भारत के भीतर की अदृश्य जंग: 0.5 फ्रंट का उभरता संकट
- “0.5 फ्रंट” उन आंतरिक दुश्मनों को दर्शाता है — जैसे कट्टरपंथी इस्लामवादी, शहरी नक्सली और साइबर हमलावर — जिन्हें युद्ध के समय भारत को भीतर से अस्थिर करने के लिए सक्रिय किया जा सकता है।
- इतिहास और वर्तमान इस बात के गवाह हैं कि इन तत्वों ने न केवल सैन्य अभियानों में बाधा डाली है, बल्कि संवेदनशील ठिकानों की जासूसी की है और संकट के समय हिंसा को भड़काया है। दुर्भाग्य से, ये अक्सर राजनीतिक संरक्षण या न्यायिक नरमी के चलते सज़ा से बच निकलते हैं।
- फेक न्यूज़ और मनोवैज्ञानिक युद्ध आज के युद्ध का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। मीडिया, कुछ कार्यकर्ता और विदेशी एजेंसियाँ जनता को गुमराह कर सेना और सरकार पर से विश्वास कमजोर करती हैं — जिससे राष्ट्रीय मनोबल और सामाजिक एकता पर आघात पहुँचता है।
- चीन और पाकिस्तान वर्षों से “ग्रे ज़ोन वारफेयर” चला रहे हैं — जिसमें वे पारंपरिक युद्ध की जगह साइबर हमलों, दुष्प्रचार और प्रॉक्सी आतंकवाद का सहारा लेकर भारत को रणनीतिक नुकसान पहुँचाते हैं। यह एक ऐसा युद्ध है जो बिना बम-बंदूक के लड़ा जाता है, लेकिन उसका असर उतना ही विनाशकारी होता है।
- भारत को अब एक साहसी और निर्णायक रणनीति अपनानी होगी: कमजोर कानूनों में सुधार किया जाए, न्यायिक अति-हस्तक्षेप पर लगाम लगे, खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय हो, मीडिया को जवाबदेह बनाया जाए, और देशविरोधी तत्वों के विरुद्ध सटीक और ठोस कार्रवाई की जाए — तभी राष्ट्र की सुरक्षा और एकता सुनिश्चित रह पाएगी।
जब कोई देश युद्ध के मैदान में उतरता है, तो नजर सबसे पहले बाहरी खतरों पर जाती है — दुश्मन की फौजें, मिसाइल हमले, और ज़मीन, समंदर व आसमान में चल रही जंग। लेकिन भारत के लिए एक और दुश्मन है, जो भारत के भीतर छिपा बैठा है, और उतना ही खतरनाक है जितना कि बाहरी दुश्मन। इसी छिपे हुए खतरे को भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, दिवंगत जनरल बिपिन रावत ने “0.5 फ्रंट” का नाम दिया था।[1]
“0.5 फ्रंट” दरअसल “दो-साढ़े दो मोर्चों के युद्ध” की कल्पना का हिस्सा है। इसमें भारतीय सेना को एक साथ उत्तर में चीन और पश्चिम में पाकिस्तान से पारंपरिक युद्ध लड़ना पड़ता है, और साथ ही देश के भीतर मौजूद छिपे हुए दुश्मनों से भी निपटना होता है। ये आंतरिक दुश्मन दिखाई नहीं देते, लेकिन इनके कारण होने वाला नुकसान किसी बाहरी हमले से कम नहीं होता।
0.5 फ्रंट किसी पारंपरिक सेना की तरह नहीं होता। इसमें शामिल होते हैं — स्लीपर सेल्स, पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी, साइबर हमलावर, शहरी नक्सली, और वे लोग जो समाज में दरारें डालते हैं। युद्ध के समय दुश्मन देश इन तत्वों को सक्रिय कर सकते हैं ताकि देश में अराजकता फैले, संचार तंत्र बाधित हो, और सरकार का ध्यान बाहरी हमले से हट जाए। भारत की विविधता और विशालता ऐसी परिस्थितियों में इन आंतरिक कमजोरियों को और बढ़ा देती है।
मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह “दो-साढ़े दो मोर्चों का युद्ध” भारत के लिए सबसे भयावह स्थिति होगी — जब कूटनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक सभी प्रयास असफल हो जाएं, और किसी राज्य विशेष में प्रशासनिक विफलता के चलते उग्रवाद जन्म ले ले।[2]
भारत के भीतर छिपा पाकिस्तान
