by AMCHA Initiative;   https://amchainitiative.org/wp-content/uploads/2024/09/Academic-Extremism-Report_Sept2024.pdf

[21]  HarvardGate – The Varsity Funding Trail from Hell;  https://stophindudvesha.org/harvardgate-the-varsity-funding-trail-from-hell/#_ftn2

[22] Foreign Funding, Campus Speech, and Antisemitism: Report by NCRI;   https://networkcontagion.us/wp-content/uploads/Foreign-funding-of-US-colleges-and-universities-speech-antisemitism-ethics-review-revision.pdf

[23] HarvardGate – The Varsity Funding Trail from Hell; https://stophindudvesha.org/harvardgate-the-varsity-funding-trail-from-hell/#_ftn3

 

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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