0.5 फ्रंट की एक बड़ी सच्चाई यह है कि देश के अंदर ही कई कट्टरपंथी और स्लीपर सेल्स मौजूद हैं। ये लोग समाज में सामान्य नागरिक की तरह रहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर सक्रिय होकर हिंसा, तोड़फोड़ और आतंक फैला सकते हैं — जिससे देश को अंदर से कमजोर किया जा सके।
वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने 1965 के युद्ध का एक वाकया बताया। उस समय भारतीय सेना का एक काफिला रामपुर छावनी से पश्चिमी सीमा की ओर जा रहा था। जब यह उत्तर प्रदेश से गुजर रहा था, तभी करीब 50 कट्टरपंथियों ने सेना पर पथराव किया और सड़क खोद दी, जिससे काफिला वहीं रुक गया।[3]
कुलश्रेष्ठ, जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के पूर्व छात्र हैं, बताते हैं कि इस हमले का नेतृत्व एक कॉलेज छात्र आज़म ख़ान कर रहा था। जनता ने उसे पकड़कर पीटा, पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और बाद में अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में रहने के दौरान ही स्थानीय खुफिया अधिकारी ने reportedly उसे रामपुर छोड़ने का निर्देश दिया। इसके बाद आज़म ख़ान अलीगढ़ गया, AMU में दाख़िला लिया, और बाद में समाजवादी पार्टी में मंत्री बन गया।
रामपुर में जिन लोगों ने देश की सेना पर हमला किया था, उनकी पहचान प्रशासन को पहले से थी। ये सभी लोग हाईवे के आसपास रहते और काम करते थे। लेकिन “धर्मनिरपेक्षता” की राजनीति के चलते उन पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हुई।
हाल के वर्षों में भी ऐसे ही मामले सामने आए हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, जब भारतीय वायुसेना पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक कर रही थी, केरल पुलिस ने मुजीब रहमान नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया। उसने खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय का अधिकारी बताकर कोच्चि नौसेना अड्डे पर फोन किया और INS विक्रांत के GPS लोकेशन मांगी।[4]
इसी दौरान देश भर में कई जगहों पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा हिंसा, आगज़नी और तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक चौंकाने वाली घटना घटी, जहाँ मोईद ख़ान नामक युवक ने ऑपरेशन सिंदूर पर बात करने के कारण 12 साल के हिंदू बालक सुरजीत पर चाकू से हमला कर दिया।[5]
कट्टरपंथी मानसिकता से प्रेरित ऐसे लोग सिर्फ निर्दोष नागरिकों को ही नहीं, बल्कि सैन्य ठिकानों, सप्लाई लाइनों, बिजली संयंत्रों, बांधों और सार्वजनिक सेवाओं को भी निशाना बना सकते हैं — और यह सब अचानक, बिना किसी चेतावनी के हो सकता है। इसका परिणाम होता है — अफरातफरी, अव्यवस्था और भय का माहौल।
सोशल मीडिया: मनोवैज्ञानिक युद्ध का क्षेत्र
बाहरी खतरों के साथ-साथ अब भारत को एक और गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है — और वह है गलत जानकारी और मनोवैज्ञानिक युद्ध का बढ़ता खतरा। सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही फर्जी खबरें, बदली हुई तस्वीरें और भड़काऊ संदेश आम जनता को भ्रमित कर सकते हैं और भय का माहौल पैदा कर सकते हैं।
दुश्मन अच्छी तरह जानते हैं कि आज के डिजिटल युग में युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि दिमाग और सोच पर भी लड़ा जाता है। उनका मकसद होता है — बम और गोलियों से नहीं, बल्कि जनता का मनोबल तोड़कर, संस्थाओं पर भरोसा खत्म कराकर और नागरिकों को आपस में बाँटकर देश को भीतर से अस्थिर करना।
7 मई 2025 को जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान पर हवाई हमला किया, तो पाकिस्तानी सेना और वहाँ के मीडिया चैनलों ने दावा किया कि कश्मीर में भारत के तीन लड़ाकू विमान गिरा दिए गए। इस झूठे दावे को सही साबित करने के लिए उन्होंने 2024 में राजस्थान में हुई एक पुरानी विमान दुर्घटना की तस्वीरें शेयर कीं — जिनका ऑपरेशन सिंदूर से कोई लेना-देना नहीं था।
भारत के अख़बार द हिंदू ने भी अपने आधिकारिक X (ट्विटर) अकाउंट से एक ट्वीट किया, जिसमें दावा किया गया कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय वायुसेना के तीन लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गए हैं। उन्होंने एक सरकारी सूत्र का हवाला दिया और कुछ तस्वीरें भी शेयर कीं, जिन्हें कथित तौर पर दुर्घटनास्थल की बताकर पेश किया गया। यह ट्वीट पूरी तरह फर्जी था, लेकिन इसे द हिंदू की वेबसाइट पर भी briefly प्रकाशित किया गया और बाद में चुपचाप हटा लिया गया। इस झूठे ट्वीट को चीन की सरकारी प्रचार एजेंसी चाइना डेली ने उद्धृत किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाकर उसे “विश्वसनीय” जानकारी के रूप में प्रचारित किया।[6]
वैसे तो द हिंदू आजकल झूठी खबरें फैलाने के लिए कुख्यात हो चुका है और उसकी साख भी गिर चुकी है। फिर भी यह भारत के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में से एक है, जिस कारण से इस में छपी खबरों का असर लाखों पाठकों पर पड़ता है। युद्ध के समय इस अख़बार द्वारा भारतीय वायुसेना के खिलाफ चीनी प्रचार को बढ़ावा देना, पाकिस्तान की झूठी कहानी को दुनिया में फैलाने में मदद करना था, और भारत के अंदर देशभक्त नागरिकों का मनोबल गिराने वाला काम था।
दुश्मन के लिए काम कर रहे कुछ और प्रसिद्ध चेहरे भी इस दौरान सक्रिय थे। उदाहरण के तौर पर, प्रशांत भूषण — जो एक वरिष्ठ वकील हैं और अपनी तीखी हिंदू-विरोधी सोच के लिए जाने जाते हैं — उन्होंने X (ट्विटर) पर पोस्ट किया कि भारत ने “अपने कई लड़ाकू विमान, जिनमें राफेल भी शामिल हैं, पाकिस्तान के चीनी विमानों से खो दिए।” उन्होंने यह भी लिखा कि “इस विफलता की पूरी ज़िम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की है।”[7]
इसी तरह पत्रकार करण थापर ने भी भारतीय विमानों के नुकसान को लेकर झूठी खबरें फैलाईं, जिन्हें पाकिस्तान के मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया। एक रक्षा लेखक होने के नाते मैं कह सकता हूँ कि इन अफवाहों के बाद मुझे कई दोस्तों और पाठकों के परेशान और भ्रमित संदेश मिले। ज़्यादातर लोगों ने कहा कि उन्हें पाकिस्तानी प्रचार पर भरोसा नहीं था, लेकिन जब भारतीय मीडिया ही पाकिस्तान और चीन जैसी बातें करने लगा, तो उनका आत्मविश्वास हिलने लगा। द हिंदू और थापर जो कर रहे हैं, वह पत्रकारिता नहीं, बल्कि सीधा देशद्रोह है।[8]
प्रशांत भूषण और करण थापर जैसे लोग भले ही बंदूक न चलाएं, लेकिन ये ऐसे वक़्त में सरकार और सेना पर लोगों का भरोसा तोड़ सकते हैं, जब देश किसी युद्ध या बड़े संकट से गुजर रहा होता है। ऐसे समय में, जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत एकता की होती है, अंदर से पैदा हुआ ये भ्रम और बिखराव और भी खतरनाक हो जाता है।
जब झूठी बातें फैलती हैं, तो वो लोगों को भड़का सकती हैं — दंगे, विरोध और हिंसा की वजह बन सकती हैं। इससे न सिर्फ समाज में दरार पड़ती है, बल्कि पुलिस और सेना को भी आंतरिक झगड़ों में उलझा दिया जाता है — जिससे उनका ध्यान असली दुश्मन की तरफ नहीं जा पाता।
सीमावर्ती इलाकों जैसे जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और आदिवासी ज़ोन पहले ही उग्रवाद और अलगाववाद जैसी मुश्किलों से जूझ रहे हैं। युद्ध जैसे हालात में इन जगहों को दुश्मन और ज़्यादा भड़का सकता है। ऐसे वक्त में देश के अंदर से उठने वाली गड़बड़ी दुश्मन के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” बन जाती है — यानी ऐसा औज़ार जो सीधे हमले से भी ज़्यादा नुकसान करता है।
भारत के दुश्मन तोड़फोड़ करने वालों को क्यों बढ़ावा देते हैं
भारत के खिलाफ सीधा युद्ध लड़ना पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के लिए अब न तो आसान है और न ही सस्ता। इसलिए ये देश अब खुले युद्ध से बचते हुए, ऐसे परोक्ष और गैर-सैन्य तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनसे भारत को चुपचाप कमजोर किया जा सके — बिना गोली चलाए, बिना जंग का एलान किए।
फर्जी खबरें फैलाना, ऑनलाइन ट्रोल आर्मी चलाना, आतंकियों को फंड देना और अर्धसैनिक समूहों के ज़रिए तनाव भड़काना — ये सब उस रणनीति का हिस्सा हैं जिसे “ग्रे ज़ोन वारफेयर” कहा जाता है। यह एक ऐसा धुंधला क्षेत्र है, जहाँ दुश्मन न पूरी तरह युद्ध करता है और न ही पूरी तरह शांति रहने देता है — लेकिन नुकसान लगातार करता रहता है।
स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज सेंटर के मुताबिक, ग्रे ज़ोन हमले वे होते हैं जो सीधे युद्ध की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन उनका असर युद्ध जितना ही गंभीर होता है। इन्हें कई नामों से जाना जाता है — जैसे हाइब्रिड थ्रेट्स (hybrid threats), शार्प पावर (sharp power), राजनीतिक युद्ध, कुटिल प्रभाव, और अनियमित युद्ध। आज के समय में इस रणनीति की टूलकिट में शामिल हैं: सूचना युद्ध (Information warfare), राजनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध, साइबर हमले, प्रॉक्सी संगठनों का समर्थन, और राज्य-नियंत्रित समूहों के ज़रिए अस्थिरता फैलाना इत्यादि।[9]
लोवी इंस्टीट्यूट (Lowy Institute) के विशेषज्ञ पीटर लेटन के अनुसार, ग्रे ज़ोन हमले अचानक नहीं होते, बल्कि पूरी प्लानिंग और रणनीति के तहत किए जाते हैं। चीन इस रणनीति का गुरु है। वहाँ की सबसे ऊँची सत्ता — चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपल्स लिबरेशन आर्मी — खुद इन अभियानों को मंजूरी और दिशा देती है। ये कोई निचले स्तर के अधिकारियों की पहल नहीं होती, बल्कि सोच-समझकर बनाई गई चाल होती है — ताकि युद्ध टालकर भी दुश्मन को दबाव में रखा जा सके।[10] लेटन का कहना है कि चीन आज दुनिया में ग्रे ज़ोन रणनीति अपनाने वाला सबसे बड़ा देश बन चुका है — फिर चाहे वो दक्षिण चीन सागर हो, पूर्वी चीन सागर, या भारत की सीमाएँ। हर जगह चीन चालाकी से अपनी पकड़ मज़बूत कर रहा है।
पाकिस्तान ने भी चीन से यह रणनीति सीख ली है। पाकिस्तानी लेखक एफ.एस. एजाज़ुद्दीन अपनी किताब From a Head, Through a Head, To a Head में बताते हैं कि 1960 के दशक में जब चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई पाकिस्तान आए, तो उन्होंने अयूब खान को सलाह दी थी कि छोटे युद्धों के बजाय भारत से लंबी लड़ाई की तैयारी करें — और एक ऐसी मिलिशिया फोर्स तैयार करें जो भारत के अंदर ही सक्रिय हो सके।
यही सोच बाद में लश्कर जैसे आतंकी संगठनों के रूप में सामने आई — जिनका काम है भारत के खिलाफ ऐसा युद्ध छेड़ना जो न तो घोषित हो, न सैन्य दिखे — लेकिन भारत को अंदर से खोखला करता रहे।
0.5 फ्रंट का मुकाबला कैसे करें
0.5 फ्रंट से जुड़ी चुनौतियाँ कोई काल्पनिक खतरा नहीं हैं — ये ज़मीनी हकीकत हैं जिनका असर इतना गहरा हो सकता है कि देश की एकता और इच्छाशक्ति अंदर से टूटने लगे। सबसे ख़राब स्थिति तब आती है जब अंदर फैली अव्यवस्था भारत की बाहरी दुश्मनों के खिलाफ प्रतिक्रिया देने की क्षमता को धीमा और कमजोर कर देती है।
आज भारत के सामने दो ही रास्ते हैं। पहला ये कि चुपचाप भ्रम और निष्क्रियता में डूबे रहना, जहाँ कम्युनिस्ट, माओवादी, कट्टर इस्लामवादी, कट्टरपंथी ईसाई, तथाकथित सेक्युलर, लिबरल और शहरी नक्सली मिलकर देश को अंदर से खोखला करते रहें। और दूसरा ये कि भारत अपने अंदर छिपे दुश्मनों को पहचानकर, अलग करके, उनका निर्णायक और संगठित ढंग से मुकाबला करे। इसके लिए एक संपूर्ण और सक्रिय रणनीति की ज़रूरत है:
- सेना, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तेज़, प्रभावी और बिना अड़चन के सूचना आदान-प्रदान हो।
- साइबर सुरक्षा को मज़बूत किया जाए।
- जनता को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएँ ताकि वे फर्जी खबरों को पहचानें और नकारें।
हाशिए पर खड़े समुदायों से संवाद कर उनके असंतोष को दूर किया जाए, जिससे वे कट्टरपंथी जाल में न फँसें। - और सबसे ज़रूरी बात — कानूनों का इस्तेमाल सोच-समझकर हो, ताकि असली खतरों को निशाना बनाया जाए, लेकिन आम नागरिक की स्वतंत्रता बनी रहे।
मीडिया को भी जिम्मेदारी से पेश आना होगा — ख़ासतौर पर राष्ट्रीय संकट के समय। अफवाहें फैलाकर सेना या सरकार का मनोबल गिराना या दुश्मन के प्रचार में सहयोग देना, पत्रकारिता नहीं देशद्रोह है।
भारत को इस असमान युद्ध (asymmetrical warfare) से निपटने के लिए कानूनी और प्रशासनिक सुधार भी ज़रूरी हैं। आज कई कानून इतने ढीले हैं कि जज अपराधियों को आसानी से रिहा कर देते हैं या उनकी सज़ा बहुत कम कर देते हैं। इसीलिए अनिवार्य सज़ा (mandatory sentencing) जैसी व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि जजों को देशद्रोहियों के साथ नरमी बरतने की छूट न मिले।
भारत का सुप्रीम कोर्ट कई बार आधी रात को गंभीर अपराधियों और आतंकियों की ज़मानत याचिकाएं सुनने के लिए बदनाम रहा है। उदाहरण के लिए, ऑपरेशन सिंदूर के समय सरकार ने एक यूट्यूब चैनल 4 PM News को फर्जी खबरें फैलाने पर ब्लॉक किया था — लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ही घंटों में उसे फिर से चालू करने का आदेश दे दिया। नतीजा — वही चैनल दोबारा भारत-विरोधी ज़हर फैलाने में जुट गया।[11]
अब वक्त आ गया है कि भारत न्यायपालिका की अतिसक्रियता (judicial overreach) पर भी लगाम लगाए। क्योंकि कई मामलों में उच्च न्यायालय पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के प्रयासों को बेकार कर देता है और देशद्रोही ताकतों को राहत दे देता है।
अब ‘सॉफ्ट अप्रोच’ छोड़ने का समय है। राजनीतिक नेतृत्व को तय करना होगा कि देश की सुरक्षा सबसे ऊपर है। आंतरिक दुश्मनों को निष्क्रिय करना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए देशद्रोही व्यक्तियों और समूहों की पहचान की जाए, उन पर नजर रखी जाए और उनकी गतिविधियों में गुप्त रूप से प्रवेश कर उन्हें रणनीतिक रूप से खत्म किया जाए। यह रणनीति खासकर शहरी नक्सलियों के लिए बेहद जरूरी है, जिन्होंने देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में गहरी जड़ें जमा ली हैं और वहाँ के युवाओं को भारत-विरोधी सोच में ढाल रहे हैं। विदेशी खुफिया एजेंसियों के इशारों पर काम कर रहे पत्रकारों की पहचान भी तकनीक और ह्यूमिंट (Human Intelligence) के ज़रिए की जा सकती है।
और जो सबसे ज़्यादा खतरनाक हैं — आतंकवादी, या वो लोग जो उन्हें ट्रेनिंग, समर्थन या संसाधन दे रहे हैं। ऐसे लोगों को जैसे भी हो, खत्म किया जाना चाहिए। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है — दुनिया के लगभग हर देश ने ऐसा किया है। आख़िर ओसामा बिन लादेन को भी ऐसे ही मारा गया था। यही तरीका कहलाता है —
“स्वीकृत आत्मरक्षा लक्ष्यीकरण” (permissible self-defense targeting)।[12]
निष्कर्ष
एक अमेरिकी लेखक ने कभी लिखा था — “किसी देश को उसके मूर्खों और野महत्त्वाकांक्षी लोगों से तो बचाया जा सकता है, लेकिन भीतर से हुए विश्वासघात से नहीं। जो दुश्मन किले के बाहर खड़ा होता है, वह दिखता है, उसका झंडा दिखाई देता है। लेकिन जो गद्दार किले के अंदर होता है, वह उसी की भाषा बोलता है, वैसा ही चेहरा रखता है, और भीतर ही भीतर पूरे तंत्र को सड़ा देता है। उसकी फुसफुसाहटें गलियों से होते हुए सरकार तक पहुँच जाती हैं। वह लोगों के स्वार्थ और दुर्बलताओं को उकसाता है, और राष्ट्र की आत्मा को अंदर से खोखला कर देता है। उसकी मार एक हत्यारे से भी ज़्यादा घातक होती है।”[13]
भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है — हमारी सबसे बड़ी हारें बाहरी ताकतों के कारण नहीं, बल्कि भीतर बैठे गद्दारों और हमारी आपसी फूट के कारण हुई हैं। चाहे 711 ईस्वी का पहला इस्लामी हमला हो या फिर ब्रिटिश उपनिवेशवाद — हर बार कुछ अपने ही लोग थे जिन्होंने दुश्मन के लिए किले के दरवाज़े खोल दिए। सच्चाई ये है कि भारतीयों को हर बार सतर्क रहना पड़ता है, लेकिन दुश्मन को बस एक बार मौका मिलना होता है।
जनरल बिपिन रावत की “0.5 फ्रंट” को लेकर दी गई चेतावनी आज के भारत के लिए एक स्पष्ट और गंभीर संकेत है। अब युद्ध केवल टैंक, मिसाइल और बंदूकों से नहीं लड़ा जाता। आज का युद्ध विचारधारा, सोच, नेटवर्क और सामाजिक एकता की ताकत से लड़ा जा रहा है। आने वाले संघर्षों में भारत की जीत सिर्फ सैनिकों की वीरता से नहीं, बल्कि जनता की मानसिक दृढ़ता, राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता, और आपसी विश्वास पर भी निर्भर करेगी।
जनरल रावत ने बिल्कुल स्पष्ट कहा था: “यह एक प्रॉक्सी वॉर है — और प्रॉक्सी वॉर एक गंदा युद्ध होता है। इसे गंदे तरीकों से लड़ा जाता है। आमने-सामने की लड़ाई में कुछ नियम होते हैं, लेकिन इस युद्ध में नहीं। इसलिए ऐसे युद्ध में जीतने के लिए नवाचार चाहिए। आप गंदे युद्ध को उन्हीं जैसे गंदे लेकिन चतुर तरीकों से ही जीत सकते हैं।”[14]
संदर्भ सूची
[1] Some of the most badass things Gen Bipin Rawat said have set the bar high for the next CDS (TFI Post, 2021); https://tfipost.com/2021/12/some-of-the-most-badass-things-gen-bipin-rawat-said-have-set-the-bar-high-for-the-next-cds/
[2] Prashant Mishra asked: What is ‘two-and-a-half front war’ and is India prepared for it? (Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analysis); https://www.idsa.in/askanexpert/prashant-mishra-asked-what-is-two-and-a-half-front-war-and-is-india-prepared-for-it-2
[3] Azam Khan was a traitor from the very beginning – Pushpendra Kulshreshtha (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=Kce3GN_DfWA
[4] Kozhikode man who called up the navy and sought INS Vikrant’s location arrested in Kochi (Times of India); https://timesofindia.indiatimes.com/city/kochi/kozhikode-man-who-called-up-navy-and-sought-ins-vikrants-location-arrested-in-kochi/articleshow/121115652.cms
[5] Shahjahanpur: Enraged over a 12-year-old’s comments on ‘Operation Sindoor’, Moeed Khan stabs the Hindu child, raises Pakistan Zindabad slogan (OpIndia, 2025); https://www.opindia.com/news-updates/shahjahanpur-enraged-over-a-12-year-olds-comments-on-operation-sindoor-enraged-moeed-khan-stabbed-the-hindu-child-raised-pakistan-zindabad-slogan/
[6] Information Warfare post Operation Sindoor: From The Hindu to The Wire, are journalists running an anti-India campaign? (Organiser, 2025); https://organiser.org/2025/05/09/291126/bharat/information-warfare-post-operation-sindoor-from-the-hindu-to-the-wire-are-journalists-running-an-anti-india-campaign/
[7] Amidst information coming from International media & defence analysts (Not denied by our Air Force spokesman) that we lost multiple fighter jets including Rafales to Pakistan’s Chinese made fighters, the focus must also shift to our infamous Rafale deals. (Prashant Bhushan, X); https://x.com/pbhushan1/status/1922117509484081553
[8] Karan Thapar पाकिस्तानी मीडिया में हीरो बन चुके हैं। ये पत्रकारिता नहीं, देशद्रोह है। (X, 2025); https://x.com/Pamphlet_in/status/1921250232550953112
[9] Gray Zone Project (Center for Strategic and International Studies); https://www.csis.org/programs/gray-zone-project
[10] China’s grey-zone provocations: Time to reciprocate (The Interpreter, 2025); https://www.lowyinstitute.org/the-interpreter/china-s-grey-zone-provocations-time-reciprocate
[11] Ban On 4PM YouTube Channel Lifted, Supreme Court Told (NDTV, 2025); https://www.ndtv.com/india-news/ban-on-4pm-youtube-channel-lifted-supreme-court-told-8404395
[12] Permissible Self-Defense Targeting and the Death of Bin Laden Permissible Self-Defense Targeting and the Death of Bin Laden (Denver Journal of International Law and Policy); (https://digitalcommons.du.edu/cgi/viewcontent.cgi?article=1176&context=djilp
[13] https://www.goodreads.com/quotes/33210-a-nation-can-survive-its-fools-and-even-the-ambitious
[14] Need innovation to fight dirty war in J&K: army chief (Deccan Herald, 2017); https://www.deccanherald.com/india/need-innovation-fight-dirty-war-2007183
Donate to HINDUDVESHA
Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.
SUPPORT US